न झटका, न कंपन! 320 किमी की स्पीड पर ऐसे पटरी बदलेगी बुलेट ट्रेन, समझें जापानी इंजीनियरिंग का पूरा गणित

The CSR Journal Magazine

320 किमी/घंटे की रफ्तार पर कैसे ट्रैक बदलेगी भारत की बुलेट ट्रेन? जानें शिनकान्सेन तकनीक का पूरा विज्ञान

भारत की पहली हाई-स्पीड रेल परियोजना यानी मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन कॉरिडोर का निर्माण कार्य अंतिम चरणों में है। नेशनल हाई स्पीड रेल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (NHSRCL) द्वारा दी गई नवीनतम आधिकारिक जानकारी के अनुसार, इस कॉरिडोर पर बुलेट ट्रेन की ऑपरेशनल स्पीड 320 किलोमीटर प्रति घंटा होगी, जबकि इसकी डिजाइन क्षमता 350 किलोमीटर प्रति घंटे तक रखी गई है। भारतीय रेलवे के इतिहास में यह गति एक अभूतपूर्व क्रांति है। लेकिन इतनी तीव्र गति के साथ सुरक्षा से जुड़े कई बड़े सवाल भी खड़े होते हैं। आम लोगों और रेल प्रेमियों के बीच सबसे बड़ा कौतूहल इस बात को लेकर है कि जब एक भारी-भरकम ट्रेन 320 किमी/घंटे की सुपर-फास्ट रफ्तार से दौड़ रही होगी, तो वह बिना दुर्घटनाग्रस्त हुए या बिना अपनी गति को पूरी तरह रोके एक ट्रैक से दूसरे ट्रैक पर कैसे जाएगी? पारंपरिक भारतीय रेल नेटवर्क पर उपयोग होने वाली पटरियों की प्रणाली इस गति को संभालने में पूरी तरह असमर्थ है। ऐसे में जापानी शिनकान्सेन तकनीक पर आधारित एक बेहद जटिल और अत्याधुनिक इंजीनियरिंग प्रणाली का भारत में पहली बार उपयोग किया जा रहा है, जिसे ‘टर्न आउट’ स्ट्रक्चर और विशेष ट्रैक-स्विचिंग मैकेनिज्म कहा जाता है।

पारंपरिक पटरियों से क्यों अलग है बुलेट ट्रेन का ट्रैक?

आमतौर पर भारतीय रेलवे के मौजूदा नेटवर्क पर ब्रॉड गेज (चौड़ी पटरी) और खुले ट्रैक का उपयोग किया जाता है। इन पारंपरिक पटरियों पर ट्रेनें जब ट्रैक बदलती हैं, तो लोहे के स्विच पॉइंट्स एक-दूसरे से चिपकते हैं, जिसमें लकड़ी या कंक्रीट के स्लीपर्स का इस्तेमाल होता है। सामान्य एक्सप्रेस ट्रेनों की गति ट्रैक बदलते समय बेहद कम (लगभग 15 से 30 किमी/घंटा) कर दी जाती है। यदि 320 किमी/घंटे की गति पर इस तरह के पुराने सिस्टम का उपयोग किया जाए, तो भयंकर घर्षण और भारी कंपन के कारण ट्रेन तुरंत पटरी से उतर जाएगी। यही कारण है कि मुंबई-अहमदाबाद कॉरिडोर पर गिट्टी रहित (बैलास्टलेस) स्लैब ट्रैक सिस्टम का उपयोग किया जा रहा है। बुलेट ट्रेन के लिए तैयार किए जा रहे एलिवेटेड वायडक्ट (हवा में तैरते पुलों) पर कंक्रीट के बेहद मजबूत और सटीक स्लैब बिछाए जा रहे हैं। इन पटरियों के जोड़ इतने बारीक हैं कि ट्रेन के भीतर बैठे यात्रियों को जरा सा भी झटका महसूस नहीं होगा।

क्या है ‘टर्न आउट’ और ट्रैक-स्विचिंग तकनीक?

