मलबे से महाशक्ति तक: 2001 का सियासी भूचाल, जिसने नरेंद्र मोदी को सौंपी गुजरात की कमान

The CSR Journal Magazine

2001 में भाजपा में सत्ता का शिफ़्ट और मलबे से बना नया गुजरात, जिसने मोदी को सीएम बनाया

यह वर्ष 2001 की वह दास्तां है जिसने भारतीय राजनीति की दिशा हमेशा के लिए बदल दी। 26 जनवरी 2001 को आए विनाशकारी भुज भूकंप ने न केवल गुजरात की धरती को हिलाया था, बल्कि गांधीनगर से लेकर दिल्ली तक भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की राजनीतिक नींव भी हिला दी थी। मलबे के नीचे दबे लोगों की चीखें और तत्कालीन सरकार की प्रशासनिक लाचारी ने भाजपा के भीतर एक ऐसा बवंडर पैदा किया, जिसने अंततः 7 अक्टूबर 2001 को नरेंद्र मोदी को पहली बार गुजरात के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर ला खड़ा किया।

भुज का महाभूकंप और केशूभाई सरकार की विफलता

26 जनवरी 2001 की सुबह आए भूकंप ने पूरे गुजरात को तबाह कर दिया था। उस समय राज्य के मुख्यमंत्री भाजपा के कद्दावर नेता केशूभाई पटेल थे। अंतरराष्ट्रीय स्तर से करोड़ों रुपये की राहत सामग्री और वित्तीय मदद आने के बावजूद, राज्य की अफसरशाही और प्रशासनिक तंत्र पूरी तरह पंगु नजर आ रहा था। गांवों और कस्बों में पीड़ितों तक बुनियादी मदद भी नहीं पहुंच पा रही थी। इसी दौरान केशूभाई पटेल का स्वास्थ्य भी लगातार गिर रहा था, जिससे आम जनता में यह संदेश गया कि सरकार इस बड़े संकट को संभालने में पूरी तरह असहाय है।

उपचुनावों में करारी हार और केंद्रीय नेतृत्व की घबराहट

भूकंप के बाद उपजा असंतोष जल्द ही चुनावी नतीजों में तब्दील हो गया。 सितंबर-अक्टूबर 2001 में हुए उपचुनावों में भाजपा को भारी पराजय का सामना करना पड़ा। पार्टी साबरमती विधानसभा सीट (जो भाजपा का अभेद्य गढ़ मानी जाती थी) और आनंद लोकसभा सीट पर कांग्रेस से चुनाव हार गई। इस हार ने दिल्ली में बैठे भाजपा के शीर्ष नेताओं—अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी को हिलाकर रख दिया। 2002 में होने वाले विधानसभा चुनावों में पार्टी का सूपड़ा साफ होने का साफ डर दिखने लगा था।

संगठन की अंदरूनी गुटबाजी

केशूभाई पटेल के इर्द-गिर्द के लोगों पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लग रहे थे और पार्टी के भीतर भीषण गुटबाजी चरम पर थी। शंकरसिंह वाघेला के पार्टी छोड़ने के बाद भी उनके समर्थकों के बागी सुर अंदर ही अंदर सुलग रहे थे। भाजपा कार्यकर्ता हताश थे और संगठन बिखर रहा था।

दिल्ली से मोदी का बुलावा

उस समय नरेंद्र मोदी दिल्ली में भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव के रूप में पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश का काम देख रहे थे। हालांकि वे दिल्ली में थे, लेकिन 1995 में गुजरात में भाजपा की पहली पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने के पीछे उनका कुशल संगठन प्रबंधन ही था। लालकृष्ण आडवाणी ने अपनी आत्मकथा ‘माई कंट्री माई लाइफ’ में भी जिक्र किया है कि केंद्रीय नेतृत्व को एक ऐसे कड़े प्रशासक की तलाश थी जो गुटबाजी को खत्म कर संगठन में जान फूंक सके। मोदी के पास कोई संसदीय या प्रशासनिक अनुभव नहीं था, वे कभी विधायक या सांसद भी नहीं रहे थे, लेकिन संगठन पर उनकी पकड़ अचूक थी। इसी पृष्ठभूमि में, शीर्ष नेतृत्व के फैसले के बाद 7 अक्टूबर 2001 को नरेंद्र मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।

