World Mental Health Day: युवाओं में बढ़ रहे साइकोसिस के मामले, तनाव और नींद की कमी बन रही चिंता

The CSR Journal Magazine
दुनिया भर में मानसिक स्वास्थ्य आज एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। काम का दबाव, आर्थिक परेशानियां, सामाजिक बदलाव, अकेलापन और डिजिटल दुनिया में बढ़ता समय लोगों की मानसिक सेहत को प्रभावित कर सकता है। कई बार लोग तनाव या डिप्रेशन के लक्षणों को छिपाते रहते हैं, क्योंकि उन्हें डर होता है कि दूसरे लोग उनके बारे में क्या सोचेंगे। यही वजह है कि मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता बढ़ाना जरूरी हो गया है। हर साल 10 अक्टूबर को विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस मनाया जाता है। इस दिन का उद्देश्य लोगों को यह समझाना है कि मानसिक स्वास्थ्य भी शारीरिक स्वास्थ्य जितना ही महत्वपूर्ण है। मानसिक परेशानी का सामना करना किसी की कमजोरी नहीं है और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर या काउंसलर की मदद लेना बिल्कुल सामान्य बात है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, दुनिया भर में लगभग एक अरब लोग किसी न किसी मानसिक स्वास्थ्य समस्या से प्रभावित हैं। इन समस्याओं में डिप्रेशन, एंग्जायटी और दूसरी मानसिक बीमारियां शामिल हैं। मानसिक स्वास्थ्य की समस्याएं किसी भी उम्र के व्यक्ति को प्रभावित कर सकती हैं।

तनाव और नींद की कमी से मानसिक स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ता है?

तनाव हर व्यक्ति की जिंदगी का हिस्सा है। काम, पढ़ाई, परिवार, रिश्तों और आर्थिक जिम्मेदारियों के कारण कभी-कभी तनाव महसूस होना सामान्य है। लेकिन जब तनाव लंबे समय तक बना रहता है और व्यक्ति की नींद, व्यवहार या रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करने लगता है, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। लगातार तनाव से नींद में परेशानी, चिड़चिड़ापन, ध्यान लगाने में कठिनाई और थकान जैसी समस्याएं हो सकती हैं। कुछ लोगों में चिंता और उदासी बढ़ सकती है। हालांकि, तनाव होने का मतलब यह नहीं है कि व्यक्ति को कोई गंभीर मानसिक बीमारी हो गई है। लक्षणों की गंभीरता और अवधि के आधार पर विशेषज्ञ सही स्थिति का आकलन करते हैं। नींद की कमी भी मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती है। देर रात तक मोबाइल चलाना, लगातार ऑनलाइन रहना और अनियमित दिनचर्या नींद की गुणवत्ता खराब कर सकती है। इसलिए नियमित समय पर सोना और पर्याप्त आराम करना मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

क्या है साइकोसिस और कैसे पहचानें इसके लक्षण?

साइकोसिस एक ऐसी स्थिति है, जिसमें व्यक्ति को वास्तविकता को समझने और अपने अनुभवों की सही व्याख्या करने में परेशानी हो सकती है। इसमें ऐसी आवाजें सुनाई देना, जिन्हें दूसरे लोग नहीं सुनते, ऐसी चीजें दिखाई देना जो वास्तव में मौजूद नहीं हैं, या वास्तविकता से दूर दृढ़ विश्वास विकसित होना शामिल हो सकता है। साइकोसिस कई अलग-अलग मानसिक या शारीरिक स्थितियों से जुड़ा हो सकता है। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं, इसलिए केवल लक्षण देखकर खुद से बीमारी का निष्कर्ष निकालना सही नहीं है। ऐसे लक्षण दिखने पर मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से जल्द जांच करानी चाहिए। इसी तरह डिप्रेशन को केवल उदासी समझना भी सही नहीं है। लंबे समय तक निराशा, पहले पसंद आने वाली गतिविधियों में रुचि खत्म होना, नींद या भूख में बदलाव, ऊर्जा की कमी और खुद को बेकार समझना इसके संभावित लक्षण हैं। हर व्यक्ति में लक्षण एक जैसे नहीं होते।

