Gujarat: नवरात्रि में पुरुषों का साड़ी पहनकर गरबा, 200 साल पुरानी परंपरा

The CSR Journal Magazine
गुजरात में नवरात्रि का नाम सुनते ही गरबा, रंग-बिरंगे कपड़े और देवी की भक्ति की छवि सामने आती है। लेकिन अहमदाबाद के शाहपुर इलाके में नवरात्रि की आठवीं रात एक ऐसी परंपरा निभाई जाती है, जो लोगों को चौंका देती है। यहां बारोट समुदाय के पुरुष साड़ी पहनकर गरबा करते हैं। यह परंपरा करीब 200 साल पुरानी है और इसके पीछे एक महिला के बलिदान की कहानी छिपी है।

साड़ी पहनकर गरबा: एक अनोखा दृश्य

अहमदाबाद के शाहपुर इलाके की साडू माता नी पोल में हर साल नवरात्रि की आठवीं रात, पुरुष साड़ी पहनकर इकट्ठा होते हैं। माथे पर सिंदूर की बिंदी लगाए ये पुरुष साडू माता के सम्मान में पारंपरिक गरबा करते हैं। इस रस्म में बारोट समुदाय के लोगों के साथ-साथ अन्य समुदायों के लोग भी शामिल होते हैं। इस साल भी कम से कम 40 पुरुष इस परंपरा में शामिल हुए, जिनमें मुस्लिम समुदाय के लोग भी थे।

परंपरा का महत्व

60 वर्षीय सतीश बारोट ने बताया कि वह पिछले 40 साल से इस रस्म का हिस्सा बन रहे हैं। वहीं, सुरेंद्रनगर से आए पिंटू बारोट अपने परिवार के साथ पहुंचे। उनके 10 साल के बेटे, भाई और भतीजे ने पहली बार इस परंपरा में भाग लिया। यह दृश्य न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि सामूहिक एकता का भी।

साडू माता के बलिदान की कहानी

स्थानीय लोगों के अनुसार, इस परंपरा की जड़ें करीब 200 साल पुरानी एक घटना से जुड़ी हैं। बताया जाता है कि बारोट समुदाय की साडू माता अपनी असाधारण सुंदरता के लिए जानी जाती थीं। तत्कालीन शासक ने उन्हें दरबार में पेश करने का आदेश दिया था। इस आदेश का विरोध करते हुए समुदाय के लोग साडू माता को उनकी इच्छा के खिलाफ दरबार ले जाने के खिलाफ खड़े हो गए।
इस दौरान सैनिकों और समुदाय के लोगों के बीच टकराव की स्थिति बन गई। स्थानीय मान्यता के अनुसार, खतरा बढ़ने पर साडू माता ने पहले अपनी बेटी अजूबा की जान ले ली। इसके बाद उन्होंने अपने पति हाथीसिंह बारोट से कहा कि उन्हें शाही दरबार में ले जाने के बजाय तलवार के एक वार से उनकी जान ले लें। इस तरह साडू माता की मृत्यु हो गई।
इस घटना के बाद समुदाय के लोगों को गहरा पछतावा हुआ कि वे उनकी रक्षा नहीं कर सके। स्थानीय मान्यता के अनुसार, साडू माता की मृत्यु के बाद समुदाय के लोगों को लगने लगा कि उनके परिवारों पर कोई श्राप लग गया है। उनका दावा था कि परिवारों में पुरुषों की मौतें होने लगीं और वंश आगे बढ़ने में मुश्किलें आने लगीं।

स्मारक पर इकट्ठा होना

इसके बाद समुदाय के लोग साडू माता के स्मारक पर इकट्ठा हुए। उन्होंने अपनी गलती के लिए प्रायश्चित किया और परिवारों की खुशहाली तथा आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रार्थना की। इसी क्रम में पुरुषों ने साडू माता से जुड़े कपड़े पहनने का संकल्प लिया। समुदाय का विश्वास है कि प्रार्थनाओं के बाद उनके परिवारों की वंश-परंपरा फिर से आगे बढ़ने लगी।

नवरात्रि की स्थायी परंपरा

धीरे-धीरे साड़ी पहनकर गरबा करने की यह रस्म नवरात्रि की आठवीं रात की स्थायी परंपरा बन गई। आज इस आयोजन में शामिल होने वाले पुरुष इसे केवल एक रस्म नहीं, बल्कि आस्था, भक्ति, कृतज्ञता और सामूहिक संकल्प का प्रतीक मानते हैं। यह परंपरा गुजरात के नवरात्रि उत्सव के बीच एक ऐसी कहानी सामने लाती है, जिसमें लोकविश्वास और सदियों पुरानी स्मृतियां एक साथ दिखाई देती हैं।

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