58 साल पुराना मोमिनपुर जन्माष्टमी उत्सव इस बार सिर्फ हिंदू आयोजकों के हाथों में, मुस्लिम सदस्यों को समिति से बाहर रखने पर चर्चा तेज। मुस्लिम समाजसेवी ने की थी शुरुआत, वर्षों तक हिंदू-मुस्लिम मिलकर कराते रहे आयोजन; इस बार आयोजन समिति के स्वरूप में बड़ा बदलाव, कोलकाता की गंगा-जमुनी संस्कृति को लेकर उठे सवाल।
गंगा-जमुनी परंपरा का उदाहरण-मोमिनपुर का जन्माष्टमी उत्सव
पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता अपने बहुलतावादी सामाजिक और सांस्कृतिक परिवेश के लिए जानी जाती है। शहर के कई इलाकों में अलग-अलग समुदायों के लोग लंबे समय से एक-दूसरे के धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों में भाग लेते रहे हैं। इसी परंपरा का एक उदाहरण रहा है मोमिनपुर का जन्माष्टमी उत्सव, जो करीब छह दशक से अधिक समय से आयोजित होता आ रहा है। लेकिन अपने 58वें वर्ष में प्रवेश कर रहा यह उत्सव इस बार एक बड़े बदलाव को लेकर चर्चा में है। इस वर्ष आयोजन समिति में मुस्लिम सदस्यों को शामिल नहीं किए जाने की बात सामने आई है। आयोजकों के एक वर्ग का कहना है कि इस बार जन्माष्टमी का आयोजन केवल हिंदू समुदाय के लोग करेंगे, क्योंकि यह भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का हिंदू धार्मिक पर्व है। दूसरी ओर, आयोजन से जुड़े रहे मुस्लिम सदस्यों का कहना है कि यह कार्यक्रम वर्षों से सामुदायिक सहभागिता का उदाहरण रहा है और पहले हिंदू-मुस्लिम सदस्य मिलकर इसकी व्यवस्थाएं संभालते थे।
भुकैलाश रोड और हुसैन शाह रोड के चौराहे पर होता है आयोजन
यह प्रसिद्ध जन्माष्टमी कार्यक्रम कोलकाता नगर निगम के वार्ड नंबर 79 में भुकैलाश रोड और हुसैन शाह रोड के क्रॉसिंग पर आयोजित होता है। यह क्षेत्र पोर्ट विधानसभा क्षेत्र का हिस्सा है। नगर निगम के पुराने रिकॉर्ड में भी वार्ड 79 की सीमाओं में भुकैलाश रोड और हुसैन शाह रोड का उल्लेख मिलता है। यह इलाका कोलकाता के बंदरगाह क्षेत्र से जुड़े उन हिस्सों में आता है, जहां लंबे समय से विभिन्न समुदायों की आबादी साथ-साथ रहती रही है। इसी वजह से यहां होने वाले धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों को स्थानीय सामाजिक जीवन के संदर्भ में भी देखा जाता रहा है।
मुस्लिम समाजसेवी मोहम्मद काशिम ने की थी शुरुआत
इस पूरे विवाद और बदलाव की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि स्थानीय लोगों के अनुसार इस जन्माष्टमी उत्सव की शुरुआत करीब छह दशक पहले मुस्लिम समाजसेवी मोहम्मद काशिम ने की थी। बताया जाता है कि यह कार्यक्रम किडरपोर समाज कल्याण समिति के माध्यम से शुरू हुआ था। समय बीतने के साथ आयोजन की सक्रियता में कुछ कमी आई, लेकिन बाद में इसे फिर से व्यवस्थित तरीके से शुरू किया गया। स्थानीय आयोजकों के अनुसार, 2011 के बाद मुस्लिम युवाओं के एक समूह ने इस आयोजन को दोबारा सक्रिय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यही वजह है कि इस बार मुस्लिम सदस्यों को आयोजन समिति से बाहर रखने की खबर को इस उत्सव के इतिहास में एक महत्वपूर्ण बदलाव माना जा रहा है।
वर्षों तक हिंदू-मुस्लिम मिलकर करते थे आयोजन
