संसद चलो मार्च का सच: 5 हजार पुलिसकर्मी बनाम 30 हजार की भीड़, पुलिस ने कोर्ट को सौंपा गणित

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दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर पर अतिरिक्त बल का प्रयोग नहीं किया: सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा

दिल्ली के जंतर-मंतर पर बीते दिनों हुए छात्रों के उग्र प्रदर्शन और ‘संसद चलो’ मार्च के दौरान पुलिसिया कार्रवाई को लेकर दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में एक महत्वपूर्ण हलफनामा दाखिल किया है। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर किसी भी तरह के अत्यधिक या गैरकानूनी बल प्रयोग के आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। शीर्ष अदालत में दायर अपने जवाब में पुलिस ने स्पष्ट किया कि उन्होंने ‘अधिकतम संयम’ बरतते हुए केवल ‘न्यूनतम आवश्यक बल’ (क्रमानुसार बल/Graded Force) का इस्तेमाल किया था। यह कार्रवाई तब अनिवार्य हो गई थी जब प्रदर्शनकारियों की भारी भीड़ बेकाबू हो गई, सुरक्षा घेरे (बैरिकेड्स) की कई परतों को तोड़ दिया और प्रतिबंधित क्षेत्र में संसद भवन की ओर जबरन बढ़ने का प्रयास किया। यह हलफनामा नई दिल्ली जिले के पुलिस उपायुक्त (DCP) सचिन शर्मा द्वारा उन याचिकाओं के संयुक्त जवाब में दाखिल किया गया है, जिनमें जंतर-मंतर पर नीट (NEET) पेपर लीक मामले को लेकर हुए प्रदर्शन के दौरान पुलिस बर्बरता, लाठीचार्ज और आंसू गैस के कथित दुरुपयोग की कोर्ट की निगरानी में निष्पक्ष या न्यायिक जांच कराने की मांग की गई थी।

प्रदर्शन का ऐतिहासिक संदर्भ और ‘संसद चलो’ मार्च का घटनाक्रम

यह पूरा विवाद 20 जुलाई 2026 को नीट-यूजी (NEET-UG) परीक्षा में कथित अनियमितताओं और प्रश्नपत्र लीक के विरोध में आयोजित एक विशाल छात्र आंदोलन से जुड़ा है। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के बैनर तले छात्र, युवा स्वयंसेवक और कई विपक्षी दलों के नेता पिछले कई हफ्तों से जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण धरना दे रहे थे। इस आंदोलन को प्रसिद्ध पर्यावरणविद् और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक का भी समर्थन प्राप्त था, जिन्होंने भूख हड़ताल की थी। हालांकि, यह आंदोलन बाद में तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और सरकार के साथ बातचीत के बाद 25 जुलाई को समाप्त घोषित कर दिया गया था, लेकिन 20 जुलाई की हिंसक झड़प का कानूनी विवाद अब भी शीर्ष अदालत के समक्ष लंबित है।

संसद मार्च की नहीं थी अनुमति

दिल्ली पुलिस ने अपने हलफनामे में उल्लेख किया है कि प्रदर्शनकारियों को केवल जंतर-मंतर के निर्धारित स्थल पर ही सीमित और शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने की अनुमति दी गई थी। दिल्ली पुलिस के स्टैंडिंग ऑर्डर और स्थापित नियमों के अनुसार, जंतर-मंतर पर किसी भी विरोध प्रदर्शन में अधिकतम 1,000 लोगों के जुटने की सीमा तय है और बिना पूर्व अनुमति के वहां से किसी भी प्रकार के जुलूस या मार्च निकालने पर पूर्ण प्रतिबंध है। इसके बावजूद, 20 जुलाई को प्रदर्शनकारियों ने अचानक ‘संसद चलो’ मार्च का आह्वान कर दिया। इस अवैध मार्च के कारण मध्य दिल्ली का एक बड़ा हिस्सा छावनी में तब्दील हो गया था। जब हजारों की संख्या में छात्रों और अन्य तत्वों ने सुरक्षा व्यवस्था को चुनौती दी, तो पुलिस को सुरक्षात्मक कदम उठाने पड़े।

