कैंची धाम: पहाड़ों की गोद में बसा वो अलौकिक केंद्र, जहां विज्ञान थमता है और अध्यात्म जागता है

The CSR Journal Magazine

 उत्तराखंड की शांत वादियों में बसा कैंची धाम, जहाँ विज्ञान और तकनीक के महारथी भी पाते हैं आत्मिक शांति

देवभूमि उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र की हसीन और शांत वादियों में बसा नीम करौली बाबा का कैंची धाम आज वैश्विक स्तर पर आस्था, अलौकिकता और मानसिक शांति का सबसे बड़ा केंद्र बन चुका है। नैनीताल-अल्मोड़ा मार्ग पर भवाली से लगभग 9 किलोमीटर दूर स्थित यह पावन आश्रम केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि एक ऐसा आध्यात्मिक ऊर्जा का पुंज है जो देश-विदेश के लाखों श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता है। इस धाम की खासियत यह है कि यहाँ आने वाले व्यक्ति को एक ऐसी असीम शांति की अनुभूति होती है, जो समूचे विश्व में दुर्लभ है।

हनुमान अंश, शिप्रा नदी, जन्मस्थली सुर्खियों में

नीम करौली बाबा और उनका पावन कैंची धाम इन दिनों मुख्य रूप से तीन बड़ी वजहों से सुर्खियों में है। पहली वजह उनके जीवन और आध्यात्मिक सफर पर आधारित हालिया फिल्म ‘हनुमान अंश’ है, जिसने बॉक्स ऑफिस पर अभूतपूर्व सफलता पाकर देश-विदेश के दर्शकों के बीच बाबा के इतिहास और उनके चमत्कारों को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है। दूसरी वजह उत्तराखंड में हुई भारी बारिश के बाद कैंची धाम के पास बहने वाली शिप्रा नदी का अचानक उफान पर आना है, जहाँ नदी के विकराल रूप के बीच भी मंदिर परिसर के पूरी तरह सुरक्षित रहने को भक्त बाबा का साक्षात चमत्कार मान रहे हैं। वहीं तीसरी वजह बाबा के फिरोजाबाद स्थित पैतृक मकान और जन्मस्थली को लेकर उपजा पारिवारिक विवाद है, जिसमें उनके वंशजों ने एक ट्रस्ट पर अवैध कब्जे के आरोप लगाए हैं, जिसके चलते यह मामला कानूनी और प्रशासनिक गलियारों में काफी गरमा गया है।

भौगोलिक बनावट और नामकरण का रहस्य

समुद्र तल से हजारों फीट की ऊंचाई पर पहाड़ों और घने हरे-भरे जंगलों के बीच स्थित इस पवित्र स्थान का नाम ‘कैंची धाम’ पड़ने के पीछे एक बेहद दिलचस्प भौगोलिक कारण है। आम लोगों की धारणा के विपरीत, इसका किसी लोहे की कैंची या दर्जी से कोई संबंध नहीं है। दरअसल, यहाँ की सड़क पर दो बेहद तीखे और खतरनाक मोड़ हैं, जो एक-दूसरे को इस तरह काटते हैं कि यदि इन्हें ऊंचाई से देखा जाए, तो इनकी आकृति हुबहू एक खुली हुई कैंची की तरह दिखाई देती है। इसी अनूठी भौगोलिक बनावट के कारण स्थानीय लोग इस जगह को ‘कैंची’ कहने लगे और जब बाबा ने यहाँ अपना ठिकाना बनाया, तो यह पावन स्थल ‘कैंची धाम’ के नाम से जगप्रसिद्ध हो गया।

