UGC ने उठाया शिक्षण संस्थानों में छात्रों के मानसिक स्वास्थ की दिशा में बड़ा कदम! हर 500 छात्रों पर एक काउंसलर, हर कॉलेज में मानसिक स्वास्थ्य केंद्र अनिवार्य करने का प्रस्ताव!
कैंपस में मानसिक स्वास्थ्य: UGC का बड़ा कदम
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) की एक समिति ने कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य को मजबूत करने के लिए नए नियमों का मसौदा (ड्राफ्ट गाइडलाइंस) जारी किया है। इन नियमों में बड़े संस्थानों में हर 500 छात्रों पर एक काउंसलर और छोटे संस्थानों में हर 100 छात्रों पर एक काउंसलर नियुक्त करने का प्रस्ताव है। UGC की इन ड्राफ्ट गाइडलाइंस का नाम “UGC Guidelines on Uniform Policy on Mental Health & Wellbeing for Higher Educational Institutions (HEIs)”रखा गया है। इसके तहत तनाव, चिंता और मानसिक समस्याओं को लेकर नियमित जागरूकता कार्यक्रमआयोजित करने की भी सिफारिश की गई है।
हर संस्थान में मानसिक स्वास्थ्य एवं वेलबीइंग केंद्र जरूरी
ड्राफ्ट के अनुसार, हर उच्च शिक्षण संस्थान में एक समर्पित मानसिक स्वास्थ्य एवं वेलबीइंग केंद्र (Mental Health & Wellbeing Centre) स्थापित करना अनिवार्य होगा। इन केंद्रों में-
• काउंसलिंग के लिए निजी और सुरक्षित कमरे,
• अपॉइंटमेंट के इंतजार के लिए अलग स्थान,
• गोपनीयता बनाए रखने की पूरी व्यवस्था होगी।
छात्रों के रिकॉर्ड रहेंगे गोपनीय
UGC ने कहा है कि काउंसलिंग से जुड़े रिकॉर्ड कोडेड या गुप्त (अनाम) रूप में रखे जाएंगे। छात्र के स्नातक होने के एक साल बाद, संस्थान के नियमों के अनुसार क्लिनिकल रिकॉर्ड नष्ट किए जा सकते हैं। हालांकि, सेवा उपयोग से जुड़ा सामान्य डेटा सुरक्षित रखा जा सकेगा। मानसिक स्वास्थ्य केंद्र के संपर्क विवरण कैंपस में स्पष्ट रूप से प्रदर्शित किए जाएंगे और संस्थान की वेबसाइट पर भी उपलब्ध होंगे।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद बनी समिति
UGC ने यह समिति 25 जुलाई 2025 को सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद गठित की थी। इस समिति की अध्यक्षता डॉ. राजिंदर के. धमीजा, निदेशक, Institute of Human Behaviour and Allied Sciences (IHBAS), दिल्ली कर रहे हैं।
UGC निभाएगा निगरानी की केंद्रीय भूमिका
ड्राफ्ट नियमों के तहत UGC को सभी उच्च शिक्षण संस्थानों में मानसिक स्वास्थ्य नीति के कार्यान्वयन की निगरानी की जिम्मेदारी दी गई है। इसके लिए एक विशेष पोर्टल ‘MANASSETU’ बनाया जाएगा, जहां वार्षिक रिपोर्ट, फीडबैक और छात्रों की भलाई और आत्महत्या जैसी घटनाओं में कमी के आंकड़े एकत्र किए जाएंगे। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के सहयोग से UGC, NRF, ICMR, ICSSR और WHO जैसी संस्थाओं के साथ मिलकर मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े प्रभावी उपाय और रणनीतियां विकसित करेगा। नीतियों की हर साल समीक्षा की जाएगी ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वे ज़मीनी स्तर पर असर दिखाएं।
आत्महत्या रोकथाम पर विशेष जोर
ड्राफ्ट गाइडलाइंस में कहा गया है कि छात्रों, शिक्षकों और स्टाफ को छात्रों के व्यवहार में बदलाव, कक्षा में अनुपस्थिति, अचानक अलग-थलग पड़ना जैसे तनाव के संकेत पहचानने का प्रशिक्षण दिया जाएगा। UGC का मानना है कि इन उपायों से छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा होगी और उच्च शिक्षण संस्थानों में एक सुरक्षित और सहयोगी वातावरण तैयार किया जा सकेगा।
उच्च शिक्षण संस्थानों में मानसिक स्वास्थ्य पर काम करना क्यों ज़रूरी है
उच्च शिक्षण संस्थानों में मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देना आज के समय की बड़ी ज़रूरत बन गया है। कॉलेज और विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले छात्र पढ़ाई, परीक्षा, करियर, प्रतिस्पर्धा और सामाजिक दबाव के कारण लगातार तनाव में रहते हैं। युवावस्था भावनात्मक रूप से संवेदनशील होती है और इस दौरान यदि सही मार्गदर्शन व मानसिक सहयोग न मिले तो तनाव, अवसाद और चिंता जैसी समस्याएं गंभीर रूप ले सकती हैं। मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध होने से छात्र अपनी परेशानियों को खुलकर साझा कर पाते हैं, समय पर काउंसलिंग मिलती है और आत्महत्या जैसी दुखद घटनाओं को रोका जा सकता है। इसके साथ ही, मानसिक रूप से स्वस्थ छात्र पढ़ाई में बेहतर प्रदर्शन करते हैं, ड्रॉपआउट की समस्या कम होती है और कैंपस में एक सुरक्षित, सकारात्मक व सहयोगी वातावरण बनता है। कुल मिलाकर, छात्रों का मानसिक स्वास्थ्य मजबूत होगा तभी वे अपने शैक्षणिक और व्यक्तिगत जीवन में आगे बढ़ पाएंगे और यही किसी भी उच्च शिक्षण संस्थान का मूल उद्देश्य है।
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