तृणमूल कांग्रेस से जुड़े रहे और आयोजन समिति के पूर्व सदस्य मोहम्मद आलम के मुताबिक, वर्ष 2011 से इस उत्सव को नियमित रूप से आयोजित किया जाता रहा है। उनके अनुसार, आयोजन समिति में करीब 20 सदस्य होते थे और उनमें लगभग आधे मुस्लिम थे। आलम का कहना है कि हिंदू और मुस्लिम सदस्य मिलकर आयोजन की जिम्मेदारियां संभालते थे। प्रसाद वितरण से लेकर कार्यक्रम की व्यवस्थाओं और धार्मिक अनुष्ठानों को सुचारु रूप से कराने तक दोनों समुदायों के सदस्य साथ काम करते थे। उनके मुताबिक, इस बार समिति से सभी मुस्लिम सदस्यों को बाहर कर दिया गया है। इस दावे को लेकर आयोजकों के बीच मतभेद सामने आया है और यही इस साल के उत्सव को चर्चा का विषय बना रहा है।
भाजपा नेता राजेश सिंह की भूमिका
इस वर्ष आयोजन के स्वरूप में बदलाव की जानकारी राजेश सिंह के बयान के बाद सामने आई। सिंह ने मीडिया से बातचीत में कहा कि इस बार जन्माष्टमी उत्सव का आयोजन केवल हिंदू करेंगे। उनका तर्क है कि जन्माष्टमी एक हिंदू धार्मिक त्योहार है, इसलिए इसके आयोजन और धार्मिक गतिविधियों की जिम्मेदारी हिंदू समुदाय के लोगों के पास होनी चाहिए। राजेश सिंह इस वर्ष पोर्ट विधानसभा क्षेत्र से भाजपा के उम्मीदवार के रूप में चुनाव भी लड़ चुके हैं, हालांकि उन्हें चुनाव में सफलता नहीं मिली। इससे पहले वे कांग्रेस से जुड़े रहे थे और इंडियन नेशनल ट्रेड यूनियन कांग्रेस से संबद्ध श्रमिक संगठन के माध्यम से अलीपुर चिड़ियाघर की लेबर यूनियन में सक्रिय रहे थे। अब उन्होंने विश्व हिंदू परिषद की विचारधारा के साथ अपनी वैचारिक समानता की बात कही है।
‘धर्म व्यक्ति का है तो त्योहार भी उसी का’- राजेश सिंह
राजेश सिंह ने पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के चर्चित कथन- “धर्म व्यक्ति का होता है, लेकिन त्योहार सबके होते हैं”- से अलग राय रखी है। सिंह का कहना है कि धर्म व्यक्ति से जुड़ा विषय है और त्योहार भी संबंधित धार्मिक समुदाय की परंपराओं का हिस्सा होते हैं। इसी आधार पर उनका तर्क है कि जन्माष्टमी के धार्मिक आयोजन की जिम्मेदारी हिंदुओं के हाथ में होनी चाहिए। हालांकि, सिंह ने यह भी कहा कि दूसरे धर्मों के लोग पंडाल में आ सकते हैं। उनके मुताबिक, आपत्ति दूसरे समुदाय के लोगों के आने से नहीं, बल्कि आयोजन की धार्मिक जिम्मेदारी और संचालन से जुड़ी है।
58वें वर्ष में बदली आयोजन समिति
मोमिनपुर का यह उत्सव इस बार 58वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। इतने लंबे समय तक अलग-अलग समुदायों के लोगों की भागीदारी के बाद आयोजन समिति का स्वरूप बदलना स्थानीय स्तर पर महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस आयोजन से अतीत में शहर के कई प्रमुख राजनीतिक और सामाजिक चेहरे जुड़े रहे हैं। इसके प्रमुख संरक्षकों में कोलकाता के पूर्व मेयर फिरहाद हकीम तथा तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ पदाधिकारी मोहम्मद आलम और सेराजुल करीम के नाम सामने आते रहे हैं। यही कारण है कि इस साल के बदलाव को केवल एक स्थानीय धार्मिक कार्यक्रम के प्रशासनिक फेरबदल के रूप में नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसे कोलकाता की सामाजिक-सांस्कृतिक राजनीति के व्यापक संदर्भ में भी चर्चा मिल रही है।