स्थापना का इतिहास: बिना नक्शे के तैयार हुआ भव्य धाम

कैंची धाम का इतिहास महान हिंदू संत नीम करौली बाबा (जिन्हें उनके भक्त आदर से ‘महाराज जी’ कहते हैं) के आगमन से शुरू होता है। बाबा नीम करौली पहली बार 1961 के आसपास इस निर्जन और शांत स्थान पर आए थे। उन्होंने अपने परम मित्र और स्थानीय बुजुर्गों के सहयोग से इस भूमि पर एक आश्रम और हनुमान मंदिर के निर्माण की रूपरेखा तैयार की। इस धाम की सबसे अनोखी बात यह है कि इसका निर्माण किसी आधुनिक वास्तुशिल्प या पूर्व-निर्धारित नक्शे (ब्लूप्रिंट) के बिना किया गया था। बाबा जैसे-जैसे निर्देश देते गए, निर्माण कार्य वैसे-वैसे आगे बढ़ता गया। 15 जून 1964 को आश्रम में भगवान हनुमान जी की मूर्ति की भव्य प्राण-प्रतिष्ठा की गई। इसके बाद से ही हर साल 15 जून को कैंची धाम का स्थापना दिवस बेहद धूमधाम से मनाया जाता है, जहाँ लाखों की संख्या में श्रद्धालु उमड़ते हैं और बाबा का प्रसिद्ध मालपुए का प्रसाद ग्रहण करते हैं। 10 सितंबर 1973 को बाबा के महासमाधि लेने के बाद उनके अस्थि कलश को भी यहीं स्थापित किया गया, जिसके बाद 1974 से मंदिर परिसर का और अधिक विस्तार हुआ।

कौन थे नीम करौली बाबा?

20वीं सदी के सबसे श्रद्धेय संतों में शुमार नीम करौली बाबा का जन्म उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद जिले के अकबरपुर गांव में एक संपन्न ब्राह्मण परिवार में हुआ था। बचपन में उनका नाम लक्ष्मण नारायण शर्मा था। महज 11 वर्ष की अल्पायु में उनका विवाह कर दिया गया था, लेकिन सांसारिक बंधनों से विरक्त होकर वे 12 वर्ष की उम्र में ही घर छोड़कर साधना के मार्ग पर निकल पड़े। उन्होंने देश के कोने-कोने में, विशेषकर उत्तर प्रदेश, गुजरात और राजस्थान की गुफाओं में कठिन तपस्या की। बाद में पिता के आदेश पर वे कुछ समय के लिए गृहस्थ जीवन में लौटे और उनके तीन बच्चे भी हुए, लेकिन ईश्वर भक्ति और लोक कल्याण की भावना उन्हें दोबारा जनसेवा की ओर खींच लाई। भक्तों का एक बड़ा वर्ग उन्हें साक्षात भगवान हनुमान जी का अंश या अवतार मानता है। बाबा हमेशा एक साधारण कंबल ओढ़े रहते थे और उनके पैर छूने की कोशिश करने वाले भक्तों को वे हमेशा यही सीख देते थे कि पैर सिर्फ हनुमान जी के छुओ, उनके नहीं।

जब घी की जगह पानी से बनीं पूड़ियाँ: बाबा के चमत्कार

कैंची धाम से जुड़ी अनगिनत चमत्कारिक कथाएं आज भी कुमाऊं की पहाड़ियों और भक्तों की जुबान पर तैरती हैं। एक बार आश्रम में विशाल भंडारा चल रहा था और अचानक घी की भारी कमी हो गई। बाबा के निर्देश पर जब पास की शिप्रा नदी से कनस्तरों में पानी भरकर लाया गया और उसे कड़ाही में डाला गया, तो वह पानी चमत्कारिक रूप से शुद्ध देसी घी में बदल गया और भंडारे की पूड़ियाँ उसी से तली गईं। इसी तरह एक बार चिलचिलाती धूप में तड़प रहे एक भक्त के ऊपर बाबा ने बादलों की छतरी बनवा दी थी। बाबा के बारे में यह भी प्रसिद्ध है कि वे त्रिकालदर्शी थे और दूर बैठे किसी भी व्यक्ति के मन की बात या उसकी समस्या को पल भर में जान लेते थे। हालांकि, इन चमत्कारों को वैज्ञानिक पैमानों पर नहीं तौला जा सकता, लेकिन आस्थावान भक्तों के लिए ये बाबा की असीम कृपा के साक्षात प्रमाण हैं।