‘5 हजार पुलिसकर्मी बनाम 30 हजार की भीड़’ – असमान संख्या का गणित

न्यायालय के समक्ष जमीनी हकीकत पेश करते हुए दिल्ली पुलिस ने आंकड़ों का विवरण साझा किया है। हलफनामे के मुताबिक, प्रदर्शन के दिन लगभग तीन किलोमीटर के लंबे और व्यापक दायरे में 30,000 से अधिक प्रदर्शनकारी मौजूद थे। इस भारी और उग्र भीड़ को नियंत्रित करने तथा कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए मौके पर केवल 5,000 पुलिसकर्मियों और सुरक्षा बलों के जवानों की तैनाती की गई थी। पुलिस का तर्क है कि इतनी बड़ी और आक्रामक भीड़ के सामने सुरक्षाकर्मियों की संख्या बेहद कम थी। जब भीड़ के कुछ हिस्सों ने हिंसक रुख अपना लिया और पुलिसकर्मियों पर पथराव शुरू कर दिया, तब स्थिति अत्यधिक तनावपूर्ण और नियंत्रण से बाहर होने लगी थी। भीड़ के हिंसक व्यवहार के कारण जमीनी स्तर पर तैनात सुरक्षा अधिकारियों के पास भीड़ को तितर-बितर करने और संसद भवन जैसी संवेदनशील राष्ट्रीय संपत्तियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सीमित विकल्प बचे थे।

क्रमानुसार बल प्रयोग (Graded Force) और दोनों पक्षों को हुई क्षति

याचिकाकर्ताओं द्वारा लगाए गए बर्बर लाठीचार्ज और क्रूरता के आरोपों का खंडन करते हुए पुलिस ने कहा कि उनके द्वारा उठाए गए सभी कदम पूरी तरह से कानूनी और पुलिस मैनुअल के अनुरूप थे। पुलिस ने अचानक बल प्रयोग नहीं किया, बल्कि स्थिति की गंभीरता को देखते हुए चरणबद्ध या क्रमानुसार (Graded Approach) नीति अपनाई। भीड़ को आगे बढ़ने से रोकने के लिए पहले कई बार मौखिक चेतावनियां और लाउडस्पीकर के माध्यम से निर्देश दिए गए। जब भीड़ ने बैरिकेड्स की कई परतों को क्षतिग्रस्त कर दिया और सुरक्षाकर्मियों को धक्का देकर आगे बढ़ने लगे, तब जाकर वॉटर कैनन, आंसू गैस के गोले और अंत में हल्के लाठीचार्ज का सहारा लिया गया ताकि भीड़ को पीछे धकेला जा सके। इस हिंसक टकराव में दोनों पक्षों को भारी नुकसान उठाना पड़ा। दिल्ली पुलिस के हलफनामे के अनुसार, प्रदर्शनकारियों के अप्रत्याशित और हिंसक हमलों में 240 से अधिक पुलिसकर्मी, वर्दीधारी अधिकारी और सुरक्षा बल के जवान घायल हुए। उग्र प्रदर्शनकारियों ने कई जगह अकेले खड़े पुलिसकर्मियों को घेरकर पीटा, उनके सुरक्षा उपकरण और ढाल छीन लीं और उन्हें पत्थरों से भरी सड़कों पर बेरहमी से घसीटा व धक्का दिया। इस झड़प में करीब 200 प्रदर्शनकारी और आम नागरिक भी चोटिल हुए, जिन्हें तत्काल नजदीकी अस्पतालों में उपचार उपलब्ध कराया गया।

‘कील वाली लाठियों’ और ‘पैलेट गन’ के आरोपों पर बिंदुवार सफाई

छात्रों और नागरिक अधिकार संगठनों ने सोशल मीडिया पर प्रसारित कुछ वीडियो के आधार पर दिल्ली पुलिस पर आरोप लगाया था कि उन्होंने प्रदर्शनकारियों को दबाने के लिए ‘कीलों से लैस लाठियों’ (Nail-studded lathis) और ‘पैलेट गन’ जैसी घातक प्रणालियों का इस्तेमाल किया। दिल्ली पुलिस ने इन गंभीर आरोपों को पूरी तरह भ्रामक और मनगढ़ंत करार दिया है।

