राजनीतिक संग्राम: पुणे शिक्षक सीट पर BJP और शिवसेना का आमना-सामना, महायुति में उठे बेमेल मुद्दे
महाराष्ट्र विधान परिषद (MLC) की पांच सीटों पर होने वाले द्विवार्षिक चुनावों को लेकर सत्तारूढ़ महायुति गठबंधन के भीतर राजनीतिक घमासान चरम पर पहुंच गया है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) द्वारा तीन प्रमुख सीटों पर अपने प्रत्याशियों का ऐलान किए जाने के बाद से ही सहयोगी दलों, मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की शिवसेना और उपमुख्यमंत्री अजित पवार की एनसीपी में सीटों के बंटवारे को लेकर तीव्र असंतोष और सियासी संग्राम छिड़ गया है। विशेष रूप से पुणे शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र को लेकर भाजपा और शिवसेना (शिंदे गुट) के बीच सीधा टकराव खुलकर सामने आ गया है, जिसने आगामी 23 अक्टूबर 2026 को होने वाले मतदान से पहले गठबंधन की एकजुटता पर गंभीर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं।
गठबंधन के सूत्रों के अनुसार, महायुति में सीटों के लिए 3:1:1 का फॉर्मूला तय किया गया था, जिसके तहत भाजपा को तीन सीटें (पुणे स्नातक, पुणे शिक्षक और नागपुर स्नातक) दी गईं, जबकि एनसीपी को छत्रपति संभाजीनगर (औरंगाबाद) स्नातक और शिवसेना को अमरावती शिक्षक सीट आवंटित की गई। हालांकि, भाजपा द्वारा पुणे शिक्षक सीट पर अपने उम्मीदवार की घोषणा के तुरंत बाद ही शिंदे गुट ने इस सीट पर अपनी मजबूत दावेदारी ठोकते हुए बगावती तेवर अख्तियार कर लिए हैं।
पुणे की सीट पर महासंग्राम: आमने-सामने आए सहयोगी
पुणे शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र इस समय महाराष्ट्र की राजनीति का सबसे बड़ा हॉटस्पॉट बन चुका है। भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने रविवार को इस सीट से कौस्तुभ मुरलीधर गावड़े को अपना आधिकारिक उम्मीदवार घोषित किया। भाजपा का तर्क है कि पुणे संभाग पारंपरिक रूप से उसका मजबूत गढ़ रहा है और उसने शिक्षक मतदाताओं के बीच गहरी पैठ रखने वाले चेहरे पर दांव खेला है।
भाजपा के इस कदम से शिंदे की शिवसेना में तीव्र आक्रोश फैल गया है। शिवसेना के कद्दावर नेता और मुख्यमंत्री के करीबी मंगेश चिवते ने आरोप लगाया है कि वह पिछले दो वर्षों से इस क्षेत्र में शिक्षकों और शिक्षाविदों की समस्याओं पर लगातार काम कर रहे हैं, इसलिए इस सीट पर उनका स्वाभाविक हक बनता है। चिवते ने बेहद आक्रामक रुख अपनाते हुए स्पष्ट घोषणा की है कि वह मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के निर्देशानुसार मंगलवार, 6 अक्टूबर को ‘महायुति के असली उम्मीदवार’ के रूप में अपना नामांकन पत्र दाखिल करेंगे।
पुणे में महायुति का यह अंदरूनी संकट यहीं खत्म नहीं होता। शिवसेना के एक और धड़े और उद्योग मंत्री उदय सामंत के विशेष कार्यकारी अधिकारी (OSD) सचिन सानप ने भी इसी सीट से चुनाव लड़ने के लिए मोर्चा खोल दिया है और निर्दलीय के तौर पर नामांकन दाखिल कर दिया है। इसके चलते भाजपा उम्मीदवार के खिलाफ खुद शिवसेना से जुड़े दो चेहरे मैदान में उतर आए हैं, जिससे महायुति के वोटों में बड़े बिखराव का खतरा पैदा हो गया है।
नागपुर और अन्य सीटों पर भी असंतोष की चिंगारी
