मातृत्व अवकाश के बाद नौकरी में बड़ा अधिकार: दिल्ली हाईकोर्ट का अहम फैसला, महिला को वही पद या समान दर्जे की पोस्ट देने का निर्देश
मातृत्व अवकाश लेने वाली महिला कर्मचारियों के नौकरी और करियर से जुड़े अधिकारों को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि मातृत्व अवकाश से लौटने वाली महिला कर्मचारी को सामान्य परिस्थितियों में उसी पद पर वापस नियुक्त किया जाना चाहिए, जिस पद पर वह अवकाश पर जाने से पहले काम कर रही थी। यदि किसी वास्तविक और उचित संगठनात्मक कारण से वही पद उपलब्ध नहीं है, तो महिला को ऐसा समकक्ष पद दिया जाना चाहिए, जिसमें वेतन, ग्रेड, दर्जा, जिम्मेदारियां, अधिकार और करियर में आगे बढ़ने की संभावनाएं लगभग समान हों। यह फैसला खास इसलिए है क्योंकि अदालत ने मातृत्व सुरक्षा को केवल छुट्टी, वेतन या नौकरी बचाने तक सीमित नहीं माना। कोर्ट ने कहा कि महिला को मातृत्व अवकाश से लौटने के बाद उसके पद की वास्तविक जिम्मेदारियों, अधिकार, रिपोर्टिंग संरचना और भविष्य की पदोन्नति के अवसरों से भी वंचित नहीं किया जा सकता।
क्या है पूरा मामला?
दिल्ली हाईकोर्ट का यह फैसला Rakhi Bisht v. Union of India & Anr., W.P.(C) 14785/2024 से संबंधित है। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति सचिन दत्ता ने की। फैसला 31 अगस्त 2026 को दिया गया और इसके बारे में 1 सितंबर को व्यापक रूप से जानकारी सामने आई। मामले में याचिकाकर्ता एक चार्टर्ड अकाउंटेंट थीं और एक निजी कंपनी में Manager–Accounting के पद पर कार्यरत थीं। वह मातृत्व अवकाश पर गईं। उनके अवकाश के दौरान उनकी पहले वाली भूमिका किसी अन्य कर्मचारी को दे दी गई। जब वह मातृत्व अवकाश के बाद वापस काम पर लौटीं तो उन्हें उनकी पुरानी भूमिका के बजाय Treasury विभाग में काम सौंपा गया। कर्मचारी की शिकायत का मूल मुद्दा यह था कि भले ही उनकी नौकरी और वेतन को औपचारिक रूप से खत्म नहीं किया गया था, लेकिन उनकी मूल भूमिका, जिम्मेदारियां और पेशेवर स्थिति प्रभावित हो गई थी।
सिर्फ पदनाम और वेतन बचाना पर्याप्त नहीं
दिल्ली हाईकोर्ट ने इस मामले में एक महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत स्पष्ट किया। अदालत ने कहा कि किसी महिला कर्मचारी को वापस उसी वेतन और उसी designation पर रख देना ही पर्याप्त नहीं है, यदि उसके काम की वास्तविक प्रकृति, अधिकार और करियर की संभावनाएं कम कर दी गई हों।अदालत के अनुसार, “conditions of service” यानी सेवा की शर्तों का अर्थ केवल वेतन या designation नहीं है। इसमें नौकरी की वास्तविक जिम्मेदारियां, functional status, reporting hierarchy, supervisory powers और appraisal तथा promotion के अवसर भी शामिल हो सकते हैं। इसका सीधा अर्थ यह है कि यदि किसी महिला को मातृत्व अवकाश से पहले मैनेजर स्तर की जिम्मेदारी, टीम पर अधिकार और निर्णय लेने की भूमिका मिली हुई थी, तो वापस आने पर उसे केवल नाम का वही पद देकर ऐसी भूमिका नहीं दी जा सकती जिसमें उसके वास्तविक अधिकार काफी कम हो जाएं।
अदालत ने कहा—मातृत्व करियर के लिए नुकसान का कारण नहीं बन सकता
अदालत ने स्पष्ट किया कि मातृत्व को महिला के पेशेवर जीवन में नुकसान का कारण नहीं बनने दिया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि “motherhood cannot be allowed to become a source of ignominy at the workplace” यानी मातृत्व को कार्यस्थल पर महिला के लिए अपमान या नुकसान का कारण नहीं बनने दिया जा सकता। यह टिप्पणी उस व्यापक सिद्धांत को मजबूत करती है कि महिला को बच्चे को जन्म देने और मातृत्व अवकाश लेने के कारण अपने करियर में छिपे हुए या अप्रत्यक्ष नुकसान का सामना नहीं करना चाहिए।
अगर पुराना पद उपलब्ध नहीं है तो क्या होगा?