जब बुलेट ट्रेन को मेन लाइन से किसी स्टेशन के लूप लाइन पर जाना होता है या आपातकालीन स्थिति में अपना ट्रैक बदलना होता है, तब “टर्न आउट स्ट्रक्चर” (Turnout Structure) मुख्य भूमिका निभाता है। टर्न आउट एक विशेष रूप से इंजीनियर किया गया ट्रैक ढांचा होता है, जो हाई-स्पीड ट्रेनों को बिना किसी बाधा के एक ट्रैक से दूसरे ट्रैक पर जाने की अनुमति देता है। भारत के पहले हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर के लिए देश में पहली बार ‘फाइबर रीइंफोर्स्ड सिंथेटिक स्लीपर’ (FRSP) का इस्तेमाल किया जा रहा है। टर्न आउट ज़ोन में पारंपरिक कंक्रीट स्लीपर के बजाय इन सिंथेटिक स्लीपर्स को हाई-स्ट्रेंथ स्टील पार्ट्स के साथ जोड़ा गया है। यह संयोजन ट्रैक को अत्यधिक स्थिरता, बेजोड़ एक्यूरेसी और लंबी सर्विस लाइफ प्रदान करता है।

गियर शिफ्टिंग और लॉकिंग मैकेनिज्म का विज्ञान

320 किमी/घंटे की गति पर ट्रैक बदलने की प्रक्रिया को सुरक्षित बनाने के लिए जापानी इंजीनियरिंग ने एक पॉइंट-मशीन और लॉकिंग मैकेनिज्म विकसित किया है। जब ट्रेन को ट्रैक बदलना होता है, तो पटरियों के मूवेबल हिस्से (जिन्हें टंग रेल कहा जाता है) बेहद शक्तिशाली इलेक्ट्रिक मोटर्स द्वारा मिलीमीटर की सटीकता के साथ अपनी पोजीशन बदलते हैं। इस प्रक्रिया में दो तकनीकें बेहद महत्वपूर्ण हैं।
मल्टीपल पॉइंट मशीनें: बुलेट ट्रेन के टर्न आउट काफी लंबे होते हैं। पटरी के लचीले हिस्से को एक समान मोड़ने के लिए एक के बजाय कई पॉइंट मशीनें एक साथ सिंक्रोनाइज होकर काम करती हैं।
इंटरलाकिंग और सेंसर सिस्टम: जब तक ट्रैक पूरी तरह से अपनी नई पोजीशन पर लॉक नहीं हो जाता और कंप्यूटर को इसका 100% क्लियरेंस नहीं मिलता, तब तक ट्रेन को उस ज़ोन में प्रवेश की अनुमति नहीं मिलती। डिजिटल सिग्नलिंग सिस्टम सीधे ट्रेन के ऑटोमैटिक कंट्रोल (ATC) से जुड़ा होता है।

गति का नियंत्रण: क्या 320 की स्पीड पर ही मुड़ेगी ट्रेन?

तकनीकी रूप से यह समझना आवश्यक है कि जब बुलेट ट्रेन सीधे ट्रैक (मेन लाइन) पर दौड़ती है, तब वह अपनी पूरी क्षमता यानी 320 किमी/घंटे की रफ्तार बनाए रखती है। लेकिन जब उसे टर्न आउट से गुजरते हुए किसी दूसरे ट्रैक पर मुड़ना होता है, तो सेंट्रीफ्यूगल फोर्स (अपकेंद्रीय बल) के कारण ट्रेन पर बाहर की तरफ भारी दबाव पड़ता है। यात्रियों की सुविधा और पूरी तरह से सुरक्षित ट्रांजिशन सुनिश्चित करने के लिए इस गति को स्वचालित रूप से रेगुलेट किया जाता है। जब ट्रेन टर्न आउट ज़ोन के पास पहुंचती है, तो ऑटोमैटिक ट्रेन कंट्रोल (ATC) सिस्टम इसकी गति को घटाकर 80 किलोमीटर प्रति घंटा पर ले आता है। टर्न आउट ज़ोन को पार करते समय 80 किमी/घंटे की यह गति भी बहुत तेज मानी जाती है, लेकिन अत्याधुनिक फाइबर रीइंफोर्स्ड स्लीपर्स और कर्व डिजाइनिंग की वजह से ट्रेन बिना किसी कंपन या आवाज के, बेहद स्मूथ और स्टेबल तरीके से दूसरे ट्रैक पर शिफ्ट हो जाती है। जैसे ही ट्रेन नए ट्रैक पर सीधे रास्ते पर आती है, वह कुछ ही सेकंडों में दोबारा अपनी अधिकतम 320 किमी/घंटे की रफ्तार पकड़ लेती है।

