महाराष्ट्र में सरकारी कर्मचारियों को प्रमोशन-वेतनवृद्धि के लिए नहीं देनी होगी हिंदी परीक्षा

The CSR Journal Magazine
महाराष्ट्र में हिंदी परीक्षा पर फडणवीस सरकार का बड़ा यू-टर्न, सरकारी अधिकारियों-कर्मचारियों को अब वेतन वृद्धि और प्रमोशन के लिए नहीं देनी होगी हिंदी परीक्षा; मराठी-अंग्रेजी के इस्तेमाल को बताया आधार।

महाराष्ट्र में सरकारी कर्मचारियों के लिए 50 साल पुराना नियम खत्म, अब प्रमोशन-वेतनवृद्धि के लिए नहीं देनी होगी परीक्षा

महाराष्ट्र में भाषा को लेकर जारी राजनीतिक और सामाजिक बहस के बीच मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व वाली राज्य सरकार ने एक बड़ा फैसला लेते हुए सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए आयोजित होने वाली हिंदी भाषा परीक्षा की व्यवस्था पूरी तरह समाप्त कर दी है। मराठी भाषा विभाग ने 31 अगस्त 2026 को शासन निर्णय जारी कर भाषा संचालनालय के माध्यम से होने वाली हिंदी भाषा परीक्षा को रद्द कर दिया। खास बात यह है कि इस फैसले को 7 मई 2026 से प्रभावी माना गया है, यानी जिस दिन सरकार ने इस परीक्षा पर पहली बार रोक लगाई थी, उसी तारीख से इसे समाप्त माना जाएगा। इस फैसले के बाद उन सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों को अब नौकरी के दौरान निर्धारित हिंदी परीक्षा पास करने की बाध्यता नहीं रहेगी, जिन्हें पहले नियमों के तहत यह परीक्षा देनी पड़ती थी। परीक्षा पास नहीं करने की स्थिति में वेतन वृद्धि रोकने जैसी व्यवस्था भी अब लागू नहीं होगी। इसी तरह पदोन्नति से जुड़ी हिंदी परीक्षा की बाध्यता भी समाप्त हो गई है।

1976 के नियम से जुड़ी थी परीक्षा की व्यवस्था

महाराष्ट्र सरकार की पुरानी व्यवस्था में हिंदी भाषा परीक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण प्रावधान 10 जून 1976 के शासन निर्णय से जुड़े थे। आधिकारिक भाषा संचालनालय की उपलब्ध जानकारी के अनुसार, निर्धारित हिंदी परीक्षा पास नहीं करने वाले कर्मचारियों की वार्षिक वेतन वृद्धि परीक्षा पास करने तक रोकने का प्रावधान था। हालांकि, हिंदी पढ़ चुके कर्मचारियों, कुछ तकनीकी पदों पर कार्यरत कर्मचारियों और 45 वर्ष की आयु पूरी कर चुके कर्मचारियों को अलग-अलग परिस्थितियों में छूट भी दी जाती थी। इसलिए यह कहना अधिक सटीक होगा कि अब सरकार ने उस पूरी परीक्षा-व्यवस्था और उससे जुड़े पुराने शासन निर्णयों को समाप्त कर दिया है। सरकार के नए आदेश में पहले जारी किए गए संबंधित शासन निर्णय, परिपत्र और आदेशों को अधिशेष/अधिक्रमित किया गया है।

28 जून को होनी थी परीक्षा, मई में ही लग गई थी रोक

इस पूरे विवाद की शुरुआत 2026 में उस समय हुई जब राज्य भाषा संचालनालय ने सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए हिंदी भाषा की निम्न श्रेणी और उच्च श्रेणी परीक्षा आयोजित करने की प्रक्रिया शुरू की थी। परीक्षा 28 जून 2026 को आयोजित की जानी थी। लेकिन परीक्षा को लेकर महाराष्ट्र में विरोध शुरू हो गया। राजनीतिक दलों के अलावा मराठी भाषा से जुड़े संगठनों ने भी सवाल उठाए कि महाराष्ट्र में सरकारी कामकाज के लिए हिंदी परीक्षा को अनिवार्य बनाए रखने की जरूरत आखिर क्यों है। विवाद बढ़ने के बाद सरकार ने 7 मई 2026 को परीक्षा पर रोक लगा दी थी। उस समय इसे स्थगन के रूप में देखा गया था, लेकिन अब 31 अगस्त के शासन निर्णय के जरिए सरकार ने इसे स्थायी रूप से समाप्त कर दिया है।