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि हर परिस्थिति में पुराने पद को उसी रूप में वापस देना संभव हो, यह जरूरी नहीं है। किसी संस्था में वास्तविक पुनर्गठन, पद समाप्त होना या अन्य Bona fide organisational reasons हो सकते हैं। लेकिन ऐसी स्थिति में भी नियोक्ता महिला को मनमाने ढंग से कोई कमतर काम नहीं दे सकता। यदि पुराना पद वास्तव में उपलब्ध नहीं है, तो उसे समान या लगभग समान पद दिया जाना चाहिए। इस समकक्ष पद में मुख्य रूप से ये बातें देखी जानी चाहिए—
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वेतन समान या पर्याप्त रूप से समान हो;
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ग्रेड और पद का स्तर कम न हो;
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सामाजिक और पेशेवर दर्जा समान हो;
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जिम्मेदारियां पर्याप्त रूप से समान हों;
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managerial/functional authority प्रभावित न हो;
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reporting structure में अनुचित गिरावट न हो;
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promotion और career advancement के अवसर बने रहें।
अदालत ने यह भी कहा कि यदि पुराना पद उपलब्ध नहीं है तो महिला के काम पर लौटने से पहले नियोक्ता को उसे पद उपलब्ध न होने के कारण और प्रस्तावित वैकल्पिक/समकक्ष पद की जानकारी देनी चाहिए।
कंपनी ने क्या दलील दी?
मामले में नियोक्ता की ओर से यह कहा गया कि कर्मचारी को दूसरी भूमिका में भेजना कारोबारी जरूरतों के कारण था और यह किसी तरह की demotion नहीं थी। लेकिन अदालत ने परिस्थितियों को देखते हुए पाया कि कर्मचारी की वापसी से कुछ ही समय पहले उसके लिए काम तलाशने की प्रक्रिया शुरू हुई। कोर्ट के सामने यह भी आया कि सहयोगियों से पूछा गया कि उनके पास उसे देने के लिए “कुछ” या “कोई” काम है या नहीं। अदालत ने इसे उस स्तर की पूर्व नियोजित और उचित व्यवस्था नहीं माना, जो किसी वरिष्ठ कर्मचारी के मातृत्व अवकाश से लौटने पर अपेक्षित थी।
₹11.50 लाख का मुआवजा
दिल्ली हाईकोर्ट ने मामले में याचिकाकर्ता के पक्ष में आर्थिक राहत भी दी। अदालत ने ₹10 लाख का मुआवजा और ₹1.5 लाख की litigation costs यानी कुल ₹11.5 लाख भुगतान करने का निर्देश दिया। यह राशि निर्धारित अवधि में नहीं चुकाने पर 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज का प्रावधान भी किया गया। यह मुआवजा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि फैसला केवल भविष्य के लिए सामान्य टिप्पणी नहीं करता, बल्कि महिला कर्मचारी को हुए पेशेवर नुकसान के लिए ठोस आर्थिक राहत भी देता है।
केंद्र सरकार को छह महीने में नियम बनाने का निर्देश
दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने फैसले में केवल संबंधित कर्मचारी को राहत देकर मामला समाप्त नहीं किया। अदालत ने केंद्र सरकार को भी छह महीने के भीतर आवश्यक नियम, योजना या दिशा-निर्देश तैयार करनेको कहा है, ताकि मातृत्व अवकाश के बाद महिलाओं की वापसी को लेकर स्पष्ट व्यवस्था बनाई जा सके। प्रस्तावित व्यवस्था में कई महत्वपूर्ण विषयों को शामिल करने की बात कही गई है, जैसे—
1. भूमिका और पद की सुरक्षा: मातृत्व अवकाश के बाद महिला को उसके पुराने या समकक्ष पद पर लौटने की स्पष्ट सुरक्षा।
2. Pregnancy-related accommodation: गर्भावस्था के दौरान काम की परिस्थितियों में आवश्यक समायोजन।
3. Lactation support: बच्चे को स्तनपान कराने वाली माताओं के लिए आवश्यक सुविधाएं।
4. क्रेच की व्यवस्था: कार्यस्थल पर क्रेच सुविधा की वास्तविक उपलब्धता और उसके प्रभावी संचालन की निगरानी।
5. शिकायत निवारण: मातृत्व से जुड़े मामलों में शिकायतों का समयबद्ध समाधान।
6. Retaliation से सुरक्षा: मातृत्व अवकाश लेने के कारण महिला के खिलाफ प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रतिशोधात्मक कार्रवाई से सुरक्षा।
Maternity Benefit Act की धारा 12 का क्या महत्व है?