मानसिक स्वास्थ्य बेहतर रखने के लिए अपनाएं ये 5 तरीके

1. रोजाना शारीरिक गतिविधि करें: पैदल चलना, हल्का व्यायाम, योग या अपनी पसंद का कोई खेल तनाव कम करने और बेहतर महसूस करने में मदद कर सकता है। शुरुआत अपनी क्षमता के अनुसार करें।
2. सात से नौ घंटे की नींद का लक्ष्य रखें: ज्यादातर वयस्कों को हर रात सात से नौ घंटे की नींद की जरूरत होती है। सोने और जागने का समय नियमित रखने की कोशिश करें। बच्चों और किशोरों को उम्र के अनुसार इससे अधिक नींद की जरूरत हो सकती है।
3. स्क्रीन टाइम पर नियंत्रण रखें: मोबाइल, सोशल मीडिया और ऑनलाइन गेम्स का इस्तेमाल अपनी जरूरत के अनुसार सीमित करें। सोने से पहले स्क्रीन से दूरी बनाने और नियमित ब्रेक लेने की आदत डालें।
4. अपनी भावनाएं साझा करें: तनाव या परेशानी को अकेले सहने के बजाय किसी भरोसेमंद व्यक्ति से बात करें। जरूरत पड़ने पर काउंसलर, मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सक की मदद लें।
5. नशे से दूर रहें: शराब और अन्य नशीले पदार्थ मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकते हैं। तनाव से निपटने के लिए इनका सहारा लेने के बजाय स्वस्थ तरीके अपनाना बेहतर है।
मानसिक परेशानी होने पर कब लें विशेषज्ञ की मदद?
अगर तनाव, चिंता या उदासी लंबे समय तक बनी रहती है, काम या पढ़ाई प्रभावित होने लगती है, नींद लगातार खराब रहती है या व्यक्ति लोगों से दूरी बनाने लगता है, तो विशेषज्ञ से सलाह लेना जरूरी है। समय पर मदद मिलने से परेशानी को समझने और सही उपचार शुरू करने में सहायता मिल सकती है। मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के उपचार में काउंसलिंग, मनोचिकित्सा, दवाएं या इनका संयोजन शामिल हो सकता है। कौन-सा उपचार जरूरी है, यह व्यक्ति की स्थिति और विशेषज्ञ के आकलन पर निर्भर करता है। अगर किसी व्यक्ति को खुद को नुकसान पहुंचाने या आत्महत्या करने के विचार आ रहे हैं, तो उसे अकेला न छोड़ें और तत्काल स्थानीय आपातकालीन सेवा या मानसिक स्वास्थ्य सहायता से संपर्क करें।

मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर बात करना क्यों जरूरी?

विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस का संदेश केवल एक दिन जागरूकता फैलाने तक सीमित नहीं है। मानसिक स्वास्थ्य को लेकर परिवार, स्कूल, कॉलेज और कार्यस्थलों पर खुलकर बातचीत होनी चाहिए। लोगों को बिना भेदभाव के मदद मिलना और जरूरत के समय उचित स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच होना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। मानसिक परेशानी को छिपाना, मरीज को दोष देना या उसे कमजोर समझना समस्या को और मुश्किल बना सकता है। इसके बजाय सहानुभूति, सही जानकारी और समय पर उपचार को बढ़ावा देना जरूरी है। मानसिक रूप से स्वस्थ रहने का मतलब यह नहीं कि जिंदगी में कभी तनाव नहीं होगा। इसका अर्थ है अपनी भावनाओं को समझना, मुश्किल परिस्थितियों से निपटने के तरीके सीखना और जरूरत पड़ने पर मदद लेने में संकोच न करना। यही आदतें व्यक्तिगत जीवन के साथ-साथ समाज को भी अधिक स्वस्थ और सहयोगी बनाने में मदद कर सकती हैं।

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