सिंधु संधि पर तकरार: SCO समिट में भिड़े भारत-पाक, हेग का फैसला भारत ने नकारा

The CSR Journal Magazine

Indus Waters Treaty: पाकिस्तान पीएम ने SCO में उठाया जल विवाद का मुद्दा, सिंधु जल संधि पर पाकिस्तान का नया रुख

शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के मंच पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने भारत का नाम लिए बिना सिंधु जल संधि (IWT) का मुद्दा उठाया है और पानी को राजनीतिक हथियार न बनाने की गुहार लगाई है। किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में आयोजित राष्ट्राध्यक्षों के शिखर सम्मेलन में यह मामला तब सामने आया, जब मंच पर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भी मौजूद थे। पाकिस्तान का यह बयान ऐसे समय में आया है जब भारत ने सीमा पार आतंकवाद के विरोध में 1960 की इस ऐतिहासिक संधि को निलंबित (Abeyance) कर रखा है और हेग स्थित मध्यस्थता अदालत (PCA) के हालिया फैसले को सिरे से खारिज कर दिया है।

वैश्विक मंच पर पाकिस्तान का ‘जल विलाप’, SCO शिखर सम्मेलन में शहबाज शरीफ ने लगाई गुहार

शंघाई सहयोग संगठन (SCO) का शिखर सम्मेलन एक बार फिर भारत और पाकिस्तान के बीच गहरे कूटनीतिक तनाव का गवाह बना है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने बहुपक्षीय मंच का इस्तेमाल करते हुए सिंधु जल समझौते (Indus Waters Treaty) को लेकर अपनी चिंताएं जाहिर कीं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में शहबाज शरीफ ने कहा कि पानी इस क्षेत्र की “जीवन रेखा” (Lifeblood) है और इसे कभी भी किसी देश द्वारा राजनीतिक हथियार या दबाव बनाने के जरिया के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। हालांकि, उन्होंने अपने भाषण में सीधे तौर पर भारत का नाम नहीं लिया, लेकिन उनका इशारा साफ तौर पर नई दिल्ली के उस सख्त फैसले की तरफ था, जिसने इस्लामाबाद की रातों की नींद उड़ा रखी है।

शहबाज शरीफ का बयान: “पानी पर समझौते अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धता”

पाकिस्तान ने वर्ष 2026-27 के लिए SCO की अध्यक्षता संभाली है, जिसके बाद बिश्केक में आयोजित राष्ट्राध्यक्षों की परिषद (CHS) को संबोधित करते हुए शहबाज शरीफ ने जल सुरक्षा को भविष्य की पीढ़ियों की गारंटी बताया। शरीफ ने ज़ोर देकर कहा, “साझा जल संसाधनों से जुड़े समझौते अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बाध्यकारी प्रतिबद्धताएं हैं। ये कोई राजनीतिक सहूलियत के मामले नहीं हैं कि जब चाहा तब इन्हें दरकिनार कर दिया जाए। इनका अक्षरशः और बिना किसी शर्त के पालन किया जाना चाहिए।” पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने पानी के मुद्दे को क्षेत्रीय शांति से जोड़ते हुए कहा कि साझा जल संसाधनों का जिम्मेदार प्रबंधन किए बिना दक्षिण एशिया अपनी पूरी क्षमता का विकास नहीं कर सकता। कूटनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान अब इस मुद्दे का अंतर्राष्ट्रीयकरण करने और भारत पर दबाव बनाने की हताश कोशिश कर रहा है।