इस मामले में Maternity Benefit Act, 1961 की धारा 12(1) महत्वपूर्ण रही। अदालत ने इस प्रावधान की व्याख्या करते हुए माना कि मातृत्व अवकाश के दौरान महिला के सेवा संबंधी अधिकारों को उसके नुकसान के लिए बदला नहीं जा सकता। अदालत ने इस सुरक्षा को केवल नौकरी से निकालने या वेतन कम करने तक सीमित नहीं माना। इसके दायरे में नौकरी की वास्तविक स्थिति और जिम्मेदारियां भी आ सकती हैं। यही इस फैसले की सबसे महत्वपूर्ण बात है—महिला को नौकरी पर बनाए रखना ही पर्याप्त नहीं; उसे ऐसी नौकरी भी मिलनी चाहिए जिसमें मातृत्व के कारण उसके पेशेवर अधिकारों को कमजोर न किया गया हो।
क्या हर महिला को हर स्थिति में बिल्कुल वही सीट और वही पद मिलेगा?
यहां कानूनी स्थिति को सही तरीके से समझना जरूरी है। हाईकोर्ट का फैसला यह नहीं कहता कि किसी भी संगठनात्मक बदलाव की स्थिति में नियोक्ता कभी भी पद नहीं बदल सकता। अदालत ने “ordinarily” यानी सामान्यतः उसी पद पर वापसी का अधिकार माना है। यदि किसी वास्तविक और bona fide कारण से वह पद उपलब्ध नहीं है, तो समकक्ष भूमिका दी जानी चाहिए। लेकिन नियोक्ता को यह दिखाना होगा कि बदलाव वास्तविक संगठनात्मक आवश्यकता के कारण है और उसका संबंध महिला के मातृत्व अवकाश से नहीं है। इसके अलावा, अगर महिला स्वयं अपनी मातृत्व के बाद की परिस्थितियों को देखते हुए काम के घंटे, स्थान, duties या role में उचित बदलाव चाहती है, तो ऐसी मांग पर भी नियोक्ता को उचित तरीके से विचार करना होगा।
पहले भी दिल्ली हाईकोर्ट ने मातृत्व अधिकारों को माना है अहम
यह फैसला अचानक सामने आया कोई अलग-थलग कानूनी विचार नहीं है। दिल्ली हाईकोर्ट पहले भी मातृत्व को महिलाओं की गरिमा, समानता और कार्यस्थल पर अधिकारों से जोड़कर देख चुका है। Rehmat Fatima v. State of NCT of Delhi मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने 2023 में कहा था कि मातृत्व लाभ केवल स्थायी कर्मचारियों तक सीमित नहीं हैं और परिस्थितियों के अनुसार contractual, ad hoc तथा temporary महिला कर्मचारियों के अधिकारों की भी रक्षा की जानी चाहिए। अदालत ने उस मामले में मातृत्व अवकाश और संबंधित लाभों को लेकर व्यापक निर्देश दिए थे। इसी तरह 2024 में Delhi Police v. Ravina Yadav मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने मातृत्व लाभ के उद्देश्य को महिला की गरिमा, मां और बच्चे के स्वास्थ्य तथा कामकाजी जीवन में समानता से जोड़ा था। इस दृष्टिकोण को बाद के न्यायिक फैसलों में भी महत्व दिया गया है।
कामकाजी महिलाओं के लिए क्यों महत्वपूर्ण है फैसला?
