Karnataka Kaveri Jal Vivad: 10 साल में 14 बार सुप्रीम कोर्ट का दखल, फिर भी क्यों नहीं सुलझ रहा कावेरी जल विवाद?

The CSR Journal Magazine
कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच कावेरी नदी के पानी को लेकर विवाद एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गया है। 17 अगस्त 2026 को कोर्ट ने कर्नाटक को कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) के निर्देशों का पालन करने को कहा है। तमिलनाडु ने शिकायत की है कि कर्नाटक ने पानी छोड़ना शुरू तो किया, लेकिन उसका हिस्सा अब तक नहीं पहुंचा। दूसरी ओर, कर्नाटक ने न्यायालय को बताया कि पानी की गंभीर कमी है। अदालत ने स्थिति की रिपोर्ट मांगी है और मामले की सुनवाई एक हफ्ते के लिए टाल दी है। यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट को पिछले 10 वर्षों में बार-बार इस विवाद में दखल देना पड़ा है।

Karnataka Kaveri Jal Vivad: कौन हैं विवाद में मुख्य पक्ष?

2016 से 2026 के बीच, सुप्रीम कोर्ट ने कई बार पानी छोड़ने के अंतरिम आदेश जारी किए हैं। 2018 में, कोर्ट ने पानी के बंटवारे का मुख्य फैसला सुनाया। हालाँकि, विवाद बार-बार भड़कता रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि पेयजल और कृषि के लिए कर्नाटक और तमिलनाडु की जरूरतों के बीच एक स्पष्ट डिस्टेस शेयरिंग फ़ॉर्मुला की आवश्यकता है।

क्यों बार-बार उठता है विवाद?

कावेरी जल विवाद की जड़ 1892 और 1924 के समझौतों में है, जब पानी के उपयोग के लिए नियम बनाए गए थे। कर्नाटक में नई परियोजनाओं के चलते विवाद बढ़ा और 1974 में पुराना समझौता समाप्त होने के बाद दोनों राज्यों के बीच मतभेद गहरे होते गए। 1986 में तालाबों को लेकर महत्त्वपूर्ण मांगें की गई, जो आज तक अनसुलझी हैं।

बीते कुछ वर्षों की घटनाएँ

सुप्रीम कोर्ट ने 5 सितंबर 2016 को कर्नाटका को तमिलनाडु के लिए 15 हजार क्यूसेक पानी छोड़ने का आदेश दिया। पूरे साल विभिन्न आदेशों और निर्देशों द्वारा पानी की मात्रा को बार-बार घटाया गया। 16 फरवरी 2018 को कोर्ट ने एक बड़ा निर्णय लिया, जिसमें कर्नाटका को 14.75 TMC अतिरिक्त पानी दिया गया। इसके बावजूद, विवाद खत्म नहीं हुआ।

कम बारिश से बढ़ रही समस्या

कावेरी जल विवाद की सबसे बड़ी चुनौती कम बारिश के कारण उत्पन्न होती है। सामान्य साल में पानी का बंटवारा आसान होता है, लेकिन सूखे के साल में दोनों राज्यों के बीच बंटवारे को लेकर विवाद उत्पन्न होता है। यही मुद्दा 2026 में फिर से उठ खड़ा हुआ है। जब बारिश कम होती है, तो सवाल उठता है कि कमी का बोझ कैसे बाँटा जाए।

जल शक्ति मंत्रालय की जानकारी

जल शक्ति मंत्रालय ने हाल ही में बतायाः “सामान्य साल में, बिलिगुंडलु पर पानी का प्रवाह 177.25 TMC होना चाहिए, लेकिन वास्तविक प्रवाह हमेशा अलग रहता है।” 2023-24 और 2024-25 की रिपोर्टें दर्शाती हैं कि पानी की मात्रा में लगातार उतार-चढ़ाव आ रहा है।

तमिलनाडु और कर्नाटक के दावे

तमिलनाडु का कहना है कि उसे उसके हिस्से का पानी नहीं मिल रहा है और उसने कोर्ट में आरोप लगाया कि कर्नाटक DWMA के निर्देशों का पालन नहीं कर रहा है। दूसरी ओर, कर्नाटक का तर्क है कि कावेरी बेसिन में पानी की गंभीर कमी है। कर्नाटक ने अदालत में कहा है कि नदी का प्रवाह हाल ही में 12 हजार क्यूसेक से ऊपर पहुँच गया है।

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