भूकंप के बाद का महा-संकट और पुनर्निर्माण की चुनौतियाँ

जब नरेंद्र मोदी ने सत्ता संभाली, तब गुजरात के हालात बेहद गंभीर थे। उनके सामने एक तरफ बिखरा हुआ राजनीतिक संगठन था और दूसरी तरफ मलबे में तब्दील हो चुका पूरा कच्छ और भुज क्षेत्र। तात्कालिक प्रशासनिक और वित्तीय संकट-
• प्रशासनिक सुस्ती और लालफीताशाही: सरकारी अधिकारी पुराने नियमों का हवाला देकर फाइलों को अटका रहे थे, जबकि जनता के पास रहने को छत नहीं थी।
• अविश्वास का माहौल: भूकंप के सात-आठ महीने बीत जाने के बाद भी लोगों की शिकायतें जस की तस थीं। अंतरराष्ट्रीय मीडिया और दानदाताओं में राज्य सरकार की साख गिर चुकी थी।
• आर्थिक मंदी: राज्य की अर्थव्यवस्था पूरी तरह चरमरा चुकी थी, व्यापार ठप थे और बुनियादी ढांचा (सड़कें, बिजली, अस्पताल) ध्वस्त था।

पुनर्निर्माण की रणनीतियाँ: मोदी का प्रशासनिक मॉडल

मुख्यमंत्री बनते ही नरेंद्र मोदी ने आपदा प्रबंधन को एक नए दृष्टिकोण से देखना शुरू किया। उन्होंने नौकरशाही के ढीले ढीले रवैये को बदलने के लिए कड़े कदम उठाए:
• सचिवालय को जमीन पर उतारा: मोदी ने सभी विभागों के सचिवों को आदेश दिया कि वे भूकंप प्रभावित 43 ब्लॉकों में से प्रत्येक में जाएं और हर हफ्ते शुक्रवार, शनिवार तथा रविवार वहीं रहकर काम संभालें। उन्होंने स्पष्ट कहा, “आप खुद को उस ब्लॉक का मुख्यमंत्री समझें और फैसले लें।”
• नियमों में बदलाव: जब अधिकारियों ने पुराने सरकारी नियमों की दुहाई दी, तो नए मुख्यमंत्री ने साफ कर दिया कि जनता की भलाई के लिए नियम बदले जा सकते हैं, न कि नियमों के लिए जनता को तड़पाया जा सकता है।
• डेडलाइन आधारित कार्य (26 जनवरी का संकल्प): वित्तीय वर्ष (मार्च) का इंतजार करने के बजाय उन्होंने निर्देश दिया कि आगामी 26 जनवरी (भूकंप की पहली बरसी) तक पुनर्निर्माण का मुख्य काम पूरा होना चाहिए, क्योंकि उस वक्त वैश्विक मीडिया की नजरें दोबारा गुजरात पर होंगी।

परिणाम: आपदा से अवसर का जन्म

प्रशासनिक कसावट का नतीजा यह हुआ कि दिसंबर 2001 के अंत तक पुनर्निर्माण के कार्यों में अभूतपूर्व तेजी आई। जनवरी 2002 में दिल्ली में एक भव्य प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित कर दुनिया भर के दूतावासों को बुलाया गया और जब विदेशी मीडिया 22 जनवरी को कच्छ पहुंचा, तो पुनर्निर्माण की गति देखकर दंग रह गया। तबाह हो चुके लखपत गुरुद्वारे जैसी सांस्कृतिक धरोहरों से लेकर आम नागरिकों के घरों का पुनर्निर्माण रिकॉर्ड समय में किया गया।

आधुनिक गुजरात की नींव

2001 का वह दौर गुजरात और भाजपा दोनों के लिए एक परीक्षा की घड़ी था। भाजपा के भीतर हुई उस राजनीतिक उथल-पुथल ने न केवल एक कड़े सांगठनिक नेता को प्रशासनिक कमान सौंपी, बल्कि संकट प्रबंधन के एक नए मॉडल को भी जन्म दिया। भुज के भूकंप ने जहां एक ओर भारी तबाही मचाई थी, वहीं दूसरी ओर इसने नरेंद्र मोदी को खुद को एक कुशल और दूरदर्शी प्रशासक के रूप में स्थापित करने का मौका दिया, जिसने आगे चलकर देश की राजनीति का चेहरा हमेशा के लिए बदल दिया।

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