बीडीडी चालों में पुलिस परिवारों को मकान देने का रास्ता साफ, मगर कीमतों पर उठे सवाल

The CSR Journal Magazine

पुलिसकर्मियों के घर का सपना होगा पूरा, लेकिन 72 लाख से 1.48 करोड़ रुपये तक चुकानी होगी कीमत, बीडीडी चालों में पुलिस परिवारों को मकान देने का रास्ता साफ

मुंबई की वरली, नायगांव और ना. म. जोशी मार्ग स्थित बीडीडी चालों के पुनर्विकास से जुड़ा एक अहम फैसला महाराष्ट्र सरकार ने लिया है। राज्य सरकार ने इन सरकारी आवासों में रहने वाले 223 पात्र पुलिस अधिकारियों, कर्मचारियों और उनके कानूनी वारिसों को पुनर्विकसित मकान मालिकाना हक पर देने के लिए निर्माण लागत निर्धारित कर दी है। इन मकानों का क्षेत्रफल 500 वर्ग फुट होगा। हालांकि, इन मकानों के लिए पात्र पुलिस परिवारों को 15 लाख रुपये नहीं, बल्कि संबंधित क्षेत्र के हिसाब से 72.25 लाख रुपये से लेकर 1.48 करोड़ रुपये तक चुकाने होंगे। सरकार के इस फैसले से लंबे समय से अपने हक के मकान की मांग कर रहे पुलिस परिवारों के लिए आवंटन का रास्ता खुला है। दूसरी ओर, मकानों की तय की गई ऊंची कीमत को लेकर पुराने और नए पात्र लाभार्थियों के बीच अंतर तथा पुलिस परिवारों पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं।

तीनों क्षेत्रों में मकानों की कीमत कितनी होगी?

सरकार के 29 अक्टूबर 2026 के शासनादेश के अनुसार, 500 वर्ग फुट के प्रत्येक मकान के लिए निर्धारित निर्माण लागत इस प्रकार है।
वरली बीडीडी चाल- ₹1.48 करोड़, 123 पात्र पुलिसकर्मी।
नायगांव बीडीडी चाल- ₹72.25 लाख, 84 पात्र पुलिसकर्मी।
ना. म. जोशी मार्ग बीडीडी चाल- ₹86.30 लाख, 16 पात्र पुलिसकर्मी।
इन तीनों स्थानों को मिलाकर 223 पुलिसकर्मी और उनके पात्र कानूनी वारिस इस निर्णय के दायरे में आएंगे।

2011 की समय-सीमा क्यों बनी विवाद की वजह?

इस पूरे मामले की पृष्ठभूमि बीडीडी चालों में पुलिसकर्मियों के सरकारी आवासों के पुनर्विकास और उनमें रहने वाले कर्मचारियों को मालिकाना हक देने की नीति से जुड़ी है। राज्य सरकार ने पहले 1 जनवरी 2011 तक संबंधित सरकारी आवासों में रहने वाले पात्र पुलिसकर्मियों और उनके वारिसों को पुनर्विकसित मकान देने की मंजूरी दी थी। इस श्रेणी के लिए मकान की निर्माण लागत 15 लाख रुपये तय की गई थी। बाद में इन पात्र परिवारों को मकानों का आवंटन भी किया गया। लेकिन 1 जनवरी 2011 के बाद सरकारी आवासों में रहने आए पुलिसकर्मी इस लाभ से बाहर रह गए थे। इन कर्मचारियों का कहना था कि वे भी लंबे समय से सरकारी आवासों में रह रहे हैं और पुनर्विकास के बाद उन्हें भी अपने मकान का मालिकाना हक मिलना चाहिए। इस मांग पर विचार करने के बाद सरकार ने ऐसे पात्र पुलिसकर्मियों को भी 500 वर्ग फुट के मकान मालिकाना हक पर देने की अनुमति दी, लेकिन शर्त रखी कि उन्हें निर्धारित निर्माण लागत चुकानी होगी। अब इसी निर्णय के तहत तीनों स्थानों के लिए अलग-अलग कीमतें घोषित की गई हैं।

223 पुलिसकर्मियों का पूरा ब्योरा

मुंबई पुलिस आयुक्त की ओर से पात्र पुलिसकर्मियों की सूची महाराष्ट्र आवास एवं क्षेत्र विकास प्राधिकरण (म्हाडा) को भेजी गई थी।  यह सूची उन पुलिस अधिकारियों, कर्मचारियों और उनके कानूनी वारिसों से संबंधित है, जिन्हें निर्धारित शर्तों के तहत पुनर्विकसित मकान देने के लिए पात्र माना गया है।

538 मकानों में से 315 पुलिस विभाग के पास रहेंगे

इस फैसले का एक दूसरा महत्वपूर्ण पहलू यह है कि तीनों बीडीडी चाल परियोजनाओं के पुनर्विकास के बाद गृह विभाग को कुल 538 पुनर्वास मकान उपलब्ध होने हैं। इनमें से 223 मकान पात्र पुलिसकर्मियों और उनके कानूनी वारिसों को निर्धारित लागत पर मालिकाना हक के साथ दिए जाएंगे। शेष 315 मकान मुंबई पुलिस आयुक्त को सौंपे जाएंगे। इनका उपयोग पुलिस विभाग अपनी आवासीय जरूरतों के अनुसार कर सकेगा। इस तरह सरकार की योजना में एक ओर पात्र परिवारों को अपने मकान का मालिकाना हक देने और दूसरी ओर पुलिस विभाग के लिए सरकारी आवासों का भंडार बनाए रखने, दोनों की व्यवस्था की गई है।

15 लाख और 1.48 करोड़ रुपये के बीच इतना अंतर क्यों?

