दिल्ली से गुजरात शिफ्ट हुए नेशनल फिल्म अवॉर्ड्स पर छिड़ी परेश रावल बनाम उद्धव-संजय राउत जंग

The CSR Journal Magazine

‘पाकिस्तान में है क्या गुजरात?’, परेश रावल का बड़ा बयान, नेशनल फिल्म अवॉर्ड्स का आयोजन गुजरात में

72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह को दिल्ली से बाहर गुजरात के एकता नगर (केवड़िया) स्थानांतरित करने के फैसले पर छिड़े राजनीतिक घमासान के बीच वरिष्ठ बॉलीवुड अभिनेता परेश रावल ने कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने आयोजन स्थल को लेकर सवाल उठाने वाले विपक्षी नेताओं और फिल्म निर्माताओं को करारा जवाब देते हुए पूछा, “क्या गुजरात बांग्लादेश या पाकिस्तान में है? यह भी हमारे ही देश का हिस्सा है।” परेश रावल का यह बयान सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में तेजी से चर्चा का विषय बन गया है, क्योंकि 1954 में अपनी स्थापना के बाद से यह प्रतिष्ठित पुरस्कार समारोह पहली बार देश की राजधानी दिल्ली के विज्ञान भवन से बाहर आयोजित किया जा रहा है।

विवाद की शुरुआत और परेश रावल का पलटवार

केंद्र सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने हाल ही में घोषणा की थी कि इस वर्ष आगामी 22 सितंबर को आयोजित होने वाला 72वां राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह गुजरात के एकता नगर में होगा, जो ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ के लिए जाना जाता है। सरकार के इस नीतिगत फैसले का उद्देश्य ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की भावना को बढ़ावा देना और राष्ट्रीय आयोजनों को देश के विभिन्न हिस्सों तक ले जाना है। इस फैसले के तुरंत बाद विपक्षी दलों और कुछ क्षेत्रीय फिल्म समीक्षकों ने आपत्ति जताना शुरू कर दिया। शिवसेना (UBT) प्रमुख उद्धव ठाकरे, सांसद संजय राउत और फिल्म निर्माता राहुल ढोलकिया जैसे दिग्गजों ने सवाल खड़े किए। संजय राउत ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार जानबूझकर राष्ट्रीय महत्व के कार्यक्रमों को गुजरात ले जा रही है और उन्होंने कलाकारों से इस समारोह के बहिष्कार तक की बात कह दी।

‘वाइब्रेंट गुजरात’ का तंज

राउत ने सरकार के इस कदम को राजनीतिक नौटंकी करार देते हुए पूछा कि क्या यह कोई राष्ट्रीय समारोह है या फिर बीजेपी का कोई “वाइब्रेंट गुजरात” इवेंट है? उन्होंने आरोप लगाया कि आगामी गुजरात चुनावों को ध्यान में रखकर इस तरह के हथकंडे अपनाए जा रहे हैं। संजय राउत ने देश के फिल्म जगत और कलाकारों से इस समारोह का विरोध करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा, “कलाकारों को इस आयोजन के लिए गुजरात नहीं जाना चाहिए। जो भी कलाकार अपने देश पर गर्व करता है, वह इस तरह परंपराओं को तोड़ने वाले आयोजन में जाकर पुरस्कार लेने से मना कर देगा।”

अन्य विपक्षी व क्षेत्रीय नेताओं का समर्थन

इस विवाद में केवल शिवसेना (UBT) ही नहीं, बल्कि महाराष्ट्र के अन्य विपक्षी दलों और फिल्म जगत से जुड़े कुछ क्षेत्रीय दिग्गजों ने भी सुर में सुर मिलाया है। महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के प्रमुख राज ठाकरे ने भी इस फैसले पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए सोशल मीडिया पर पूछा कि भारतीय सिनेमा की जन्मस्थली मुंबई (महाराष्ट्र) रही है, ऐसे में दिल्ली से बाहर कदम निकालते ही पहला विकल्प मुंबई या दक्षिण भारत के फिल्म हब क्यों नहीं बने?