पंडाल निर्माण शुरू, आयोजन की तैयारियां जारी
स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार, इस साल उत्सव के लिए पंडाल निर्माण का काम शुरू हो चुका है। आयोजन से जुड़े लोगों का कहना है कि इस बार कार्यक्रम की जिम्मेदारी हिंदू आयोजकों के पास रहेगी। राजेश सिंह ने खुद को जन्माष्टमी आयोजन समिति का अध्यक्ष और चेयरपर्सन बताया है। उन्होंने पारंपरिक संस्कृति और धार्मिक स्वरूप की रक्षा को अपने फैसले का आधार बताया।
विश्व हिंदू परिषद के हालिया बयानों से भी जुड़ रहा घटनाक्रम
मोमिनपुर जन्माष्टमी उत्सव में हुए इस बदलाव की चर्चा ऐसे समय में सामने आई है, जब विश्व हिंदू परिषद (VHP) ने कोलकाता में दुर्गा पूजा आयोजकों को लेकर भी कुछ सुझाव और निर्देश जारी किए हैं। रिपोर्टों के मुताबिक, VHP ने दुर्गा पूजा आयोजकों से देवी-देवताओं की छवियों में किसी प्रकार की विकृति से बचने, पंडालों के डिजाइन में हिंदू संस्कृति और विरासत को प्राथमिकता देने तथा मुख्य पंडाल क्षेत्र में मांसाहारी भोजन पर रोक रखने की बात कही थी। संगठन ने इसके पीछे धार्मिक पवित्रता और स्वच्छता का तर्क दिया था। मोमिनपुर जन्माष्टमी आयोजन की नई व्यवस्था को भी कुछ लोग इसी व्यापक वैचारिक बदलाव के संदर्भ में देख रहे हैं। हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि जन्माष्टमी समिति के स्थानीय निर्णय और VHP के निर्देश को एक ही औपचारिक निर्णय मानना सही नहीं होगा; दोनों घटनाओं के बीच केवल समय और वैचारिक संदर्भ का संबंध बताया जा रहा है।
कोलकाता की मिली-जुली संस्कृति की चर्चा क्यों?
कोलकाता में धार्मिक आयोजनों में दूसरे समुदायों की भागीदारी का इतिहास नया नहीं है। मोमिनपुर, किडरपोर और एकबालपुर जैसे इलाकों में लंबे समय से ऐसे उदाहरण मिलते रहे हैं, जहां अलग-अलग समुदायों के लोगों ने एक-दूसरे के धार्मिक आयोजनों में सहयोग किया है। पुरानी रिपोर्टों में मोमिनपुर की दुर्गा पूजा का भी उल्लेख मिलता है, जहां मुस्लिम युवाओं ने पूजा के आयोजन में सक्रिय भूमिका निभाई थी। 2022 की एक रिपोर्ट में भी मोमिनपुर और किडरपोर जैसे इलाकों में हिंदू-मुस्लिम समुदायों के साझा धार्मिक-सांस्कृतिक सहभागिता के उदाहरण सामने आए थे। इसी पृष्ठभूमि में मोमिनपुर का जन्माष्टमी उत्सव लंबे समय से कोलकाता की साझा संस्कृति और स्थानीय सामाजिक मेल-जोल का उदाहरण माना जाता रहा है।
अब विवाद का केंद्र क्या है?
इस पूरे घटनाक्रम में दो अलग दृष्टिकोण स्पष्ट रूप से सामने आ रहे हैं। आयोजकों के एक वर्ग का तर्क है कि जन्माष्टमी हिंदू धर्म का प्रमुख त्योहार है और उसके धार्मिक अनुष्ठानों की जिम्मेदारी हिंदू समुदाय के पास होनी चाहिए। उनका मानना है कि इससे हिंदू परंपराओं और धार्मिक स्वरूप को सुरक्षित रखा जा सकेगा। वहीं पूर्व आयोजकों और मुस्लिम सदस्यों का पक्ष है कि इस उत्सव की अपनी ऐतिहासिक परंपरा रही है, जिसमें अलग-अलग समुदायों के लोगों ने साथ मिलकर आयोजन किया। उनके अनुसार, इस परंपरा को अचानक बदलना इस आयोजन की पुरानी पहचान में बड़ा बदलाव है।
क्या दूसरे धर्म के लोग उत्सव में आ सकेंगे?
