कैंसर दवाओं की कीमत पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा सवाल

The CSR Journal Magazine

सुप्रीम कोर्ट ने उठाए गंभीर सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कैंसर की दवाओं की कीमतों को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत ने पूछा है कि दवाओं की कीमत तय करने की व्यवस्था में इतना बड़ा अंतर क्यों है। जस्टिस संदीप मेहता के नेतृत्व में एक बेंच ने यह सवाल उठाया कि ऐसी जरूरी दवाओं को मूल्य नियंत्रण से बाहर रखने का क्या आधार है। जस्टिस ने स्पष्ट रूप से कहा कि सरकारी नीति में इस तरह के अंतर की कोई जगह नहीं होनी चाहिए।

दवाओं की कीमतों में भारी अंतर

कोर्ट में इस मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस संदीप मेहता ने एक दवा की उदाहरण दी, जिसकी अधिकतम खुदरा कीमत (MRP) 27,000 रुपये है जबकि उसी दवा का प्राइस टू रिटेलर केवल 3,000 रुपये निर्धारित है। दोनों कीमतों के बीच भारी अंतर देखकर अदालत ने ताज्जुब जताया और पूछा कि इस असमानता को कैसे सही ठहराया जा सकता है।

मार्जिन फिक्स करने का सुझाव

जस्टिस मेहता ने यह भी सुझाव दिया कि कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों की दवाओं पर 16% का एक निश्चित मार्जिन क्यों नहीं रखा जा सकता है। ऐसा करने से दवाओं की कीमतों में स्थिरता आएगी और आम लोगों के लिए इनकी उपलब्धता भी सुनिश्चित होगी। इस तरह के कदम से लोग महंगी दवाओं की वजह से होने वाली मानसिक परेशानी से भी बच सकेंगे।

दवाइयों का उपलब्धता का मुद्दा

कैंसर के इलाज के लिए आवश्यक दवाओं की कीमतों में इस तरह का अंतर कई सवाल खड़े करता है। अदालत ने कहा कि ऐसी दवाएं जिनकी जरूरत लोगों को जीवन बचाने के लिए होती है, उन पर नजर रखने की जरूरत है। यह मुद्दा उस समय और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब आम लोगों को स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता की कमी का सामना करना पड़ता है।

कानूनी प्रावधानों पर चर्चा

बेंच ने यह भी ज़िक्र किया कि मौजूदा कानून और नियम दवाओं की कीमतों के निर्धारण में असंगतता पैदा कर रहे हैं। अदालत ने राज्यों से अपेक्षा की है कि वे इस विषय पर Can seek advice from the central government। इससे स्पष्ट होगा कि मरीजों को दी जाने वाली दवाओं की कीमतें क्या होनी चाहिए।

आगे की सुनवाई की तैयारी

इस मामले की आगे सुनवाई अगले सत्र में होगी, जहाँ अदालत और भी बारीकी से इस मुद्दे पर विचार कर सकती है। सुप्रीम कोर्ट की इस पहल से उम्मीद की जा रही है कि इससे कैंसर दवाओं की कीमतों में परिवर्तन आएगा और आम लोगों को राहत मिलेगी। कोर्ट का यह कदम कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के उपचार को सस्ता और प्रभावी बनाने में सहायक सिद्ध हो सकता है।

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