डॉलर से तीन गुना आगे रुपया! सर्कुलेशन में भारतीय नोटों की संख्या अमेरिकी करेंसी से 3 गुना, RBI ने बताई वजह
अमेरिकी डॉलर को दुनिया की सबसे प्रभावशाली और व्यापक रूप से इस्तेमाल की जाने वाली मुद्राओं में गिना जाता है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार, विदेशी मुद्रा भंडार, कमोडिटी कारोबार और वैश्विक वित्तीय लेन-देन में डॉलर की भूमिका बेहद अहम है। लेकिन अगर बात सिर्फ नोटों की संख्या यानी बैंकनोट सर्कुलेशन की करें, तो तस्वीर काफी अलग दिखाई देती है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के डिप्टी गवर्नर शिरिश चंद्र मुर्मू के मुताबिक, भारत में चलन में मौजूद बैंकनोटों की संख्या अमेरिकी डॉलर के नोटों की तुलना में करीब तीन गुना और यूरो के नोटों की तुलना में लगभग छह गुना है। RBI की आधिकारिक वेबसाइट पर मुर्मू को डिप्टी गवर्नर के रूप में सूचीबद्ध किया गया है।
भारत में 176 अरब बैंकनोट सर्कुलेशन में
RBI डिप्टी गवर्नर के अनुसार भारत में इस समय करीब 176 अरब बैंकनोट चलन में हैं। इसकी तुलना में पिछले वर्ष के अंत में करीब 56 अरब अमेरिकी डॉलर के बैंकनोट और लगभग 30 अरब यूरो के बैंकनोटसर्कुलेशन में थे। इस हिसाब से भारत में नोटों की संख्या अमेरिकी डॉलर के नोटों की तुलना में लगभग 3.1 गुनाऔर यूरो के नोटों की तुलना में करीब 5.9 गुना बैठती है। यानी बैंकनोटों की गिनती के पैमाने पर भारतीय मुद्रा का सर्कुलेशन काफी बड़ा है। हालांकि, इस आंकड़े का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि भारतीय रुपया अंतरराष्ट्रीय ताकत या वैश्विक उपयोग में डॉलर से आगे निकल गया है। नोटों की संख्या और मुद्रा की वैश्विक ताकत दो अलग-अलग चीजें हैं। किसी देश में कितने नोट छापे और चलाए जाते हैं, यह उसकी आबादी, अर्थव्यवस्था का आकार, भुगतान की आदतों, नोटों के मूल्यवर्ग और नकदी पर निर्भरता जैसे कई कारकों से तय होता है।
डॉलर की ताकत सिर्फ नोटों की संख्या से तय नहीं होती
अमेरिकी डॉलर की वैश्विक स्थिति उसकी बैंकनोट संख्या से नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था में उसकी भूमिका से तय होती है। दुनिया के केंद्रीय बैंक अपने विदेशी मुद्रा भंडार में बड़ी मात्रा में डॉलर रखते हैं। अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वित्तीय बाजारों में भी डॉलर का व्यापक इस्तेमाल होता है। दूसरी ओर, भारत में नकदी का इस्तेमाल अभी भी बड़ी संख्या में रोजमर्रा के लेन-देन में होता है। छोटे और मध्यम मूल्य के लेन-देन में कम मूल्यवर्ग के नोटों की बड़ी भूमिका है। इसलिए समान आर्थिक मूल्य के लेन-देन के लिए भारत में अपेक्षाकृत अधिक नोटों की आवश्यकता पड़ सकती है। यही वजह है कि 176 अरब नोटों का आंकड़ा सीधे तौर पर रुपये की अंतरराष्ट्रीय ताकत का पैमाना नहीं माना जा सकता।
भारत में नोटों की संख्या इतनी ज्यादा क्यों?