स्वदेशी तकनीक की ओर बढ़ते कदम: भविष्य की योजनाएं

वर्तमान में मुंबई-अहमदाबाद रूट पर उपयोग की जा रही तकनीक मुख्य रूप से जापानी शिनकान्सेन E5 सीरीज पर आधारित है। लेकिन भारतीय रेलवे और केंद्र सरकार का लक्ष्य केवल तकनीक का आयात करना नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर बनना है। भारत सरकार ने हाल ही में घोषणा की है कि देश 2030 तक 350 किलोमीटर प्रति घंटे की डिजाइन स्पीड वाली अपनी खुद की स्वदेशी हाई-स्पीड ट्रेन (B35) विकसित करने की तैयारी में है। इसके लिए इंटीग्रल कोच फैक्ट्री (ICF) और अन्य भारतीय विनिर्माण इकाइयां काम कर रही हैं। आगामी उत्तर, दक्षिण और पूर्वी गलियारों में अधिक से अधिक भारतीय तकनीक और घरेलू स्तर पर निर्मित ट्रैक-स्विचिंग सिस्टम का उपयोग किया जाएगा।

सुरक्षा के तीन चक्र: शून्य दुर्घटना का संकल्प

जापान में शिनकान्सेन बुलेट ट्रेन का इतिहास पिछले 60 वर्षों से अधिक का रहा है और इस दौरान ट्रैक बदलने या सामान्य परिचालन में गति के कारण एक भी यात्री की जान जाने की दुर्घटना नहीं हुई है। भारत इसी ‘जीरो एक्सीडेंट’ सिद्धांत को अपना रहा है।
भूकंपीय डिटेक्शन सिस्टम: यदि ट्रैक बदलने के दौरान या यात्रा के दौरान हल्का सा भी भूकंपीय झटका महसूस होता है, तो पूरे कॉरिडोर की बिजली आपूर्ति अपने आप कट जाती है और ट्रेनें जहां की तहां रुक जाती हैं।
विदेशी कणों की निगरानी (Obstruction Detection): टर्न आउट और स्विचिंग क्षेत्रों पर 24 घंटे लेजर स्कैनर्स और सेंसरों के जरिए नजर रखी जाती है। यदि पटरियों के बीच कोई छोटा पत्थर या धातु का टुकड़ा भी फंस जाता है, तो सिग्नल तुरंत लाल हो जाता है।
ध्वनि और कंपन अवरोधक: 320 किमी/घंटे की रफ्तार पर ट्रैक बदलने और दौड़ने से पैदा होने वाले शोर को रोकने के लिए पूरे कॉरिडोर पर भारी कंक्रीट के ध्वनि-अवरोधक (नॉइस बैरियर्स) पैनल लगाए जा रहे हैं।

वैश्विक स्पीड क्लब में भारत की एंट्री

320 किमी/घंटे की रफ्तार पर बुलेट ट्रेन का ट्रैक बदलना कोई साधारण प्रक्रिया नहीं बल्कि मैकेनिकल, इलेक्ट्रिकल और सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग का एक बेजोड़ संगम है। भारत में उपयोग हो रही यह विशेष टर्न आउट और फाइबर रीइंफोर्स्ड सिंथेटिक स्लीपर तकनीक देश के परिवहन बुनियादी ढांचे को आने वाले दशकों के लिए एक नई दिशा देने जा रही है। अगस्त 2027 में गुजरात के सूरत से बिलीमोरा के बीच होने वाले पहले चरण के ट्रायल के साथ ही भारत इस वैश्विक क्लब में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा देगा।

Long or Short, get news the way you like. No ads. No redirections. Download Newspin and Stay Alert, The CSR Journal Mobile app, for fast, crisp, clean updates!

App Store –  https://apps.apple.com/in/app/newspin/id6746449540 

Google Play Store – https://play.google.com/store/apps/details?id=com.inventifweb.newspin&pcampaignid=web_share

Latest News

Popular Videos