KBC 18: फीस न भर पाने पर 2 बार स्कूल से निकाले गए, अब गरीब बच्चों को मुफ्त पढ़ा रहे कानपुर के उद्देश्य

The CSR Journal Magazine
कानपुर के 27 वर्षीय उद्देश्य सचान की कहानी इन दिनों चर्चा में है। कभी स्कूल की फीस नहीं भर पाने के कारण जिन्हें दो बार स्कूल से निकाल दिया गया था, वही उद्देश्य आज गरीब और जरूरतमंद बच्चों को मुफ्त शिक्षा देने का काम कर रहे हैं। उनकी कहानी ‘कौन बनेगा करोड़पति 18’ के मंच तक पहुंची। अमिताभ बच्चन के सामने हॉट सीट पर बैठे उद्देश्य ने अपने बचपन की मुश्किलों से लेकर शिक्षा के लिए शुरू किए गए अपने मिशन तक की पूरी कहानी बताई। वह खेल में 25 लाख रुपये के सवाल तक पहुंचे, लेकिन जवाब को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं होने पर उन्होंने जोखिम लेने के बजाय खेल छोड़ दिया।

25 लाख के सवाल पर क्यों छोड़ा खेल?

उद्देश्य से 25 लाख रुपये के लिए पूछा गया कि प्राचीन भारत के किस शासक को ‘अमित्रघात’ की उपाधि से भी जाना जाता था? सवाल के विकल्प थे- सम्राट अशोक, बिंबिसार, समुद्रगुप्त और बिंदुसार। उद्देश्य ने पहले महाफ्लिप लाइफलाइन का इस्तेमाल किया। इसके बाद उन्होंने 50:50 लाइफलाइन ली, जिससे सिर्फ बिंबिसार और बिंदुसार विकल्प में बचे। इसके बावजूद वह जवाब को लेकर पूरी तरह निश्चित नहीं हो सके। उन्होंने आगे जोखिम नहीं लेने का फैसला किया और 12.5 लाख रुपये लेकर खेल से बाहर हो गए। खास बात यह रही कि खेल छोड़ने के बाद जब उनसे सही जवाब का अनुमान लगाने को कहा गया, तो उन्होंने बिंदुसार कहा। यही सही जवाब था।

‘अमित्रघात’ का मतलब क्या है?

बिंदुसार मौर्य साम्राज्य के दूसरे शासक थे। वह चंद्रगुप्त मौर्य के पुत्र और सम्राट अशोक के पिता थे। उन्हें ‘अमित्रघात’ के नाम से भी जाना जाता था। ‘अमित्र’ का अर्थ दुश्मन और ‘घात’ का अर्थ मारना या नष्ट करना होता है। यानी अमित्रघात का अर्थ शत्रुओं का संहार करने वाला माना जाता है। प्राचीन यूनानी लेखकों ने भी बिंदुसार के लिए इससे मिलता-जुलता नाम इस्तेमाल किया था।

फीस नहीं भर पाए तो दो बार स्कूल से निकाला

उद्देश्य की कहानी का सबसे भावुक हिस्सा उनका बचपन रहा। उन्होंने बताया कि उनके पिता दर्जी का काम करते थे और परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर थी। उनके पिता करीब 4 से 5 हजार रुपये महीने की कमाई में परिवार चलाते थे। मुश्किलें तब और बढ़ गईं जब उनकी मां को बिजली का करंट लग गया और वह बीमार हो गईं। आर्थिक परेशानी के बीच स्कूल की फीस भरना भी मुश्किल हो गया। उद्देश्य ने बताया कि फीस नहीं भर पाने के कारण उन्हें और उनके भाई को स्कूल से निकाल दिया गया था। उद्देश्य को 6 और 9 साल की उम्र में दो बार स्कूल से निकाला गया।

ढाबे और फैक्ट्री में काम कर पूरी की पढ़ाई

परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी, इसलिए उद्देश्य ने पढ़ाई जारी रखने के लिए अलग-अलग जगह काम किया। उन्होंने ढाबे और कैफे में काम किया। इसके अलावा कुछ फैक्ट्रियों में भी काम किया। इन मुश्किल परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने पढ़ाई जारी रखी। इन्हीं अनुभवों ने उनके मन में यह सवाल खड़ा किया कि क्या सिर्फ पैसे की कमी के कारण किसी बच्चे की पढ़ाई रुक जानी चाहिए? इसके बाद उन्होंने जरूरतमंद बच्चों को मुफ्त शिक्षा देने का फैसला किया।

250 रुपये से शुरू हुआ मुफ्त स्कूल

उद्देश्य ने स्कूल शुरू करने के लिए अपनी मां से 250 रुपये उधार लिए। उन्होंने पर्चे छपवाए और घर-घर जाकर बच्चों को पढ़ाई से जोड़ने की कोशिश शुरू की। साल 2019 में उन्होंने पेड़ के नीचे सिर्फ 12 बच्चों को मुफ्त पढ़ाना शुरू किया। धीरे-धीरे उनका यह प्रयास ‘गुरुकुलम-खुशियों वाला स्कूल’ के रूप में आगे बढ़ा। यहां गरीब और झुग्गी-बस्ती से आने वाले बच्चों को बिना फीस पढ़ाया जाता है। बच्चों को किताबें, ड्रेस, बैग और कंप्यूटर शिक्षा जैसी सुविधाएं भी देने की बात उद्देश्य ने केबीसी में बताई।

करीब 400 बच्चों को मुफ्त शिक्षा देने का दावा

केबीसी में उद्देश्य ने बताया कि उनके स्कूल में करीब 400 बच्चे पढ़ते हैं और उन्हें पूरी तरह मुफ्त शिक्षा दी जाती है। उनका लक्ष्य बच्चों को 12वीं तक की शिक्षा उपलब्ध कराना है। उद्देश्य ने यह भी बताया कि वह स्कूल से कोई कमाई नहीं करते। उनके खाने और रहने जैसी बुनियादी जरूरतों का खर्च उनके बड़े भाई उठाते हैं। वहीं, स्कूल की शुरुआत में उनकी मां ने आर्थिक मदद की थी।

संघर्ष से निकला शिक्षा का मिशन

पेड़ के नीचे 12 बच्चों से शुरू हुई यह पहल आज सैकड़ों बच्चों तक पहुंचने का दावा करती है। उद्देश्य अपनी कहानी के जरिए यह संदेश भी देते हैं कि आर्थिक परेशानी शिक्षा की राह में स्थायी बाधा नहीं बननी चाहिए। केबीसी के मंच पर 12.5 लाख रुपये जीतकर लौटे उद्देश्य की कहानी सिर्फ एक गेम शो की कहानी नहीं रही। उनका सफर दिखाता है कि बचपन की मुश्किलों को किसी दूसरे बच्चे के बेहतर भविष्य की वजह बनाया जा सकता है।

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