सिलिकॉन वैली का कैंची धाम कनेक्शन

कैंची धाम की प्रसिद्धि केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि दुनिया की सबसे बड़ी तकनीकी कंपनियों (सिलिकॉन वैली) के संस्थापकों का जीवन बदलने में भी इस धाम की बड़ी भूमिका रही है। बात 1974 की है, जब एप्पल (Apple) के संस्थापक स्टीव जॉब्स अपने जीवन के बेहद कठिन और असमंजस के दौर से गुजर रहे थे। वे आत्मिक शांति और जीवन का उद्देश्य खोजने भारत आए और कैंची धाम पहुंचे। हालांकि तब तक बाबा समाधि ले चुके थे, लेकिन जॉब्स को उस परिसर में जो दिव्य ऊर्जा मिली, उसने उनकी आंतरिक बेचैनी को शांत कर दिया। यहीं से उन्हें Apple को एक वैश्विक ब्रांड बनाने की प्रेरणा मिली।वर्षों बाद, जब फेसबुक (अब मेटा) के सह-संस्थापक मार्क जुकरबर्ग भी अपने करियर के एक बेहद बुरे दौर से गुजर रहे थे और कंपनी को बेचने का विचार कर रहे थे, तब स्टीव जॉब्स ने ही उन्हें भारत जाकर कैंची धाम में कुछ दिन बिताने की सलाह दी थी। जुकरबर्ग 2008 में कैंची धाम आए, यहाँ उन्होंने ध्यान लगाया और जब वे अमेरिका लौटे, तो एक नई सोच और अभूतपूर्व मानसिक स्पष्टता के साथ लौटे। यही कारण है कि आज सिलिकॉन वैली के कई टेक दिग्गजों के कार्यालयों में नीम करौली बाबा की तस्वीरें सम्मान के साथ लगी देखी जा सकती हैं।

कैंची धाम में क्या है खास?

कैंची धाम परिसर में प्रवेश करते ही एक अलग ही दुनिया का अहसास होता है। मुख्य मंदिर में संकटमोचन हनुमान जी की भव्य और शांत प्रतिमा विराजमान है। इसके ठीक बगल वाले कक्ष में श्री लक्ष्मी नारायण और तीसरे कक्ष में शिव परिवार की स्थापना की गई है।परिसर के भीतर महाराज जी द्वारा बनवाया गया एक भव्य कीर्तन भवन भी है, जहाँ माँ वैष्णो देवी का मंदिर स्थापित है। आश्रम के दक्षिण भाग में चट्टानों और जंगलों को साफ करके ‘अद्वैत आश्रम’ का निर्माण किया गया है, जिसके भीतर विष्णु कुटी, कृष्ण-बलराम कुटी और गोविंद कुटी जैसी पवित्र साधना स्थलियां मौजूद हैं। आश्रम की व्यवस्था बेहद अनुशासित है, जहाँ स्वच्छता, मौन और सात्विकता का विशेष ध्यान रखा जाता है।

कैसे पहुंचें कैंची धाम?

यदि आप भी कैंची धाम की यात्रा का मन बना रहे हैं, तो यहाँ पहुंचना बेहद सुगम है। हवाई मार्ग से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए सबसे नजदीकी हवाई अड्डा पंतनगर (Pantnagar) है, जो आश्रम से लगभग 70 किलोमीटर दूर है। रेल मार्ग के लिए काठगोदाम (Kathgodam) रेलवे स्टेशन सबसे पास है, जहाँ से कैंची धाम की दूरी करीब 38 किलोमीटर है। काठगोदाम या हल्द्वानी से आप निजी टैक्सी या उत्तराखंड परिवहन की बसों के जरिए बेहद आसानी से भवाली होते हुए कैंची धाम पहुंच सकते हैं। सड़क मार्ग से यह क्षेत्र दिल्ली और उत्तर भारत के प्रमुख शहरों से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है।

मरुस्थल में समंदर है कैंची धाम

विज्ञान और तकनीक के इस दौर में जहाँ इंसान हर भौतिक सुख-सुविधा पाकर भी मानसिक तनाव और अशांति से जूझ रहा है, वहाँ कैंची धाम एक मरुस्थल में नखलिस्तान की तरह है। यह पावन धाम सिद्ध करता है कि सच्ची शांति और प्रगति का मार्ग केवल बाहरी दुनिया में नहीं, बल्कि आंतरिक चेतना और निस्वार्थ सेवा में छिपा है, जैसा कि नीम करौली बाबा हमेशा सिखाते थे- “सबको प्यार करो, सबकी सेवा करो, भगवान को याद करो और सच बोलो।”

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