सरकार ने क्या वजह बताई?

राज्य सरकार के फैसले का मुख्य आधार प्रशासनिक कामकाज की मौजूदा भाषा व्यवस्था को बताया गया है। सरकार के अनुसार महाराष्ट्र में राज्य प्रशासन का कामकाज मुख्य रूप से मराठी भाषा में होता है, जबकि केंद्र सरकार और दूसरे राज्यों के साथ आधिकारिक संवाद के लिए अंग्रेजी का इस्तेमाल किया जाता है। ऐसे में सरकार ने तर्क दिया है कि सरकारी कर्मचारियों पर अलग से हिंदी भाषा परीक्षा लागू करने का वर्तमान प्रशासनिक व्यवस्था में पर्याप्त औचित्य नहीं रह गया है। यानी सरकार का आधिकारिक तर्क यह है कि यह फैसला किसी भाषा के विरोध में नहीं, बल्कि प्रशासनिक जरूरत और मौजूदा सरकारी कामकाज की वास्तविक भाषा व्यवस्था को ध्यान में रखकर लिया गया है।

हिंदी परीक्षा का नियम आखिर क्यों बनाया गया था?

हिंदी परीक्षा की यह व्यवस्था महाराष्ट्र के गठन से पहले की प्रशासनिक परंपराओं से जुड़ी हुई थी और बाद में महाराष्ट्र सरकार के विभिन्न शासन निर्णयों के जरिए इसे जारी रखा गया। भाषा संचालनालय के दस्तावेजों में 1976, 1981, 1984 और उसके बाद के कई शासन निर्णयों का उल्लेख मिलता है। पुरानी व्यवस्था का उद्देश्य सरकारी कर्मचारियों में हिंदी का आवश्यक ज्ञान सुनिश्चित करना था। विशेषकर ऐसे कर्मचारी जिन्होंने स्कूली शिक्षा के दौरान हिंदी को आवश्यक स्तर तक नहीं पढ़ा था, उनके लिए सेवा अवधि में परीक्षा पास करने की व्यवस्था थी। लेकिन समय के साथ सरकारी कामकाज, भाषा नीति और प्रशासनिक जरूरतों में बदलाव आया। सरकार ने अब इसी बदलती स्थिति को आधार बनाकर लगभग पांच दशक पुरानी परीक्षा व्यवस्था को समाप्त करने का फैसला किया है।

एक तरफ मराठी की अनिवार्यता, दूसरी तरफ हिंदी परीक्षा खत्म

महाराष्ट्र सरकार का यह फैसला ऐसे समय आया है जब राज्य में भाषा का मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में है। हाल ही में राज्य सरकार ने ऑटो-रिक्शा, टैक्सी और अन्य यात्री वाहन चालकों के लिए कामचलाऊ मराठी ज्ञान की अनिवार्यता लागू करने की दिशा में कदम उठाया था। अगस्त में परिवहन विभाग ने इस नियम को लागू करने की तैयारी शुरू की थी और मराठी भाषा की जांच भी की गई। नियम का पालन नहीं करने वाले चालकों के लाइसेंस पर कार्रवाई का प्रावधान प्रस्तावित किया गया था। हालांकि, इस मुद्दे पर विवाद बढ़ने के बाद मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने 27-28 अगस्त के आसपास एक साल की मोहलत देने की घोषणा की। उन्होंने कहा कि ऑटो और टैक्सी यूनियनों के प्रतिनिधियों से बातचीत के बाद चालकों को मराठी सीखने के लिए एक और वर्ष दिया जाएगा और इस अवधि में भाषा संबंधी अनुपालन न होने पर उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं की जाएगी। यही वजह है कि हिंदी परीक्षा खत्म करने के फैसले को महाराष्ट्र की मौजूदा भाषा राजनीति के संदर्भ में भी देखा जा रहा है।

क्या यह हिंदी के खिलाफ फैसला है?

