अमेरिका ने द‍िया दुनिया के इतिहास का सबसे बड़ा हथियार ऑर्डर, 58 अरब डॉलर में बनेंगी पैट्रियट मिसाइलें

The CSR Journal Magazine
यूक्रेन-रूस युद्ध, इजरायल-हमास युद्ध और अब ईरान युद्ध ने अमेरिकी हथियार भंडार को काफी कमजोर कर दिया है। हाल के घटनाक्रम के तहत, ट्रंप प्रशासन ने मिसाइलों के भंडारण को भरने के लिए एक बड़ा कदम उठाते हुए 58.6 अरब डॉलर का कॉन्ट्रैक्ट लॉकहीड मार्टिन को दिया है। इस समझौते के माध्यम से 2032 तक पैट्रियट इंटरसेप्टर मिसाइलों का उत्पादन किया जाएगा।

सुरक्षा बढ़ाने की कवायद

अमेरिकी सेना ने गुरुवार को जानकारी दी कि इस नए ऑर्डर से अप्रैल में हुए 4.7 अरब डॉलर के एक साल के अनुबंध को विस्तार दिया गया है। यह फ्रेमवर्क एग्रीमेंट 2026 से 2032 तक के वित्तीय वर्षों के लिए है। इसका उद्देश्य पैट्रियट एडवांस्ड कैपेबिलिटी-3 मिसाइल सेगमेंट एन्हांसमेंट (PAC-3 MSE) के उत्पादन को तेजी से बढ़ाना है, जो अमेरिका के एयर डिफेंस नेटवर्क का एक महत्वपूर्ण भाग है।

मिसाइलों की कमी का खतरा

अमेरिका ने हाल के वर्षों में यूक्रेन और इजरायल को निरंतर हथियारों की सप्लाई की है और ईरान के खिलाफ भी भारी संख्या में मिसाइलों का उपयोग किया गया है। ये सब मिलाकर अमेरिका का मिसाइल स्टॉक काफी कम हो गया है। इसी वजह से अब अमेरिका ने हथियार खरीदने के लिए अपने खजाने को खोल दिया है।

PAC-3 MSE का महत्व

पैट्रियट PAC-3 MSE इंटरसेप्टर को ‘हिट-टू-किल’ तकनीक के माध्यम से बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलों, साथ ही एयरक्राफ्ट को नष्ट करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। यह मिसाइल अमेरिका के एयर डिफेंस सिस्टम की रीढ़ है, जो बढ़ते जियोपॉलिटिकल तनाव के कारण सबसे अधिक मांग वाले एयर डिफेंस प्लेटफॉर्म में शामिल हो गई है।

लॉकहीड के साथ सहयोग

लॉकहीड मार्टिन के साथ हुए इस समझौते को पेंटागन की बड़ी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। इसकी प्रमुखता तत्काल हथियारों के स्टॉक को बढ़ाना है, जिससे डिफेंस मैन्युफैक्चरर्स को क्षमता बढ़ाने और सप्लाई चेन मजबूत करने में मदद मिलेगी। अमेरिका को चिंता है कि भविष्य में चीन के साथ संघर्ष होने पर उसके पास पर्याप्त मिसाइल नहीं रह जाएंगी।

दीर्घकालिक फंडिंग की आवश्यकता

रिपोर्टों के अनुसार, ट्रंप प्रशासन ने डिफेंस कंपनियों पर मिलिट्री प्रोडक्शन को प्राथमिकता देने का दबाव बनाया है। जनवरी में राष्ट्रपति ने एक एग्जीक्यूटिव ऑर्डर पर साइन किए थे, जिसमें सरकारी कॉन्ट्रैक्ट्स में खराब प्रदर्शन के बावजूद लाभ देने वाले कॉन्ट्रैक्टर्स को पहचानने का निर्देश दिया गया है। हालांकि, उद्योग के अधिकारियों का कहना है कि मैन्युफैक्चरिंग क्षमता और कंपोनेंट सप्लाई में बड़े निवेश से पहले कांग्रेस से फंडिंग की मंजूरी जरूरी होगी।

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