खेला अभी बाकी है! बंगाल बार काउंसिल की 15 सीटों पर TMC का कब्जा, BJP महज 3 पर सिमटी

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राजनीतिक संकट के बीच ममता बनर्जी को मिली राहत! TMC ने बार काउंसिल चुनाव में मारा दमखम!

पश्चिम बंगाल बार काउंसिल चुनाव में तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने कुल 23 निर्वाचित सीटों में से 15 सीटों पर ऐतिहासिक जीत दर्ज कर अपना दबदबा बरकरार रखा है, जबकि मुख्य विपक्षी दल भाजपा केवल 3 सीटों पर ही सिमट कर रह गई है। विधानसभा चुनाव में सत्ता गंवाने, पार्टी के अंदरूनी संकट और कानूनी लड़ाइयों से जूझ रही पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए यह चुनावी नतीजे एक बहुत बड़ी संजीवनी और राजनीतिक राहत लेकर आए हैं।

राजनीतिक संकट के बीच ममता बनर्जी को बड़ी राहत! बार काउंसिल चुनाव में TMC का महा-धमाका

कुल निर्वाचित सीटें: 23 (कुल बोर्ड संख्या: 25)
तृणमूल कांग्रेस (TMC): 15 सीटें (प्रचंड बहुमत)
भारतीय जनता पार्टी (BJP): 03 सीटें (करारी शिकस्त)
वाम मोर्चा (Left Front): 03 सीटें
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस: 02 सीटें
महिला आरक्षित सीटें: 5 में से 4 पर TMC का कब्जा

संकट के बाद पहली बड़ी राहत: हार के सिलसिले पर लगा ब्रेक

पश्चिम बंगाल की राजनीति में बीते कुछ महीने पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) के लिए बेहद उतार-चढ़ाव और संकटों से भरे रहे हैं। हाल ही में संपन्न हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने 207 सीटों के साथ भारी बहुमत हासिल कर राज्य की सत्ता पर कब्जा कर लिया था और TMC महज 80 सीटों पर सिमट गई थी। इस चुनावी झटके के बाद TMC को लगातार कई स्थानीय निकायों और वकीलों के संगठनों में पीछे हटना पड़ रहा था। इसके अलावा पार्टी के कई विधायकों और सांसदों की बगावत की खबरों के बीच ममता बनर्जी चौतरफा राजनीतिक दबाव का सामना कर रही थीं।ऐसे गंभीर राजनीतिक संकट के माहौल में, पश्चिम बंगाल बार काउंसिल के घोषित नतीजों ने तृणमूल कांग्रेस खेमे में नया जोश और अभूतपूर्व उत्साह भर दिया है। कानूनी बिरादरी और प्रबुद्ध वर्ग के बीच मिली यह प्रचंड जीत यह साबित करती है कि भले ही टीएमसी ने राज्य की सत्ता गंवा दी हो, लेकिन राज्य के बौद्धिक और कानूनी ढांचे पर उसकी संगठनात्मक पकड़ आज भी उतनी ही मजबूत है।

चुनावी गणित: 23 सीटों का पूरा लेखा-जोखा

पश्चिम बंगाल बार काउंसिल में कुल 25 सीटें होती हैं, जिनमें से 23 सीटों पर मतदान के जरिए प्रतिनिधि चुने जाते हैं। शेष 2 सीटों पर सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुसार बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) द्वारा महिला उम्मीदवारों को मनोनीत किया जाएगा। इस चुनाव में कुल 75 उम्मीदवारों ने अपनी किस्मत आजमाई थी। राजनीतिक दलों से जुड़ी वकीलों की विंग ने इस चुनाव को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया था। TMC लॉयर्स सेल ने सभी 23 सीटों पर अपने अधिकृत उम्मीदवार उतारे थे। भाजपा (BJP) ने 22 सीटों पर अपने प्रत्याशी खड़े किए थे। वाम मोर्चे (Left Front) ने 12 सीटों पर दांव लगाया था। इसके साथ ही 18 निर्दलीय वकीलों ने भी मैदान में उतरकर मुकाबले को बहुकोणीय बना दिया था। जब नतीजों की घोषणा हुई, तो टीएमसी समर्थित पैनल ने एकतरफा क्लीन स्वीप करते हुए 15 सीटों पर परचम लहरा दिया। वहीं विधानसभा चुनाव जीतकर सरकार बनाने वाली भाजपा महज 3 सीटों पर सिमट कर रह गई, जो कि उसके पिछले प्रदर्शन के बराबर ही है (यानी सत्ता में आने के बाद भी वकीलों के बीच भाजपा का ग्राफ नहीं बढ़ा)। वाम मोर्चा भी पिछले चुनाव की 4 सीटों से घटकर 3 सीटों पर आ गया, जबकि कांग्रेस अपनी पुरानी 2 सीटों को बचाने में कामयाब रही।

महिला आरक्षित सीटों पर भी ‘दीदी’ का जादू कायम

सुप्रीम कोर्ट के नए नियमों के तहत इस बार बार काउंसिल चुनाव में एक बड़ा बदलाव किया गया था। कुल 23 निर्वाचित सीटों में से 5 सीटें महिला अधिवक्ताओं के लिए आरक्षित की गई थीं। इन 5 सीटों पर ममता बनर्जी ने खुद व्यक्तिगत रुचि लेकर अपनी पसंद के मजबूत महिला उम्मीदवारों को टिकट दिया था। नतीजे आने पर ममता बनर्जी की रणनीति पूरी तरह सफल साबित हुई। इन 5 आरक्षित सीटों में से 4 सीटों पर TMC समर्थित महिला उम्मीदवारों ने शानदार जीत दर्ज की, जबकि बची हुई 1 सीट कांग्रेस के खाते में गई। भाजपा और वाम मोर्चा महिला आरक्षित वर्ग में अपना खाता खोलने में भी नाकाम रहे।