सरकार के आदेश को सीधे तौर पर ‘हिंदी पर प्रतिबंध’ कहना सही नहीं होगा। इस फैसले का अर्थ यह नहीं है कि महाराष्ट्र में हिंदी भाषा के इस्तेमाल पर रोक लगा दी गई है। हिंदी बोलने, पढ़ने या लिखने पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया गया है। फैसला केवल सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए निर्धारित हिंदी भाषा परीक्षा की अनिवार्यता से संबंधित है। यानी आम नागरिकों के लिए हिंदी का इस्तेमाल पहले की तरह जारी रहेगा। सरकारी कर्मचारियों के लिए भी हिंदी जानना प्रतिबंधित नहीं है; केवल इसे एक अनिवार्य सेवा-परीक्षा के रूप में पास करने की शर्त हटा दी गई है।

कर्मचारियों पर क्या असर पड़ेगा?

इस फैसले का सबसे सीधा असर उन सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों पर पड़ेगा जिनके लिए हिंदी परीक्षा पास करना सेवा की शर्तों से जुड़ा हुआ था। अब:
  • हिंदी भाषा की अनिवार्य सेवा परीक्षा नहीं देनी होगी।
  • परीक्षा पास नहीं करने के कारण वार्षिक वेतन वृद्धि रोकने की पुरानी व्यवस्था लागू नहीं होगी।
  • हिंदी परीक्षा को लेकर पदोन्नति से जुड़ी बाध्यता समाप्त हो जाएगी।
  • भाषा संचालनालय द्वारा इस उद्देश्य से परीक्षा आयोजित करने की पुरानी व्यवस्था खत्म हो जाएगी।
  • पुराने संबंधित शासन निर्णय और आदेश नए शासन निर्णय से अधिक्रमित हो गए हैं।

राजनीतिक दबाव की चर्चा क्यों?

सरकार के इस फैसले के बाद सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल यही है कि क्या यह केवल प्रशासनिक सुधार है या इसके पीछे राजनीतिक दबाव भी काम कर रहा था? हिंदी परीक्षा को लेकर मई से ही विरोध के स्वर सामने आ रहे थे। मराठी भाषा से जुड़े संगठनों और राजनीतिक दलों ने सवाल उठाया था कि महाराष्ट्र में सरकारी कर्मचारियों पर हिंदी परीक्षा क्यों थोपी जाए। दूसरी ओर, हाल के महीनों में महाराष्ट्र में मराठी भाषा और ‘मराठी अस्मिता’ को लेकर राजनीति भी तेज हुई है। इसी पृष्ठभूमि में सरकार के फैसले को लेकर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं आना स्वाभाविक है। हालांकि, सरकार के आधिकारिक शासन निर्णय में किसी राजनीतिक दल या संगठन के दबाव को फैसले का कारण नहीं बताया गया है। आधिकारिक तौर पर प्रशासनिक कामकाज में मराठी और अंग्रेजी के इस्तेमाल तथा हिंदी परीक्षा की घटती प्रशासनिक उपयोगिता को आधार बनाया गया है। इसलिए ‘किसके दबाव में फैसला लिया गया’ का निश्चित जवाब फिलहाल उपलब्ध आधिकारिक दस्तावेज से नहीं मिलता। राजनीतिक दबाव की बातें राजनीतिक दलों और विश्लेषकों की प्रतिक्रिया के रूप में देखी जानी चाहिए, न कि सरकार द्वारा स्वीकार किए गए तथ्य के रूप में।