RBI के मुताबिक बैंकनोट सर्कुलेशन कई आर्थिक और व्यवहारिक कारकों पर निर्भर करता है। इनमें सबसे महत्वपूर्ण हैं—
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GDP और आर्थिक गतिविधियों का विस्तार
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महंगाई का स्तर
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ब्याज दरें
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नकदी की मांग
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डिजिटल भुगतान का विस्तार
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नोटों के अलग-अलग मूल्यवर्ग
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पुराने और खराब नोटों को हटाने की प्रक्रिया
UPI से ज्यादा नकद भुगतान
भारत की अर्थव्यवस्था पिछले वर्षों में तेजी से बढ़ी है। इसके साथ ही नकदी की कुल मांग भी कई क्षेत्रों में बनी हुई है। हालांकि UPI और अन्य डिजिटल भुगतान माध्यमों ने कैशलेस लेन-देन को काफी बढ़ाया है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि नकदी की जरूरत खत्म हो गई है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था, छोटे कारोबार, स्थानीय बाजार और ऐसे लेन-देन जहां डिजिटल भुगतान की सुविधा सीमित है, वहां नकदी की भूमिका अब भी महत्वपूर्ण है।
हर साल 28 से 30 अरब नए नोट छापे जाते हैं
मुर्मू के मुताबिक, RBI पिछले कुछ वर्षों में हर साल करीब 28 से 30 अरब बैंकनोट छापता रहा है। ये नोट छह अलग-अलग मूल्यवर्ग में जारी किए जाते हैं। इसके साथ ही करीब 21 अरब नोट हर साल चलन से वापस हटाए जाते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि नोटों की छपाई सिर्फ अर्थव्यवस्था में अतिरिक्त नकदी डालने के लिए नहीं होती। इसका एक बड़ा हिस्सा पुराने, गंदे, फटे या अनुपयोगी नोटों को बदलने के लिए होता है। RBI की Clean Note Policy का भी यही उद्देश्य है कि जनता को बेहतर गुणवत्ता वाले साफ-सुथरे नोट उपलब्ध कराए जाएं और खराब नोटों को व्यवस्थित तरीके से सर्कुलेशन से बाहर किया जाए। RBI ने लंबे समय से बैंकों को खराब नोटों को वापस लेने और जनता को अच्छी गुणवत्ता के नोट उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं।
नोट छापना महंगा काम, RBI तलाश रहा बेहतर विकल्प
बैंकनोट तैयार करने में कागज, सुरक्षा फीचर, स्याही, प्रिंटिंग, परिवहन, स्टोरेज और पुराने नोटों के निपटान जैसी कई लागत शामिल होती हैं। इसके अलावा नोट जितनी जल्दी खराब होंगे, उन्हें उतनी ही जल्दी बदलना पड़ेगा। यही कारण है कि केंद्रीय बैंक बैंकनोट की औसत उम्र बढ़ाने के विकल्पों पर ध्यान दे रहा है। इसी संदर्भ में पॉलीमर आधारित नोटों को लेकर भी चर्चा महत्वपूर्ण है। पॉलीमर बैंकनोट कागजी नोटों की तुलना में अधिक टिकाऊ हो सकते हैं और पानी या नमी के प्रभाव को बेहतर तरीके से सहन कर सकते हैं। यदि किसी मूल्यवर्ग के नोट की औसत उम्र बढ़ती है, तो उसके बार-बार उत्पादन और प्रतिस्थापन की जरूरत कम हो सकती है। इससे लंबे समय में मुद्रा प्रबंधन की लागत घटाने में मदद मिल सकती है। हालांकि, पॉलीमर नोटों को अपनाने का फैसला केवल उनकी मजबूती के आधार पर नहीं होता। प्रिंटिंग तकनीक, सुरक्षा, मशीनों के साथ अनुकूलता, रिसाइक्लिंग और पर्यावरणीय प्रभाव जैसे पहलुओं का भी आकलन करना पड़ता है।
भारत में डिजिटल पेमेंट बढ़ा, फिर भी नकदी की मांग कायम
भारत ने डिजिटल पेमेंट के क्षेत्र में बड़ी छलांग लगाई है। UPI ने छोटे से छोटे भुगतान को भी डिजिटल बनाना आसान कर दिया है। इसके बावजूद बैंकनोटों की संख्या का इतना बड़ा होना बताता है कि डिजिटल भुगतान और नकदी अर्थव्यवस्था एक-दूसरे को पूरी तरह खत्म नहीं कर रहे हैं। कई लोग डिजिटल भुगतान का इस्तेमाल नियमित खर्चों के लिए करते हैं, लेकिन नकदी को आपातकालीन जरूरतों, छोटे दुकानदारों, स्थानीय बाजारों और ऐसे स्थानों के लिए रखते हैं जहां डिजिटल कनेक्टिविटी या भुगतान की सुविधा हमेशा उपलब्ध नहीं होती।इसके अलावा, अर्थव्यवस्था के विस्तार के साथ मुद्रा की मांग का स्वरूप भी बदलता रहता है। महंगाई बढ़ने पर समान वस्तुओं और सेवाओं को खरीदने के लिए अधिक रुपये की जरूरत होती है। इससे नकदी की मांग भी प्रभावित हो सकती है।