गुजरात भाजपा का पलटवार

विपक्ष के इन चौतरफा हमलों पर गुजरात भाजपा और केंद्र सरकार के प्रवक्ताओं ने भी तीखी प्रतिक्रिया दी है। भाजपा नेताओं का कहना है कि विपक्ष की सोच बेहद संकीर्ण और क्षेत्रीयता से ग्रसित है। राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार पूरे देश की संपत्ति हैं, किसी एक राज्य की बपौती नहीं। गुजरात भी भारत का ही एक अभिन्न अंग है, और स्टैच्यू ऑफ यूनिटी (एकता नगर) जैसी ऐतिहासिक जगह पर इसका आयोजन करना ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ के दृष्टिकोण को मजबूत करता है।

बॉलीवुड से उठा बवाल

फिल्म निर्माता राहुल ढोलकिया ने भी पूछा कि सिनेमाई योगदान के मामले में महाराष्ट्र, केरल या तमिलनाडु जैसे राज्यों के बजाय गुजरात को ही प्राथमिकता क्यों दी गई। इन सभी आरोपों और राजनीतिक बयानबाजी पर प्रतिक्रिया देते हुए पूर्व सांसद और अभिनेता परेश रावल ने मीडिया से बातचीत में कड़ा प्रतिवाद किया। उन्होंने बेहद बेबाक अंदाज में कहा:”राजनेताओं का तो काम ही इन सब चीजों पर सवाल उठाना है। लेकिन मेरा सवाल यह है कि क्या गुजरात हमारे देश का हिस्सा नहीं है? क्या गुजरात बांग्लादेश या पाकिस्तान में है? यह भी हमारे ही देश का हिस्सा है। गुजरात में यह आयोजन क्यों नहीं होना चाहिए? मेरा तो स्पष्ट मानना है कि ऐसे भव्य राष्ट्रीय आयोजन देश के हर राज्य में होने चाहिए ताकि सभी को अवसर मिले। इसमें कुछ भी गलत नहीं है।”

पहली बार राजधानी से बाहर निकला राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार

राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों का इतिहास सात दशकों से भी अधिक पुराना है। साल 1954 में इसकी शुरुआत के बाद से पारंपरिक रूप से राष्ट्रपति द्वारा विजेताओं को नई दिल्ली में ही सम्मानित किया जाता रहा है। ऐसे में इस परंपरा को बदलकर समारोह को गुजरात शिफ्ट करने के निर्णय ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है। सरकार के समर्थकों का कहना है कि जिस तरह देश के विभिन्न हिस्सों में राष्ट्रीय महत्व के अन्य कार्यक्रम या सैन्य परेड आयोजित की जा रही हैं, उसी तरह राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों को भी दिल्ली के दायरे से बाहर निकालना एक सकारात्मक कदम है।

72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों के मुख्य आकर्षण

इस वर्ष के पुरस्कारों की सूची पहले ही घोषित की जा चुकी है, जिसमें विभिन्न भाषाओं और श्रेणियों के उत्कृष्ट काम को सराहा गया है-
सर्वश्रेष्ठ अभिनेता: कार्तिक आर्यन (फिल्म ‘चंदू चैंपियन’ के लिए) और ममूटी (मलयालम फिल्म ‘ब्रह्मयुगम’ के लिए) को संयुक्त रूप से सर्वश्रेष्ठ अभिनेता चुना गया है।
सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री: यामी गौतम को उनकी फिल्म ‘आर्टिकल 370’ में दमदार अभिनय के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार मिलेगा।
सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म: फिल्म ‘आर्टिकल 370’ को इस साल की सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म के खिताब से नवाजा जाएगा।
बेस्ट डेब्यू फिल्म डायरेक्टर: रणदीप हुड्डा को उनकी निर्देशित फिल्म ‘स्वातंत्र्य वीर सावरकर’ के लिए इस विशेष श्रेणी में सम्मानित किया जाएगा।

राष्ट्रपति मुर्मू के हाथों सम्मान

22 सितंबर को होने वाले इस भव्य समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू भारतीय सिनेमा जगत के इन तमाम दिग्गजों को सम्मानित करेंगी।  जहां एक तरफ इस ऐतिहासिक स्थान पर समारोह के भव्य आयोजन की तैयारियां जोर-शोर से चल रही हैं, वहीं दूसरी तरफ परेश रावल के इस बयान ने क्षेत्रीय और राष्ट्रीय राजनीति के बीच के मतभेदों को एक बार फिर सतह पर ला दिया है।

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