भाषा की राजनीति के बीच बड़ा संदेश

महाराष्ट्र में भाषा हमेशा से सिर्फ संवाद का माध्यम नहीं रही है, बल्कि यह सामाजिक पहचान, क्षेत्रीय अस्मिता और राजनीति से भी जुड़ी रही है। ऐसे में एक तरफ बाहर से आए ऑटो-टैक्सी चालकों से मराठी सीखने की अपेक्षा और दूसरी तरफ सरकारी कर्मचारियों की अनिवार्य हिंदी परीक्षा को खत्म करना राज्य की भाषा नीति पर नई बहस को जन्म दे सकता है। सरकार का संदेश स्पष्ट दिखाई देता है कि महाराष्ट्र के प्रशासनिक ढांचे में मराठी को प्राथमिक स्थान प्राप्त है, जबकि अंतरराज्यीय और केंद्रीय स्तर के आधिकारिक संवाद में अंग्रेजी महत्वपूर्ण माध्यम है। दूसरी ओर, हिंदी परीक्षा को हटाने से यह सवाल भी उठ सकता है कि क्या सरकार भविष्य में अन्य भाषाओं से जुड़े सेवा नियमों की भी समीक्षा करेगी।

50 साल बाद बदली तस्वीर

लगभग पांच दशक तक चली व्यवस्था का खत्म होना अपने आप में प्रशासनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण कदम है। 1976 के नियमों के दौर में जिस प्रशासनिक आवश्यकता को ध्यान में रखकर हिंदी परीक्षा लागू की गई थी, सरकार का मानना है कि आज की परिस्थितियां अलग हैं। 31 अगस्त 2026 का शासन निर्णय इस बदलाव को औपचारिक रूप देता है और इसकी प्रभावी तारीख 7 मई 2026 रखी गई है। इसलिए जून में प्रस्तावित हिंदी परीक्षा अब केवल स्थगित कार्यक्रम नहीं रही, बल्कि पूरी परीक्षा-व्यवस्था ही समाप्त हो चुकी है।

महाराष्ट्र में हिंदी-मराठी पर महा-बहस

महाराष्ट्र में भाषा को लेकर एक ही समय में दो अलग-अलग फैसले चर्चा में हैं। ऑटो-टैक्सी चालकों से बुनियादी मराठी ज्ञान की अपेक्षा जारी है, लेकिन उन्हें इसे पूरा करने के लिए एक साल की अतिरिक्त मोहलत दी गई है। वहीं सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए चली आ रही अनिवार्य हिंदी परीक्षा को सरकार ने पूरी तरह खत्म कर दिया है।

नई राजनीतिक बहस

फडणवीस सरकार के इस फैसले का तत्काल असर सरकारी कर्मचारियों पर पड़ेगा, जिन्हें अब हिंदी परीक्षा को लेकर वेतन वृद्धि या पदोन्नति की चिंता नहीं करनी होगी। लेकिन व्यापक स्तर पर यह फैसला महाराष्ट्र की भाषा नीति, मराठी अस्मिता और प्रशासन में भाषाई प्राथमिकताओं को लेकर नई राजनीतिक बहस को जरूर जन्म दे सकता है। फिलहाल आधिकारिक तौर पर सरकार का तर्क प्रशासनिक जरूरतों और महाराष्ट्र में मराठी-अंग्रेजी के सरकारी इस्तेमाल पर आधारित है; राजनीतिक दबाव की चर्चा मौजूद है, लेकिन उसे सरकारी आदेश में कारण के रूप में दर्ज नहीं किया गया है।
मुख्य तथ्य: महाराष्ट्र सरकार का 31 अगस्त 2026 का शासन निर्णय हिंदी भाषा परीक्षा को समाप्त करता है और इसे 7 मई 2026 से प्रभावी करता है। पुराने नियमों में परीक्षा न पास करने पर वार्षिक वेतन वृद्धि रोके जाने का प्रावधान था।

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