दिल्ली दंगा मुआवजा: 21 करोड़ के भुगतान पर हाई कोर्ट अड़ा, सरकार की याचिका नामंजूर

The CSR Journal Magazine

2020 के दिल्ली दंगा पीड़ितों को 21 करोड़ का मुआवजा, हाई कोर्ट ने खारिज की सरकार की अपील

दिल्ली हाई कोर्ट ने 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगा पीड़ितों को ₹21.71 करोड़ का मुआवजा वितरित करने के अपने आदेश को वापस लेने (Recall) की सरकार की अपील को खारिज कर दिया है। दिल्ली उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने इस मामले में दखल देने से साफ इनकार करते हुए पीड़ितों के हक में फैसला बरकरार रखा है।

दिल्ली हाई कोर्ट का बड़ा फैसला

दिल्ली हाई कोर्ट ने 2020 में हुए दंगों के पीड़ितों को 21 करोड़ रुपए मुआवजा देने के आदेश को बरकरार रखा है। अदालत ने दिल्ली सरकार की उस अपील को खारिज कर दिया, जिसमें मुआवजा देने के आदेश को वापस लेने की मांग की गई थी।

सरकार का तर्क और कोर्ट की प्रतिक्रिया

दिल्ली सरकार ने कोर्ट में कहा कि मुआवजा दंगाइयों से वसूला जाना चाहिए, ना कि सरकार से। लेकिन कोर्ट ने फैसले को सुनते समय यह पूछा कि क्या सरकार ने उन आरोपियों से धन वसूली के लिए कोई व्यवस्था की है? सरकार की ओर से यह स्पष्ट नहीं किया गया कि ऐसी व्यवस्था कब होगी।

फरवरी 2020 के दंगों का भयावह इतिहास

उत्तर-पूर्वी दिल्ली में फरवरी 2020 में हुए दंगों में 53 लोगों की मृत्यु हुई और 700 से अधिक लोग घायल हुए थे। इन दंगों से बड़ी संख्या में लोगों के घरों और दुकानों को भी नुकसान पहुंचा था। दंगों का यह सिलसिला 23 फरवरी से शुरू हुआ था।

NEDRCC का गठन और मुआवजे की सिफारिश

फरवरी 2020 में हुए दंगों के बाद पीड़ितों ने ‘उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगा दावा आयोग’ (NEDRCC) के समक्ष लगभग ₹153.69 करोड़ के मुआवजे का दावा किया था। जांच के बाद आयोग (NEDRCC) ने 1,731 दावेदारों के लिए ₹21.71 करोड़ के मुआवजे की सिफारिश की थी।

हाई कोर्ट के आदेश का विरोध

हाई कोर्ट की सिंगल-जज बेंच ने 15 जनवरी, 2025 को सरकार को यह राशि जल्द जारी करने का निर्देश दिया था। सरकार ने इसके खिलाफ याचिका दायर की, जिसे कोर्ट ने मई 2025 में खारिज कर दिया और अब दोबारा बड़ी बेंच (Division Bench) ने भी सरकार की अपील को नामंजूर कर दिया है। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के एक पुरानी निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि खतरे का भुगतान दंगाइयों पर होना चाहिए, ना कि सरकार पर।

कोर्ट ने सरकार के तर्कों पर गंभीर सवाल उठाए:पीड़ित कहां जाएं?

कोर्ट ने सरकार से पूछा कि क्या पीड़ित दंगाइयों को खुद ढूंढकर उनसे पैसा मांगेंगे? सरकार ने दलील दी थी कि नियम के तहत नुकसान की भरपाई दंगा करने वाले आरोपियों से होनी चाहिए। इस पर कोर्ट ने पूछा कि क्या सरकार ने ऐसा कोई रिकवरी सिस्टम या तंत्र तैयार किया है? सरकार के पास इसका कोई ठोस जवाब नहीं था। पीड़ितों के वकील ने दलील दी कि सरकार केवल कोर्ट की अवमानना (Contempt) की कार्यवाही से बचने के लिए लगातार अपील दाखिल कर मामले को टाल रही है।