कील वाली लाठियों का सच

हलफनामे में स्पष्ट किया गया है कि याचिकाओं में जिस वीडियो क्लिप का हवाला दिया जा रहा है, वह एक अधूरी और चुनिंदा घटना है। वीडियो की जांच से पता चलता है कि वह वस्तु किसी पुलिसकर्मी के हाथ में नहीं, बल्कि स्वयं एक प्रदर्शनकारी के हाथ में थी। वह कोई पुलिसिया लाठी नहीं थी, बल्कि एक लकड़ी का डंडा था जिस पर प्रदर्शनकारी ने राष्ट्रीय ध्वज बांध रखा था। इसके अलावा, किसी भी घायल व्यक्ति के मेडिकल रिकॉर्ड में कील से लगी चोट का कोई साक्ष्य या सबूत सामने नहीं आया है। लाठियां भीड़ को नियंत्रित करने के लिए कानूनन मान्य उपकरण हैं, जिनका उपयोग केवल आत्मरक्षा और बैरिकेड्स की रक्षा के लिए किया गया।

पैलेट गन का इस्तेमाल

केंद्रीय मंत्रियों और पुलिस अधिकारियों ने पहले ही संसद और मीडिया वार्ताओं में स्पष्ट कर दिया है कि दिल्ली जैसे मेट्रो शहर में छात्रों के खिलाफ पैलेट गन का इस्तेमाल करने की कोई स्थापित नीति नहीं है। यदि पैलेट गन चलाई गई होती, तो सैकड़ों लोग छर्रों से घायल होते, जबकि ऐसी कोई व्यापक मेडिकल रिपोर्ट दर्ज नहीं है।

सादे कपड़ों में जवानों की तैनाती और निजता के हनन पर रुख

सोशल मीडिया पर कुछ ऐसे वीडियो भी वायरल हुए थे जिनमें सादे कपड़ों (सिविल ड्रेस) में कुछ लोग लंबी लाठियां लेकर प्रदर्शनकारियों को दौड़ाते दिख रहे थे। आलोचकों ने इसे पुलिस बल की अवैध कार्यशैली बताया था। इस पर सफाई देते हुए दिल्ली पुलिस ने कहा कि यह एक सामान्य और पूर्व-नियोजित रणनीतिक पुलिसिंग का हिस्सा था। कानून-व्यवस्था की आपातकालीन स्थिति को देखते हुए स्पेशल ब्रांच, स्पेशल सेल, क्राइम ब्रांच और स्थानीय पुलिस के ‘स्पॉटर्स’ (Spotters) को रणनीतिक रूप से भीड़ के भीतर तैनात किया गया था ताकि उपद्रवी तत्वों पर नजर रखी जा सके। यह कोई असामान्य या गैर-कानूनी कदम नहीं है। स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस जैसे बड़े सार्वजनिक राष्ट्रीय आयोजनों में भी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए हमेशा ऐसी खुफिया तैनाती की जाती है।

फेशियल रिकॉग्निशन सॉफ्टवेयर (FRS)

विरोध स्थल पर फेशियल रिकॉग्निशन सॉफ्टवेयर (FRS) और तकनीकी निगरानी के उपयोग को पुलिस ने पूरी तरह से न्यायसंगत और आनुपातिक (Proportionate Policing) कदम ठहराया है। पुलिस ने साफ किया कि इस तकनीक का उद्देश्य शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे निर्दोष छात्रों की प्रोफाइलिंग करना, उनकी निजता का हनन करना या उन पर अनावश्यक निगरानी रखना बिल्कुल नहीं था। यह सॉफ्टवेयर केवल उन लोगों को चिन्हित करता है जिनका पहले से गंभीर आपराधिक इतिहास रहा है। ट्रैफिक चालान जैसे छोटे मामलों वाले लोगों या सामान्य नागरिकों की पहचान इसके जरिए नहीं की जाती। केवल तकनीक के आधार पर कोई कार्रवाई नहीं होती, बल्कि ग्राउंड वेरिफिकेशन के बाद ही पुष्टि की जाती है।