इस फैसले पर सबसे बड़ा सवाल मकानों की कीमतों में अंतर को लेकर उठ रहा है। एक ही पुनर्विकास योजना में पहले की पात्र श्रेणी को 500 वर्ग फुट का मकान 15 लाख रुपये में देने का प्रावधान था, जबकि अब पात्र घोषित किए गए 223 पुलिसकर्मियों के लिए कीमत 72.25 लाख से 1.48 करोड़ रुपये तक रखी गई है। म्हाडा के मुंबई मंडल के मुख्य अधिकारी मिलिंद बोरीकर के हवाले से प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार, कीमतें निर्माण और बुनियादी सुविधाओं पर आने वाली लागत को ध्यान में रखकर तय की गई हैं। अलग-अलग स्थानों पर इमारतों की ऊंचाई और निर्माण की प्रकृति भी अलग है। उदाहरण के लिए, वरली की इमारतें 40 मंजिलों की हैं, जबकि नायगांव की इमारतें 26 मंजिलों की हैं। इन्हीं अंतर के कारण निर्माण लागत में भी फर्क पड़ता है। हालांकि, निर्माण लागत तय करने के इस तर्क के बावजूद पुलिस परिवारों की आर्थिक क्षमता को लेकर चिंता बनी हुई है। खासकर पुलिस सिपाही और हवलदार जैसे पदों पर कार्यरत कर्मचारियों के लिए इतनी बड़ी रकम जुटाना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

पुलिस परिवारों की मांग: पुराने लाभार्थियों जैसी राहत मिले

रिपोर्टों के अनुसार, प्रभावित पुलिस परिवारों का कहना है कि वे भी उसी बीडीडी चाल पुनर्विकास परियोजना के अंतर्गत मकान पाने के पात्र हैं। उनका सवाल है कि जब पहले की पात्र श्रेणी को 15 लाख रुपये में 500 वर्ग फुट के मकान दिए गए, तो बाद में सरकारी आवासों में रहने आए पात्र कर्मचारियों से कई गुना अधिक रकम क्यों ली जा रही है। पुलिस परिवारों की मांग है कि सरकार कीमतों पर दोबारा विचार करे और उन्हें भी पहले के लाभार्थियों के समान रियायती दर पर मकान उपलब्ध कराने का रास्ता निकाले। इस मांग के समर्थन में विधायक कालिदास कोलंबकर द्वारा भी पुलिसकर्मियों के लिए किफायती मकानों का मुद्दा उठाए जाने की खबरें प्रकाशित हुई हैं। फिलहाल, उपलब्ध रिपोर्टों में सरकार द्वारा निर्धारित निर्माण लागत का विवरण सामने आया है। इन दरों में बदलाव या 15 लाख रुपये वाली पुरानी दर को नई पात्र श्रेणी पर लागू करने के किसी नए फैसले की पुष्टि नहीं हुई है।

बीडीडी चाल पुनर्विकास का व्यापक महत्व

बीडीडी का पूरा नाम बॉम्बे डेवलपमेंट डायरेक्टरेट है। मुंबई के वरली, नायगांव और ना. म. जोशी मार्ग स्थित पुरानी चालों का पुनर्विकास शहर की प्रमुख आवासीय परियोजनाओं में शामिल है। इसका उद्देश्य पुराने और सीमित सुविधाओं वाले आवासों की जगह आधुनिक इमारतों में बेहतर आवास उपलब्ध कराना है। परियोजना में म्हाडा की महत्वपूर्ण भूमिका है। इस पुनर्विकास का लाभ केवल पुराने चाल निवासियों तक सीमित नहीं है। पुलिस विभाग के सरकारी आवासों में रहने वाले पात्र कर्मचारियों और उनके परिवारों का पुनर्वास भी इसका महत्वपूर्ण हिस्सा है। लेकिन मकान का मालिकाना हक मिलने और उसे वास्तव में खरीद पाने के बीच आर्थिक क्षमता का सवाल खड़ा हो गया है।

घर मिले, लेकिन पहुँच से दूर

निष्कर्षतः, महाराष्ट्र सरकार के ताजा निर्णय से 223 पुलिसकर्मियों और उनके कानूनी वारिसों को 500 वर्ग फुट के मकान मालिकाना हक पर पाने का अवसर मिला है। मगर वरली में 1.48 करोड़ रुपये, ना. म. जोशी मार्ग पर 86.30 लाख रुपये और नायगांव में 72.25 लाख रुपये की निर्धारित निर्माण लागत ने इस फैसले को राहत के साथ-साथ विवाद का विषय भी बना दिया है। अब आगे की स्थिति इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकार कीमतों में राहत देने की मांग पर कोई पुनर्विचार करती है या घोषित दरों के आधार पर ही आवंटन की प्रक्रिया आगे बढ़ती है।

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