पुणे के अलावा नागपुर स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में भी भाजपा के भीतर आंतरिक बगावत की स्थिति बन गई है। भाजपा ने नागपुर से उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के बेहद करीबी माने जाने वाले सुधाकर कोहले को टिकट दिया है। कोहले का दावा है कि संगठन ने क्षेत्र के लगभग 2.5 लाख पंजीकृत स्नातकों में से 1.90 लाख वोटरों का पंजीकरण खुद करवाया है। लेकिन ऐन वक्त पर टिकट कटने से नाराज भाजपा के पूर्व विधायक अनिल सोले ने बगावती रुख अपनाते हुए अपक्ष (निर्दलीय) उम्मीदवार के तौर पर पर्चा भरने की पूरी तैयारी कर ली है, जिसने स्थानीय संगठन की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। दूसरी तरफ, अजित पवार की एनसीपी को छत्रपति संभाजीनगर स्नातक निर्वाचन क्षेत्र दिया गया है, लेकिन पार्टी के भीतर भी पुणे की दोनों सीटों को लेकर अंदरूनी असंतोष देखा जा रहा है। एनसीपी के स्थानीय नेताओं का मानना था कि पुणे में उनकी पकड़ को देखते हुए उन्हें कम से कम एक सीट मिलनी चाहिए थी।
नामांकन और नाम वापसी का गणित
भारतीय चुनाव आयोग (ECI) द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार, विधान परिषद की इन पांचों सीटों के लिए चुनावी प्रक्रिया अत्यंत महत्वपूर्ण चरण में है:
• नामांकन की आखिरी तारीख: 6 अक्टूबर 2026
• नामांकन पत्रों की जांच (Scrutiny): 7 अक्टूबर 2026
• नाम वापसी की अंतिम तिथि: 9 अक्टूबर 2026
• मतदान की तिथि: 23 अक्टूबर 2026
• मतगणना और परिणाम: 27 अक्टूबर 2026
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि महायुति के शीर्ष नेताओं के पास 9 अक्टूबर तक का ही समय है कि वे अपने बागियों और नाराज सहयोगियों को मनाकर नाम वापस लेने के लिए राजी करें। यदि ऐसा नहीं हो पाता है, तो 23 अक्टूबर को महायुति के दल आपस में ही दो-दो हाथ करते नजर आएंगे।
दिल्ली दौरे और डैमेज कंट्रोल की कोशिशें
गठबंधन में मचे इस घमासान के बीच, मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे का अचानक नई दिल्ली का अघोषित दौरा बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक, शिंदे दिल्ली में भाजपा के शीर्ष केंद्रीय नेतृत्व के साथ बैठक कर सीटों के री-एडजस्टमेंट और बागियों को शांत करने की रणनीति पर चर्चा कर रहे हैं। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष रवींद्र चव्हाण ने भी बयान दिया है कि लोकतंत्र में सहयोगियों को अपनी इच्छा व्यक्त करने का अधिकार है, लेकिन अंतिम निर्णय तीनों दलों के शीर्ष नेता मिलकर सौहार्दपूर्ण ढंग से कर लेंगे।
विपक्ष की रणनीति और महायुति के लिए खतरे की घंटी
एक तरफ जहां सत्तारूढ़ महायुति सीटों के अंतर्विरोधों से जूझ रही है, वहीं विपक्षी महा विकास आघाड़ी (MVA) इस दरार का पूरा फायदा उठाने की फिराक में है। कांग्रेस ने पहले ही नागपुर स्नातक सीट से अभिजीत वंजारी और पुणे शिक्षक सीट से जयंत दिनकर असगांवकर को मैदान में उतारकर अपनी मजबूत घेराबंदी कर दी है। यदि पुणे और नागपुर जैसी महत्वपूर्ण सीटों पर महायुति का यह आपसी गतिरोध समय रहते नहीं सुलझा, तो इसका सीधा लाभ विपक्ष को मिलना तय माना जा रहा है। यह चुनाव इसलिए भी बेहद संवेदनशील है क्योंकि इसके नतीजे आने वाले समय में राज्य के आगामी बड़े चुनावों के लिए जनता के मिजाज और गठबंधन के भविष्य की दिशा तय करेंगे। अब देखना यह होगा कि 9 अक्टूबर की समयसीमा तक महायुति के चाणक्य इस सियासी संग्राम को थामने में कितने सफल हो पाते हैं।
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