अमेरिका ने यूरोप से भारत-चीन पर प्रतिबंध लगाने की कोशिश की, ट्रंप के वित्त मंत्री का बड़ा खुलासा

The CSR Journal Magazine
रूस से तेल खरीदने के मुद्दे पर अमेरिका ने भारत और चीन पर प्रतिबंध लगाने की योजना बनाई थी। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने इस बात का खुलासा किया है कि अमेरिका चाहता था कि यूरोपीय देश इन देशों पर सेकेंडरी सैंक्शन लगाएं। लेकिन यूरोपीय सहयोगियों ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। बेसेंट ने कहा कि यूरोपीय देश रूसी ऊर्जा खरीदकर असल में यूक्रेन के खिलाफ रूस के युद्ध को बढ़ावा दे रहे हैं।

रूसी ऊर्जा पर यूरोप का निर्भरता

बेसेंट ने आरोप लगाया कि यूरोप ने यूक्रेन की तुलना में रूस और व्लादिमीर पुतिन को अधिक पैसे दिए हैं। उन्होंने बताया कि अमेरिका केवल 4 अरब डॉलर के रूसी उत्पादों का आयात करता है, जिसमें से 1.8 अरब डॉलर का फर्टिलाइजर है। वहीं, यूरोपीय देश इससे 10 गुना ज्यादा आयात कर रहे हैं। इस स्थिति ने अमेरिका को चिंतित कर दिया है।

60 दिनों के लिए अस्थायी रोक

अमेरिका ने हाल ही में घोषणा की कि रूस पर प्रतिबंधों और भारत समेत अन्य देशों पर टैरिफ से दी गई छूट असल में 60 दिनों के लिए अस्थायी है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो और वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने बताया कि ‘लिंडसे ओ ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट’ राष्ट्रपति को स्थिति का आकलन करने की छूट देता है। इस 60 दिनों की अवधि में अमेरिका यह देखना चाहता है कि प्रतिबंधों और टैरिफ का वैश्विक अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा।

ट्रंप का कार्यकारी आदेश

बेसेंट ने कहा कि ट्रंप का एक कार्यकारी आदेश शुक्रवार को जारी किया गया था, जो सिर्फ ग्राहम एक्ट के तहत 60 दिनों की छूट देता है। इस दौरान कोई स्थायी प्रतिबंध नहीं हटाए गए हैं। अमेरिका का यह कदम वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर दबाव डालने वाले कई कारणों को ध्यान में रखते हुए उठाया गया है, जैसे कि ईरान युद्ध और सऊदी अरब में हूतियों के हमले।

ट्रंप का बचाव

ट्रंप ने मियामी के पास मार-ए-लागो रिसॉर्ट में अपने फैसले का बचाव करते हुए कहा कि यह अमेरिका और दुनिया दोनों के लिए एक अच्छा फैसला साबित होगा। हालांकि, इस फैसले का अमेरिका में रिपब्लिकन और डेमोक्रेट दोनों पार्टियों के सांसदों ने विरोध किया है।

भारतीय सांसदों की प्रतिक्रिया

भारतीय-अमेरिकी सांसद अमी बेरा ने सोशल मीडिया पर लिखा कि ट्रंप का यह कदम पुतिन को राहत देने और यूक्रेन को पीछे छोड़ने जैसा है। सांसद सुहास सुब्रमण्यम ने भी ट्रंप के इस रुख पर सवाल उठाते हुए कहा कि रिपब्लिकन सहयोगियों की ढिलाई की कीमत अब अमेरिका और उसके सहयोगियों को चुकानी पड़ रही है।

भविष्य की अनिश्चितता

इस स्थिति ने न केवल अमेरिका की विदेश नीति को चुनौती दी है, बल्कि भारत और चीन के साथ उसके संबंधों पर भी सवाल उठाए हैं। अमेरिका के इस कदम से यह स्पष्ट होता है कि वैश्विक राजनीति में ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक हितों का कितना बड़ा महत्व है।

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