सरकार की अपील का नतीजा

26 मई को दिल्ली सरकार ने हाई कोर्ट के आदेश को वापस लेने की अपील की थी। अदालत ने कहा कि सरकार का तर्क यह साबित नहीं कर पा रहा है कि उसे अपील का अधिकार है। इसी बीच, कोर्ट ने सरकार की अपील को खारिज कर दिया, जिससे दंगा पीड़ितों को मुआवजा देने का रास्ता साफ हो गया है। पीड़ितों की वर्तमान कानूनी और संवैधानिक स्थिति को निम्नलिखित प्रमुख बिंदुओं के तहत समझा जा सकता है।

राज्य की जिम्मेदारी और मुआवजे का कानूनी अधिकार

मुआवजा पाना वैध अधिकार: दिल्ली उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि दंगा पीड़ितों को तुरंत राहत और मुआवजा पहुंचाना सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी है।
वसूली के नाम पर देरी नहीं: सरकार की यह दलील खारिज कर दी गई है कि मुआवजा दंगाइयों की संपत्ति जब्त करके दिया जाना चाहिए। कोर्ट ने व्यवस्था दी है कि सरकार पीड़ितों का भुगतान नहीं रोक सकती। वह बाद में दंगाइयों से वसूली का तंत्र (Recovery Mechanism) बना सकती है।
₹21.71 करोड़ की मंजूरी: कोर्ट के सख्त रुख के बाद, ‘उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगा दावा आयोग’ (NEDRCC) द्वारा अनुशंसित ₹21.71 करोड़ की राशि 1,731 प्रमाणित पीड़ितों को मिलने का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया है।

दिल्ली दंगा पीड़ित मुआवजा योजना (DVCS) के तहत सुरक्षा

दोहरी योजनाओं का लाभ: पीड़ित दिल्ली सरकार की अपनी ‘सहायता योजना (2020)’ और ‘दिल्ली पीड़ित मुआवजा योजना, 2018’ दोनों के तहत कानूनी दावों के पात्र हैं।
आश्रितों की परिभाषा: अदालती बहसों के दौरान मुआवजे के हकदार ‘आश्रितों’ (Dependents) के कानूनी दायरे (जैसे जीवनसाथी, माता-पिता, नाबालिग बच्चे) को भी नियमों के तहत स्पष्ट किया जा रहा है ताकि सही लाभार्थियों को हक मिले।
समान मुआवजे की मांग: नाबालिग और वयस्क मृतक पीड़ितों के परिवारों को एक समान वित्तीय सहायता देने से जुड़ी याचिकाएं भी अदालती समीक्षा के अधीन रही हैं।

अदालतों में चल रहे आपराधिक मुकदमे और पीड़ितों की गवाही

त्वरित सुनवाई: दिल्ली की कड़कड़डूमा स्थित विशेष अदालतों (Special Courts) में दंगों से जुड़ी 750 से अधिक एफआईआर (FIR) पर सुनवाई जारी है। कोर्ट ने पुलिस को निर्देश दिए हैं कि गवाहों और पीड़ितों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।
साजिशकर्ताओं पर कड़ा रुख: सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने और बड़ी साजिश (Larger Conspiracy) रचने वाले मुख्य आरोपियों के खिलाफ कड़े यूएपीए (UAPA) कानून के तहत मामले चल रहे हैं, जिसमें हाल ही में अदालत ने आरोप तय करने (Framing of Charges) की प्रक्रिया में तेजी लाने के निर्देश दिए हैं।

क्या होंगे अगले कदम?

कोर्ट ने कहा है कि दिल्ली सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि वे आरोपियों से धन वसूलने के लिए कोई तंत्र विकसित करें। ऐसे में, पीड़ितों को मुआवजे के लिए सरकार की कार्रवाई का इंतजार करना होगा। सुप्रीम कोर्ट द्वारा पहले दिए गए निर्णयों के अनुसार, अगर दिल्ली सरकार वसूली के लिए कोई तंत्र नहीं बना पाती है, तो पीड़ितों का सहारा केवल अदालत के आदेश से ही रहेगा। इस विवाद में सरकार का भविष्य क्या होगा, यह देखने योग्य है।

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