आंदोलन में असामाजिक तत्वों की घुसपैठ और आपराधिक रिकॉर्ड का सनसनीखेज दावा

दिल्ली पुलिस के हलफनामे का सबसे चौंकाने वाला पहलू प्रदर्शन में शामिल लोगों की आपराधिक पृष्ठभूमि से जुड़ा है। पुलिस का दावा है कि इस छात्र आंदोलन की आड़ में बड़े पैमाने पर असामाजिक तत्वों और आदतन अपराधियों ने रैली में घुसपैठ कर ली थी, जिनका मुख्य उद्देश्य शांतिपूर्ण माहौल को बिगाड़ना और पुलिस के साथ हिंसक टकराव पैदा करना था। तकनीकी जांच और फेशियल रिकॉग्निशन डेटा के विश्लेषण से पुलिस ने प्रदर्शन स्थल पर 2,873 ऐसे व्यक्तियों की पहचान की है जिन पर पहले से गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं। इन चिन्हित लोगों पर हत्या, हत्या का प्रयास, डकैती, जबरन वसूली, बलात्कार और पॉक्सो (POCSO) अधिनियम जैसे बेहद गंभीर संगीन अपराधों के मुकदमे विभिन्न थानों में दर्ज हैं। इनमें से 47 लोग घोषित ‘हिस्ट्रीशीटर’ हैं और 92 व्यक्ति ऐसे हैं जो 10 से अधिक आपराधिक मामलों में संलिप्त रहे हैं। पुलिस कमिश्नर द्वारा गठित विशेष जांच दल (SIT) अब केवल इन्हीं 2,873 संदिग्ध और आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों की भूमिका की जांच करेगी। पुलिस ने स्पष्ट किया है कि जिन छात्रों का कोई पुराना आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है, उनके खिलाफ कोई दंडात्मक जांच या उत्पीड़न की कार्रवाई नहीं की जाएगी।

न्यायालय की टिप्पणियां और भावी कदम

इससे पहले की सुनवाइयों में सुप्रीम कोर्ट के माननीय न्यायाधीशों की पीठ ने स्पष्ट रूप से कहा था कि शांतिपूर्ण तरीके से विरोध प्रदर्शन करना भारत के प्रत्येक नागरिक का मौलिक और संवैधानिक अधिकार है। अदालत ने टिप्पणी की थी कि पुलिस तब तक लाठीचार्ज या बल प्रयोग नहीं कर सकती जब तक कि प्रदर्शन कानून-व्यवस्था और सार्वजनिक सुरक्षा के लिए वास्तविक खतरा न बन जाए। इसके साथ ही, कोर्ट ने भीड़ द्वारा अकेले पाए गए पुलिसकर्मियों पर किए गए हमलों और सुरक्षा उपकरणों की कमी को लेकर भी चिंता जताई थी और केंद्र सरकार से जवाब मांगा था।

जांच मे सहयोग के लिए तैयार दिल्ली पुलिस

दिल्ली पुलिस ने अपने नवीनतम हलफनामे में अदालत के प्रति पूर्ण सम्मान व्यक्त करते हुए कहा है कि यदि माननीय सर्वोच्च न्यायालय इस घटना में बल प्रयोग की आनुपातिकता की जांच के लिए किसी स्वतंत्र या विशेष समिति का गठन करने का प्रस्ताव करता है, तो दिल्ली पुलिस उस समिति के साथ पूर्ण सहयोग करने के लिए पूरी तरह तैयार है। पुलिस ने अदालत से अनुरोध किया है कि याचिकाकर्ताओं द्वारा प्रस्तुत की गई चुनिंदा और एकतरफा तस्वीरों व अपुष्ट मीडिया रिपोर्टों को खारिज किया जाए, क्योंकि वे जमीनी सच्चाई और पुलिस की वैध कानूनी कार्रवाई को पूरी तरह से प्रदर्शित नहीं करती हैं। सुप्रीम कोर्ट इस मामले पर आगामी दिनों में विस्तृत सुनवाई जारी रखेगा, जहां पुलिस के इन दावों और याचिकाकर्ताओं के साक्ष्यों की कानूनी समीक्षा की जाएगी।

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