One Kidney Village: इस गांव में लोग बीमारी से नहीं, गरीबी से बेच देते हैं किडनी, हर घर की कहानी कर देगी हैरान

The CSR Journal Magazine
दुनिया में ऐसे कई गांव और बस्तियां हैं, जिनकी पहचान किसी खास परंपरा या प्राकृतिक खूबी के कारण होती है। लेकिन अफगानिस्तान की एक बस्ती ऐसी है, जिसे ‘वन किडनी विलेज’ यानी एक-किडनी वाला गांव कहा जाता है। वजह सुनकर शायद आप भी हैरान रह जाएंगे। यहां लोग किसी जन्मजात बीमारी या किडनी की समस्या के कारण एक किडनी के साथ पैदा नहीं होते। कई लोगों ने गरीबी और परिवार का पेट पालने की मजबूरी में अपनी एक किडनी बेच दी। पश्चिमी अफगानिस्तान के हेरात शहर के बाहरी इलाके में स्थित सायशानबा बाजार की यह कहानी 2022 में अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों के जरिए सामने आई थी।

हेरात के बाहर बसी है यह ‘वन किडनी विलेज’

सायशानबा बाजार हेरात के बाहरी इलाके में बसी ऐसी बस्ती है, जहां लंबे समय तक संघर्ष और विस्थापन के बाद बड़ी संख्या में गरीब परिवार आकर रहने लगे। आर्थिक तंगी इतनी गहरी थी कि लोगों के बीच किडनी बेचकर पैसे जुटाने की बात फैलने लगी। अल जजीरा और AFP की रिपोर्ट के मुताबिक, इस इलाके के दर्जनों लोगों ने अपनी किडनी बेच दी थी। एक परिवार के पांच भाइयों ने चार साल की अवधि में अपनी-अपनी एक किडनी बेच दी। उन्हें उम्मीद थी कि इससे परिवार गरीबी से बाहर निकल जाएगा, लेकिन बाद में भी उनका कर्ज और आर्थिक परेशानी बनी रही।

बीमारी नहीं, पेट पालने की मजबूरी

इस कहानी का सबसे परेशान करने वाला पहलू यही है कि इन लोगों ने अपनी किडनी किसी मेडिकल जरूरत के कारण नहीं, बल्कि आर्थिक मजबूरी में बेची। बेरोजगारी, कर्ज और परिवार के लिए खाना जुटाने की चिंता ने लोगों को ऐसा फैसला लेने पर मजबूर किया। एक महिला ने AFP को बताया था कि उसने अपनी किडनी करीब 2.5 लाख अफगानी में बेची थी। उसके परिवार पर कर्ज था और पति के पास काम नहीं था। रिपोर्ट के अनुसार, किडनी बेचने के बाद भी आर्थिक संकट पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। यही वजह है कि सायशानबा बाजार को ‘वन किडनी विलेज’ का नाम मिला। यह नाम किसी आधिकारिक प्रशासनिक पहचान से ज्यादा वहां की गंभीर आर्थिक स्थिति को बताने वाला मीडिया में इस्तेमाल किया गया नाम है।

किडनी बेचने वालों और मरीजों के बीच कैसे होता था संपर्क?

रिपोर्टों के मुताबिक जरूरतमंद लोगों को किडनी खरीदने वाले मरीजों से जोड़ने में बिचौलियों की भूमिका रहती थी। देश के अलग-अलग हिस्सों से किडनी ट्रांसप्लांट के लिए लोग हेरात पहुंचते थे। कुछ मामलों में भारत और पाकिस्तान से भी मरीजों के हेरात पहुंचने की रिपोर्ट सामने आई थी। 2022 की रिपोर्टों में यह भी सामने आया था कि अफगानिस्तान में अंगों की खरीद-बिक्री को नियंत्रित करने वाला प्रभावी कानूनी ढांचा बेहद कमजोर था। कुछ अस्पतालों में डोनर की लिखित सहमति और वीडियो रिकॉर्डिंग लेने की बात डॉक्टरों ने बताई थी, लेकिन डोनर की आर्थिक मजबूरी या उसे बिचौलिये तक किस तरह पहुंचाया गया, इसकी जांच हमेशा नहीं होती थी।