उपलब्ध बयानों के मुताबिक, आयोजकों की ओर से यह कहा गया है कि दूसरे धर्मों के लोगों के पंडाल में आने पर रोक नहीं है। विवाद मुख्य रूप से आयोजन समिति और धार्मिक गतिविधियों के संचालन में भागीदारी को लेकर है। राजेश सिंह के बयान के अनुसार, दूसरे धर्मों के लोग पंडाल में आ सकते हैं, लेकिन आयोजन की धार्मिक जिम्मेदारी हिंदुओं द्वारा निभाई जाएगी। इसलिए इसे “मुसलमानों के लिए उत्सव में प्रवेश पर पूर्ण प्रतिबंध” कहना उपलब्ध जानकारी से अधिक व्यापक दावा होगा। फिलहाल सामने आई जानकारी मुख्यतः मुस्लिम सदस्यों को आयोजन समिति में शामिल नहीं किए जाने और आयोजन को हिंदू संचालित रखने से संबंधित है।
राजनीतिक पृष्ठभूमि भी बनी चर्चा का हिस्सा
मोमिनपुर का जन्माष्टमी उत्सव जिस क्षेत्र में होता है, वह राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण है। आयोजन स्थल पोर्ट विधानसभा क्षेत्र में आता है और यह क्षेत्र भवानीपुर विधानसभा क्षेत्र की सीमा के निकट है। रिपोर्टों में इसे शुभेंदु अधिकारी और ममता बनर्जी से जुड़े राजनीतिक क्षेत्रों की सीमा के आसपास का इलाका बताया गया है। राजेश सिंह के भाजपा उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ने और उनके पुराने कांग्रेस संबंधों के कारण इस बदलाव को राजनीतिक संदर्भ में भी देखा जा रहा है। हालांकि, आयोजन को लेकर उनके सार्वजनिक तर्क का मुख्य आधार धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान और परंपरा है।
एक उत्सव, दो अलग नजरिए
मोमिनपुर का जन्माष्टमी उत्सव इस बार अपने 58वें वर्ष में ऐसे समय में पहुंचा है, जब देशभर में धार्मिक आयोजनों के स्वरूप, समुदायों की भागीदारी और सांस्कृतिक पहचान को लेकर बहस जारी है। एक तरफ आयोजकों का कहना है कि धार्मिक त्योहारों के मूल स्वरूप और परंपराओं की रक्षा जरूरी है। दूसरी तरफ इस उत्सव का इतिहास यह बताता है कि स्थानीय स्तर पर कई वर्षों तक हिंदू और मुस्लिम सदस्य मिलकर आयोजन की जिम्मेदारी निभाते रहे हैं। यही विरोधाभास इस बार के आयोजन को खास बना रहा है- एक ऐसा जन्माष्टमी उत्सव जिसकी शुरुआत एक मुस्लिम समाजसेवी से जुड़ी बताई जाती है और जिसकी आयोजन समिति में वर्षों तक मुस्लिम सदस्यों की महत्वपूर्ण भागीदारी रही, अब पहली बार केवल हिंदू आयोजकों द्वारा संचालित किए जाने की बात सामने आई है।
धार्मिक आयोजन की बदलती संरचना
मोमिनपुर का 58 साल पुराना जन्माष्टमी उत्सव इस वर्ष अपने धार्मिक स्वरूप से अधिक आयोजन की बदलती सामाजिक संरचना को लेकर चर्चा में है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, इस बार मुस्लिम सदस्यों को आयोजन समिति में शामिल नहीं किया गया है और भाजपा के पूर्व उम्मीदवार राजेश सिंह के नेतृत्व में इसे हिंदू आयोजकों द्वारा संचालित करने की बात कही गई है। हालांकि, इस बदलाव को लेकर अलग-अलग पक्षों के बयान सामने आए हैं। इसलिए इसे किसी समुदाय के पूरे रुख के रूप में देखने के बजाय स्थानीय आयोजन समिति में हुए बदलाव और उससे पैदा हुई बहस के रूप में देखना अधिक तथ्यपरक होगा।
कोलकाता की हवा मे तैरता विवाद
मोमिनपुर की यह कहानी एक बड़े सवाल को भी सामने रखती है—क्या धार्मिक त्योहारों की पहचान केवल धार्मिक समुदाय तक सीमित होनी चाहिए, या लंबे समय से चली आ रही साझा भागीदारी और स्थानीय सांस्कृतिक परंपरा भी किसी उत्सव की पहचान का हिस्सा बन चुकी होती है? इस सवाल का जवाब आने वाले दिनों में न सिर्फ मोमिनपुर बल्कि कोलकाता की सामाजिक राजनीति में भी चर्चा का विषय बना रह सकता है।
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