भारत में बड़ी संख्या में महिलाएं निजी कंपनियों, सरकारी संस्थानों, स्कूलों, अस्पतालों, बैंकों, स्टार्टअप और अन्य संगठनों में काम करती हैं। कई बार मातृत्व अवकाश के बाद महिला औपचारिक रूप से नौकरी पर तो वापस आ जाती है, लेकिन उसे पहले जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां नहीं मिलतीं।ऐसी स्थिति में महिला के designation और salary में कोई बदलाव दिखाई नहीं देता, लेकिन उसकी टीम, authority, decision-making power और promotion prospects कम हो सकते हैं। दिल्ली हाईकोर्ट का यह फैसला ऐसी स्थिति को लेकर एक महत्वपूर्ण न्यायिक संदेश देता है कि मातृत्व अवकाश को करियर की कीमत पर नहीं दिया जा सकता।
महिला कर्मचारियों को अब क्या समझना चाहिए?
इस फैसले के बाद मातृत्व अवकाश से लौटने वाली महिला कर्मचारी के लिए कुछ महत्वपूर्ण बातें सामने आती हैं:
पहला, मातृत्व अवकाश लेना अपने आप में करियर में नुकसान का आधार नहीं बन सकता।
दूसरा, वापस लौटने पर सामान्यतः पुराने पद पर बहाली अपेक्षित है।
तीसरा, अगर पुराना पद वास्तविक कारण से उपलब्ध नहीं है, तो समकक्ष पद दिया जाना चाहिए।
चौथा, केवल designation और salary को बनाए रखना पर्याप्त नहीं हो सकता, यदि वास्तविक जिम्मेदारियां और अधिकार काफी कम कर दिए गए हों।
पांचवां, मातृत्व के कारण promotion, appraisal या career progression के अवसरों को अनुचित रूप से प्रभावित नहीं किया जाना चाहिए।
छठा, यदि नियोक्ता भूमिका में बदलाव करता है तो उसके पीछे वास्तविक और मातृत्व से असंबंधित कारण होना चाहिए।
फैसला केवल एक कर्मचारी तक सीमित नहीं
हालांकि यह निर्णय एक विशेष मामले में आया है, लेकिन इसमें अदालत ने मातृत्व सुरक्षा को लेकर जो व्यापक सिद्धांत निर्धारित किए हैं, वे कार्यस्थल पर महिलाओं के अधिकारों की बहस में महत्वपूर्ण हैं।अदालत ने यह स्पष्ट करने की कोशिश की है कि मातृत्व अवकाश कोई “career break” नहीं है, जिसकी कीमत महिला को अपने पेशेवर भविष्य से चुकानी पड़े। महिला कर्मचारी को बच्चे को जन्म देने और मातृत्व की जिम्मेदारी निभाने के कारण नौकरी में लौटने पर कमतर स्थिति स्वीकार करने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए।
कामकाजी महिलाओं के हक में बड़ा फैसला
दिल्ली हाईकोर्ट का यह फैसला कामकाजी महिलाओं के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी संदेश लेकर आया है। मातृत्व अवकाश के बाद नौकरी पर लौटने वाली महिला को सामान्यतः उसी पद पर वापस आने का अधिकार है, जिस पद पर वह अवकाश से पहले काम कर रही थी। यदि वह पद वास्तविक कारण से उपलब्ध नहीं है, तो उसे वेतन, ग्रेड, दर्जे, जिम्मेदारियों, अधिकार और करियर की संभावनाओं के लिहाज से समान या लगभग समान पद दिया जाना चाहिए।
हर महिला को सम्मान का हक
इस फैसले की सबसे अहम बात यह है कि अदालत ने मातृत्व सुरक्षा को केवल “नौकरी बचाने” का अधिकार नहीं माना, बल्कि सम्मानजनक और समान पेशेवर वापसी का अधिकार माना है। साथ ही केंद्र को छह महीने के भीतर व्यापक दिशा-निर्देश तैयार करने का निर्देश दिया गया है, जिससे भविष्य में महिलाओं को मातृत्व के बाद भूमिका, क्रेच, स्तनपान सुविधा और शिकायत निवारण से जुड़े मामलों में अधिक स्पष्ट सुरक्षा मिल सके।
नोट: यह फैसला विशेष मामले के तथ्यों पर आधारित है और “हर परिस्थिति में बिल्कुल वही पद” की पूर्ण गारंटी के बजाय सामान्यतः उसी पद या, उसके वास्तविक रूप से उपलब्ध न होने पर, समान पद की सुरक्षा देता है। इसलिए किसी व्यक्तिगत सेवा-विवाद में लागू नियम, रोजगार अनुबंध और मामले के तथ्यों को अलग से देखना जरूरी होगा।
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