नोटों की संख्या और नोटों की कीमत में बड़ा अंतर
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। बैंकनोटों की संख्या को उनकी कुल आर्थिक कीमत से अलग करके देखना चाहिए। उदाहरण के लिए, यदि किसी देश में छोटे मूल्यवर्ग के नोट अधिक हैं, तो कुल मुद्रा मूल्य समान होने पर भी नोटों की संख्या बहुत ज्यादा हो सकती है। इसके विपरीत, यदि किसी देश में बड़े मूल्यवर्ग के नोटों का इस्तेमाल ज्यादा है, तो कुल रकम का प्रतिनिधित्व कम संख्या के नोटों से हो सकता है। RBI डिप्टी गवर्नर ने भी इसी तथ्य की ओर संकेत किया है। भारत में अलग-अलग मूल्यवर्ग के नोटों का मिश्रण ऐसा है जिसमें कम मूल्य वाले नोटों की हिस्सेदारी महत्वपूर्ण है। इसलिए समान मूल्य के लेन-देन को पूरा करने के लिए अपेक्षाकृत ज्यादा नोटों की जरूरत पड़ सकती है। यही कारण है कि 176 अरब भारतीय नोटों की तुलना 56 अरब डॉलर नोटों से करते समय केवल संख्या देखना भ्रामक हो सकता है।
रुपये की अंतरराष्ट्रीय भूमिका भी धीरे-धीरे बढ़ रही
बैंकनोटों की संख्या से अलग देखें तो भारतीय रुपया भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी भूमिका बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। भारत कई देशों के साथ स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और भुगतान को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहा है। RBI ने रुपये के अंतरराष्ट्रीय उपयोग को बढ़ाने के लिए कई कदम उठाए हैं। फिर भी अमेरिकी डॉलर की वैश्विक स्थिति अभी बहुत मजबूत है। डॉलर की मांग केवल अमेरिका की घरेलू अर्थव्यवस्था से नहीं आती, बल्कि वैश्विक व्यापार, वित्तीय बाजारों, निवेश और केंद्रीय बैंकों के विदेशी मुद्रा भंडार से भी जुड़ी है। इसलिए सर्कुलेशन में भारतीय नोटों की अधिक संख्या को डॉलर के वैश्विक वर्चस्व के खत्म होने के संकेत के तौर पर देखना सही नहीं होगा।
आगे क्या बदलेगा?
भारत में आने वाले वर्षों में मुद्रा प्रबंधन के सामने दो समानांतर चुनौतियां रहेंगी। एक ओर अर्थव्यवस्था के विस्तार के साथ नकदी की मांग बनी रह सकती है, वहीं दूसरी ओर डिजिटल भुगतान के बढ़ने से लोगों के भुगतान व्यवहार में बदलाव जारी रहेगा।RBI के लिए चुनौती यह होगी कि जनता को पर्याप्त मात्रा में सुरक्षित और उच्च गुणवत्ता वाले बैंकनोट उपलब्ध कराए जाएं, पुराने नोटों को समय पर हटाया जाए और मुद्रा प्रबंधन की लागत को नियंत्रित रखा जाए। पॉलीमर जैसे अधिक टिकाऊ विकल्प, बेहतर सुरक्षा फीचर और आधुनिक करेंसी-मैनेजमेंट तकनीक इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
बैंकनोट की संख्या बढ़ी, रुपए की कीमत नहीं
भारत में 176 अरब बैंकनोटों का सर्कुलेशन निश्चित रूप से एक बड़ा आंकड़ा है और संख्या के मामले में यह अमेरिकी डॉलर तथा यूरो के बैंकनोटों से काफी अधिक है। लेकिन इसे रुपये के डॉलर से ज्यादा ताकतवर होने के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। डॉलर की ताकत उसकी वैश्विक स्वीकार्यता, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वित्तीय बाजारों में उपयोग तथा रिजर्व करेंसी के रूप में उसकी भूमिका से आती है। वहीं भारत में नोटों की अधिक संख्या मुख्य रूप से देश की विशाल आबादी, नकदी की मांग, कम मूल्यवर्ग के नोटों की बड़ी भूमिका और घरेलू आर्थिक गतिविधियों से जुड़ी है।
मुद्रा प्रबंधन की व्यापक भूमिका
RBI की ओर से हर साल करीब 28-30 अरब नोटों की छपाई और लगभग 21 अरब पुराने नोटों को हटाने की प्रक्रिया यह दिखाती है कि भारत में मुद्रा प्रबंधन कितना बड़ा और लगातार चलने वाला ऑपरेशन है। अब पॉलीमर जैसे टिकाऊ विकल्पों और आधुनिक तकनीक के जरिए RBI का लक्ष्य सिर्फ पर्याप्त नोट उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि कम लागत में लंबे समय तक चलने वाली, सुरक्षित और बेहतर गुणवत्ता की मुद्रा व्यवस्था तैयार करना भी है। इसलिए असली कहानी यह नहीं कि रुपया डॉलर से ताकतवर हो गया है, बल्कि यह है कि भारत में बैंकनोटों का सर्कुलेशन दुनिया की प्रमुख मुद्राओं की तुलना में संख्या के लिहाज से कितना बड़ा है।
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