विदेशी निवेश के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने महुआ मोइत्रा को सरकार से संपर्क करने को कहा

The CSR Journal Magazine

सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने 29 अक्टूबर को तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की सांसद महुआ मोइत्रा की याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। इस याचिका में भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) को निर्देश देने की मांग की गई थी कि वह भारत में काम कर रहे अल्टरनेटिव इन्वेस्टमेंट फंड्स (एआईएफ) और फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स (एफपीआई) के ‘अल्टीमेट बेनिफिशियल ओनर्स’ (वास्तविक लाभार्थी मालिकों) की जानकारी सार्वजनिक करे। जस्टिस बी.वी. नागरत्ना की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि ऐसी जानकारी सार्वजनिक करने के लिए कोई मौजूदा कानूनी ढांचा नहीं है।

महुआ मोइत्रा का तर्क

महुआ मोइत्रा ने अपनी याचिका में कहा कि विदेशी संस्थाओं के जरिए भारतीय कंपनियों में भारी निवेश किया जा रहा है, लेकिन असल निवेशकों की पहचान अज्ञात है। उनका कहना था कि इस पारदर्शिता की कमी से सेबी के नियमों का उल्लंघन हो सकता है और बड़ी रकम निवेश करने वाली संस्थाएं शेयर बाजार में हेरफेर कर सकती हैं। उनके वकील प्रशांत भूषण ने यह भी कहा कि कई देशों में ‘बेनिफिशियल ओनरशिप’ की जानकारी सार्वजनिक करना अनिवार्य है।

कोर्ट की प्रतिक्रिया

जस्टिस नागरत्ना की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस मामले में सवाल उठाया कि क्या शीर्ष अदालत ऐसा निर्देश दे सकती है, जबकि प्रस्तावित खुलासों को अनिवार्य करने वाली कोई नीति ही मौजूद नहीं है। कोर्ट ने कहा, “अगर कोई नीति है जिसके तहत सार्वजनिक रूप से खुलासा करना जरूरी है, तो हम उस पर विचार कर सकते हैं। लेकिन अगर कोई नीति ही नहीं है, तो हम ऐसा आदेश कैसे जारी कर सकते हैं?”

सॉलिसिटर जनरल का विरोध

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता का असली मकसद यह सुनिश्चित करना है कि देश में विदेशी निवेश न आए। उन्होंने यह भी कहा कि इससे भारतीय अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। प्रशांत भूषण ने इस पर जवाब दिया कि ‘अल्टीमेट बेनिफिशियल ओनर्स’ का खुलासा करने से वैध निवेश को कोई नुकसान नहीं होगा।

नियामक निगरानी की स्थिति

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि एआईएफ और एफपीआई द्वारा किए गए निवेशों का विवरण सेबी या कस्टोडियन को दिया जा रहा है, जिससे नियामक निगरानी संभव हो पाती है। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसा कोई मौजूदा कानूनी ढांचा नहीं है जो याचिकाकर्ता द्वारा मांगी गई इकाई-वार निवेशों का सार्वजनिक रूप से खुलासा करना अनिवार्य बनाता हो।

क्या होगी अगली कार्रवाई?

सुप्रीम कोर्ट ने महुआ मोइत्रा को अपनी याचिका में उठाई गई शिकायतों के संबंध में केंद्र सरकार और सेबी से संपर्क करने की अनुमति दी। इस फैसले के बाद अब यह देखना होगा कि क्या सरकार इस मुद्दे पर कोई ठोस कदम उठाती है या नहीं। विदेशी निवेश के मामले में पारदर्शिता की कमी को लेकर यह मामला अब और भी महत्वपूर्ण हो गया है।

भविष्य की संभावनाएं

इस मामले ने भारतीय राजनीति और अर्थव्यवस्था में विदेशी निवेश की भूमिका को लेकर नई बहस छेड़ दी है। क्या सरकार इस दिशा में कोई नया नियम बनाएगी? क्या विदेशी निवेशकों की पहचान को सार्वजनिक करना संभव होगा? इन सवालों के जवाब आने वाले समय में मिल सकते हैं।

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