बीमार पड़े तो जेब खाली: निजी अस्पताल 11 गुना महंगे, इंश्योरेंस भी नहीं दे रहा राहत

The CSR Journal Magazine
भारत में इलाज अब सिर्फ स्वास्थ्य का नहीं, बल्कि आर्थिक संकट का भी कारण बनता जा रहा है। एक बार अस्पताल में भर्ती होने पर मरीजों के सामने भारी-भरकम बिल खड़ा हो जाता है, जो अक्सर उनकी सालों की बचत को खत्म कर देता है। चौंकाने वाली बात यह है कि हेल्थ इंश्योरेंस होने के बावजूद भी लोगों को इलाज का अधिकांश खर्च अपनी जेब से ही चुकाना पड़ रहा है।

सर्वे में सामने आई चौंकाने वाली सच्चाई

नेशनल सैंपल सर्वे (NSS) के ताजा आंकड़ों के अनुसार, जनवरी से दिसंबर 2025 के बीच करीब 13% भारतीयों को बीमारी के कारण अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। शहरों में यह आंकड़ा 15% और गांवों में 12% रहा, जिससे साफ है कि शहरी इलाकों में बीमारियों का असर ज्यादा देखने को मिल रहा है।

इंश्योरेंस बढ़ा, फिर भी जेब से खर्च जारी

सर्वे के मुताबिक, 2017-18 की तुलना में 2025 में हेल्थ इंश्योरेंस कवरेज में बड़ा इजाफा हुआ है। गांवों में यह 14% से बढ़कर 47% और शहरों में 19% से बढ़कर 44% हो गया। लेकिन इसके बावजूद अस्पताल में भर्ती होने पर 90% से ज्यादा खर्च लोगों को खुद उठाना पड़ रहा है, जो सिस्टम की बड़ी खामी को उजागर करता है।

निजी अस्पतालों में इलाज बेहद महंगा

रिपोर्ट में सबसे चौंकाने वाली बात यह सामने आई कि निजी अस्पतालों में इलाज सरकारी अस्पतालों की तुलना में लगभग 11 गुना ज्यादा महंगा है। जहां सरकारी अस्पताल में भर्ती होने पर औसतन 7,042 रुपये खर्च होते हैं, वहीं निजी अस्पताल में यही खर्च बढ़कर करीब 56,343 रुपये तक पहुंच जाता है।

डॉक्टर फीस में भी भारी अंतर

डॉक्टर और सर्जन की फीस में भी बड़ा अंतर देखने को मिला। गांवों में सरकारी अस्पताल में डॉक्टर की फीस औसतन 363 रुपये होती है, जबकि निजी अस्पताल में यही फीस 7,580 रुपये तक पहुंच जाती है। शहरों में यह अंतर और ज्यादा है, जहां निजी अस्पतालों में डॉक्टर की फीस सरकारी अस्पतालों की तुलना में 30 गुना से भी ज्यादा हो सकती है।

सरकारी के बजाय निजी अस्पतालों पर भरोसा

सर्वे में यह भी सामने आया कि अधिकतर लोग इलाज के लिए सरकारी अस्पतालों की बजाय निजी अस्पतालों को प्राथमिकता देते हैं। हालांकि, यह विकल्प उनकी जेब पर भारी पड़ता है और उन्हें कर्ज या बचत खत्म करने जैसी स्थिति में पहुंचा देता है।

स्वास्थ्य व्यवस्था पर उठते सवाल

यह आंकड़े देश की स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं। एक तरफ इंश्योरेंस कवरेज बढ़ रहा है, वहीं दूसरी ओर आम आदमी का आर्थिक बोझ कम होने के बजाय बढ़ता जा रहा है। यह स्थिति बताती है कि स्वास्थ्य सेवाओं को सुलभ और किफायती बनाना आज की सबसे बड़ी जरूरत बन चुकी है।
Long or Short, get news the way you like. No ads. No redirections. Download Newspin and Stay Alert, The CSR Journal Mobile app, for fast, crisp, clean updates!

Latest News

Popular Videos