किडनी बेचने के बाद भी गरीबी नहीं गई

सायशानबा बाजार की सबसे बड़ी विडंबना यही सामने आई कि किडनी बेचने से लोगों की जिंदगी स्थायी रूप से बेहतर नहीं हुई। पांच भाइयों वाले परिवार के एक सदस्य ने रिपोर्ट में बताया था कि किडनी बेचने के बावजूद वे अभी भी कर्ज में थे और पहले की तरह गरीब थे। इससे यह सवाल भी उठता है कि जब किसी परिवार के पास आय का स्थायी साधन नहीं हो और वह अपनी संपत्ति या शरीर का हिस्सा बेचकर कुछ समय के लिए पैसे जुटाए, तो क्या इससे गरीबी वास्तव में खत्म हो सकती है? हेरात की यह कहानी बताती है कि ऐसे फैसले अक्सर समस्या का स्थायी समाधान नहीं बनते।

‘वन किडनी विलेज’ सिर्फ एक गांव तक सीमित नहीं

सायशानबा बाजार को ‘वन किडनी विलेज’ नाम मिलने के बाद यह मुद्दा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आया। लेकिन रिपोर्टों के अनुसार किडनी बेचने की समस्या सिर्फ इसी बस्ती तक सीमित नहीं थी। आर्थिक संकट और बेरोजगारी के कारण अफगानिस्तान के दूसरे हिस्सों से भी ऐसे मामले सामने आए। 2026 में प्रकाशित एक क्षेत्रीय विश्लेषण में भी हेरात के इंजिल जिले में गरीबी से जुड़े अंग बेचने के मामलों का उल्लेख किया गया है। इसमें बताया गया कि आर्थिक संकट से जूझ रहे कुछ लोग किडनी बेचने को मजबूर हुए और इससे जुड़े लोगों को आगे स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों का सामना भी करना पड़ा।

क्यों चर्चा में आई हेरात की यह कहानी?

हेरात की ‘वन किडनी विलेज’ की कहानी सिर्फ अंगों की खरीद-बिक्री की कहानी नहीं है। यह बेरोजगारी, विस्थापन, कर्ज और गरीबी के उस चक्र को दिखाती है, जिसमें परिवार अपने भविष्य को बचाने के लिए शरीर का एक हिस्सा तक बेचने को मजबूर हो जाता है। सबसे बड़ी चिंता यह है कि किडनी बेचने से मिली रकम अगर कुछ समय बाद खत्म हो जाए और परिवार के पास कमाई का कोई स्थायी साधन न हो, तो व्यक्ति के सामने आर्थिक संकट फिर खड़ा हो जाता है। ऐसे में यह कहानी अफगानिस्तान के उन परिवारों की मुश्किलों को सामने लाती है, जिनके लिए रोजमर्रा की जिंदगी की जरूरतें पूरी करना भी किसी चुनौती से कम नहीं रही हैं।

एक किडनी की कीमत से कहीं बड़ी है इस कहानी की सच्चाई

सायशानबा बाजार को ‘वन किडनी विलेज’ कहे जाने के पीछे कोई रहस्यमयी बीमारी नहीं, बल्कि गरीबी और मजबूरी की कहानी है। यहां के लोगों ने अपनी किडनी इसलिए नहीं गंवाई कि उनका शरीर उन्हें धोखा दे रहा था, बल्कि इसलिए कि हालात ने उन्हें ऐसा फैसला लेने पर मजबूर किया। इस कहानी का सबसे बड़ा सबक यही है कि जब किसी समाज में रोजगार और सामाजिक सुरक्षा की कमी गहरी हो जाती है, तो इंसान अपनी सबसे कीमती चीजों में से एक को भी पैसे के बदले देने को मजबूर हो सकता है। हेरात की यह बस्ती आज भी इसी आर्थिक त्रासदी की एक दर्दनाक मिसाल के तौर पर याद की जाती है।

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