प्रमुख विजेता: शुभाशीष चक्रवर्ती ने दर्ज की सबसे बड़ी जीत

TMC लॉयर्स सेल से मिली जानकारी के मुताबिक, इस चुनाव में सबसे बड़ी और रिकॉर्ड तोड़ जीत शुभाशीष चक्रवर्ती ने दर्ज की है, जो सबसे अधिक मतों के अंतर से विजयी होकर उभरे हैं। उनके अलावा ममता बनर्जी की सिफारिश पर मैदान में उतरे कई अन्य दिग्गज वकीलों ने भी भारी मतों से जीत हासिल की है, जिनमें प्रमुख नाम शामिल हैं- बैसोनर चटर्जी, अंसार मंडल, अशोक देब, इंद्रनील बसु, सिद्धार्थ मुखर्जी। TMC लॉयर्स सेल के वरिष्ठ सदस्य संजय बर्धन ने नतीजों पर खुशी जताते हुए मीडिया को बताया, “यह चुनाव सीधे तौर पर राज्य की सभी जिला अदालतों और कलकत्ता हाईकोर्ट में प्रैक्टिस करने वाले असली वकीलों के मतदान द्वारा तय किया गया है। हमारे वकीलों ने लगातार कानूनी समुदाय के हितों की रक्षा की है और बुद्धिजीवियों ने भाजपा की विभाजनकारी राजनीति को पूरी तरह खारिज कर दिया है।”

राजनीतिक विश्लेषकों का नजरिया: क्या बदल रही है बंगाल की हवा?

इस चुनाव के नतीजों को महज एक बार काउंसिल का आंतरिक चुनाव मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, इसके राजनीतिक निहितार्थ बेहद गहरे हैं।
बौद्धिक वर्ग में TMC की पैठ बरकरार: राज्य में सरकार बदलने के बावजूद वकील, डॉक्टर और प्रोफेसर जैसे प्रबुद्ध वर्गों के बीच अभी भी ममता बनर्जी का संगठनात्मक ढांचा बेहद सक्रिय और प्रभावी है।
बिना सरकारी मशीनरी के जीत: विपक्षी दलों (विशेषकर भाजपा) का आरोप रहता था कि TMC केवल सत्ता और पुलिस के दम पर चुनाव जीतती है। चूंकि यह चुनाव पूरी तरह से अधिवक्ताओं का आंतरिक और लोकतांत्रिक चुनाव था, इसलिए टीएमसी नेताओं का कहना है कि यह जीत साबित करती है कि ‘जनता का दिल’ आज भी दीदी के साथ है।
भाजपा के लिए आत्ममंथन का समय: राज्य की मुख्य सत्ता पर काबिज होने के बाद भी बार काउंसिल में सिर्फ 3 सीटें मिलना भाजपा के कानूनी सेल के लिए एक बड़ा झटका है। यह दर्शाता है कि पार्टी अभी तक कोलकाता के नीति-निर्माताओं और कानूनी दिग्गजों के बीच अपना भरोसा कायम नहीं कर पाई है।
सुप्रीम कोर्ट में जारी कानूनी लड़ाई को मिलेगा बल: वर्तमान में ममता बनर्जी और टीएमसी ने विधानसभा चुनाव के दौरान मतदाता सूचियों से नाम हटाए जाने (SIR विवाद) को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर रखी है। बार काउंसिल पर नियंत्रण होने से टीएमसी को अपनी कानूनी लड़ाइयों को आगे बढ़ाने के लिए एक मजबूत नैतिक और संस्थागत समर्थन मिलेगा।

जल्द गठित होगा TMC का नया बोर्ड

बार काउंसिल चुनाव में प्रचंड बहुमत हासिल करने के बाद अब तृणमूल कांग्रेस बिना किसी देरी के पश्चिम बंगाल बार काउंसिल का नया बोर्ड गठित करने जा रही है। बार काउंसिल राज्य के हजारों वकीलों के पंजीकरण, उनके कल्याणकारी कार्यों और अदालती कामकाज के संचालन में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। नए बोर्ड के गठन के साथ ही ममता बनर्जी की पार्टी राज्य की न्यायपालिका और विधिक गलियारों में अपनी नीतियों को अधिक प्रभावी ढंग से लागू कर सकेगी। निष्कर्ष के तौर पर, यह जीत भले ही सीधे तौर पर राज्य की सत्ता वापस न दिलाए, लेकिन इसने ममता बनर्जी को मनोवैज्ञानिक रूप से विपक्षी खेमे पर हावी होने का एक बड़ा मौका दे दिया है। बंगाल की राजनीति में ‘खेला’ अभी खत्म नहीं हुआ है, और बार काउंसिल के इन नतीजों ने भाजपा की नई नवेली सरकार को यह संदेश दे दिया है कि दीदी को कम आंकना उनकी सबसे बड़ी भूल साबित हो सकती है।

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