भारत का रुख स्पष्ट: आतंकवाद और पानी साथ-साथ नहीं चल सकते

शहबाज शरीफ की इस छटपटाहट के पीछे भारत का वह अडिग कूटनीतिक रुख है, जो अप्रैल 2025 में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए भीषण आतंकवादी हमले के बाद अख्तियार किया गया था। इस हमले में 26 नागरिकों की जान गई थी, जिसके बाद भारत सरकार ने कड़ा कदम उठाते हुए 1960 से चली आ रही सिंधु जल संधि को ‘सस्पेंड’ यानी ठंडे बस्ते (Abeyance) में डाल दिया था।भारत ने स्पष्ट संदेश दिया है कि जब तक पाकिस्तान अपनी जमीन से संचालित होने वाले आतंकी संगठनों के खिलाफ “ठोस, विश्वसनीय और अपरिवर्तनीय” कार्रवाई नहीं करता, तब तक भारत संधि के किसी भी प्रावधान को मानने के लिए बाध्य नहीं है। SCO समिट के दौरान भी भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आतंकवाद पर तीखा प्रहार करते हुए साफ कहा कि आतंकवाद किसी भी देश के लिए सामरिक संपत्ति (Strategic Asset) नहीं हो सकता।

हेग कोर्ट के फैसले पर बढ़ा नया विवाद

पाकिस्तानी प्रधानमंत्री का यह बयान हेग स्थित स्थायी मध्यस्थता न्यायालय (PCA) के एक ताजा घटनाक्रम के ठीक एक दिन बाद आया है। दरअसल, भारत द्वारा संधि निलंबित किए जाने के बाद पाकिस्तान ने हेग कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। इस पर सोमवार (31 अगस्त, 2026) को हेग कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा कि 1960 की संधि अभी भी पूरी तरह लागू है और भारत को जम्मू-कश्मीर में रातले (Ratle) और किशनगंगा जैसी जलविद्युत परियोजनाओं पर काम को सीमित रखना चाहिए। भारत के विदेश मंत्रालय (MEA) ने हेग कोर्ट के इस आदेश को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। भारत ने कहा कि इस कथित मध्यस्थता संस्था का गठन ही पूरी तरह से “अवैध” है और इसे भारत के संप्रभु निर्णयों पर टिप्पणी करने का कोई वैधानिक अधिकार (Jurisdiction) नहीं है। भारत ने साफ कर दिया कि हेग कोर्ट का कोई भी वर्तमान या भविष्य का फैसला भारतीय परियोजनाओं पर कोई असर नहीं डालेगा।

सिंधु नदी प्रणाली और पाकिस्तान का डर

19 सितंबर 1960 को विश्व बैंक की मध्यस्थता में हुई इस संधि के तहत छह नदियों के पानी का बंटवारा किया गया था। इसके तहत तीन पूर्वी नदियों (रावी, ब्यास, सतलुज) पर भारत का नियंत्रण है, जबकि तीन पश्चिमी नदियों (सिंधु, झेलम, चिनाब) का अधिकांश पानी पाकिस्तान को जाता है। चूंकि ये नदियां भारत से होकर पाकिस्तान में प्रवेश करती हैं, इसलिए पाकिस्तान को डर है कि यदि भारत ने इन नदियों पर बांधों और जलविद्युत परियोजनाओं की गति बढ़ा दी, तो उसकी कृषि और अर्थव्यवस्था पूरी तरह तबाह हो जाएगी।कंगाल हो चुके पाकिस्तान ने हेग की कानूनी लड़ाई को जिंदा रखने के लिए भारत के हिस्से की फीस का भी खुद भुगतान किया है, जो उसकी गहरी घबराहट को दर्शाता है। बहरहाल, SCO के मंच से शहबाज शरीफ की इस भावुक अपील के बावजूद नई दिल्ली के रुख में कोई नरमी आने के संकेत नहीं हैं। भारत ने कड़ा संदेश दे दिया है कि आतंक की फैक्ट्रियां चलाने वाले देश को पानी के अधिकार की दुहाई देने का कोई नैतिक हक नहीं है।

Long or Short, get news the way you like. No ads. No redirections. Download Newspin and Stay Alert, The CSR Journal Mobile app, for fast, crisp, clean updates!

App Store –  https://apps.apple.com/in/app/newspin/id6746449540 

Google Play Store – https://play.google.com/store/apps/details?id=com.inventifweb.newspin&pcampaignid=web_share

Latest News

Popular Videos