भारत की महामारी तैयारी: 163 लैब और 602 क्रिटिकल केयर ब्लॉक, महामारी से लड़ाई की तैयारी
भारत सरकार ने भविष्य की महामारियों से निपटने के लिए हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर को ब्लॉक स्तर पर विकेंद्रीकृत करने का एक देशव्यापी सुरक्षा कवच तैयार किया है। PM-ABHIM (प्रधानमंत्री आयुष्मान भारत हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर मिशन) के अंतर्गत ₹64,180 करोड़ के बजट के साथ चिकित्सा तंत्र में ऐतिहासिक बदलाव लाया जा रहा है। इस रिपोर्ट में जानिए कि 602 क्रिटिकल केयर ब्लॉक (CCBs) और देश के लैब नेटवर्क के जरिए भारत अब कोरोना जैसी किसी भी नई वैश्विक महामारी का मुकाबला करने के लिए कितना और कैसे सक्षम हो चुका है।
602 क्रिटिकल केयर ब्लॉक (CCBs): जिला स्तर पर ICU का जाल
कोविड-19 की दूसरी लहर के दौरान ऑक्सीजन और ICU बेड की भारी किल्लत ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। उस संकट से सबक लेते हुए, सरकार ने 5 लाख से अधिक आबादी वाले सभी जिलों में 602 क्रिटिकल केयर हॉस्पिटल ब्लॉक (CCBs) स्थापित करने की मंजूरी दी। हाल ही में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे. पी. नड्डा ने बताया कि इस योजना के तहत स्वीकृत ब्लॉक्स की संख्या बढ़ाकर 631 तक कर दी गई है, ताकि सुरक्षा का कोई कोना न छूटे।
• संसाधनों का विकेंद्रीकरण: ये ब्लॉक्स 50, 75 और 100 बेड की क्षमता वाले विशेष क्रिटिकल केयर विंग हैं, जिन्हें जिला अस्पतालों और सरकारी मेडिकल कॉलेजों में जोड़ा जा रहा है।
• ऑक्सीजन और वेंटिलेटर से लैस आत्मनिर्भरता: प्रत्येक ब्लॉक अपनी ऑक्सीजन जनरेशन यूनिट, वेंटिलेटर, हाई-फ्लो नेज़ल कैनुला (HFNC) और आइसोलेशन वार्ड से पूरी तरह लैस होगा।
• सस्ती और कैशलेस तृतीयक देखभाल: PM-ABHIM के तहत बुनियादी ढांचे के इस अपग्रेडेशन को आयुष्मान भारत (PM-JAY) बीमा योजना से जोड़ा जा रहा है, जिससे गरीब और मध्यम वर्ग को संकट के समय कैशलेस और विश्वस्तरीय गहन चिकित्सा उपचार मिल सके।
लैब नेटवर्क का विस्तार: संक्रमण की तुरंत पहचान
कोरोना महामारी के शुरुआती दिनों में भारत में मात्र एक मुख्य लैब (NIV पुणे) थी जो आरटी-पीसीआर (RT-PCR) टेस्ट कर सकती थी, जिससे शुरुआती दौर में जांच की रफ्तार बेहद धीमी रही। लेकिन आज परिदृश्य पूरी तरह बदल चुका है।
• 730 एकीकृत जिला जन स्वास्थ्य प्रयोगशालाएं (IPHL): सरकार देश के हर जिले में एक ‘इंटीग्रेटेड पब्लिक हेल्थ लैब’ का निर्माण कर रही है। इसके अलावा ब्लॉक स्तर पर 3,382 ब्लॉक पब्लिक हेल्थ यूनिट्स (BPHUs) की स्थापना की जा रही है, जो ग्रामीण स्तर पर ही संदिग्ध बीमारियों की पहचान कर लेंगी।
• हाई कंटेनमेंट लैब्स (BSL-3 Network): खतरनाक और हवा से फैलने वाले वायरस की सटीक जेनेटिक सीक्वेंसिंग और जांच के लिए देश भर में हाई-कंटेनमेंट बायोसेफ्टी लेवल-3 (BSL-3) प्रयोगशालाओं का एक विशाल नेटवर्क तैयार किया जा रहा है। इसके साथ ही इन-विट्रो डायग्नोस्टिक (IVD) किट की नियामकीय जांच के लिए आधुनिक प्रयोगशालाएं स्वतंत्र रूप से काम कर रही हैं।
• तेज निगरानी तकनीक: अब भारत में रैपिड एंटीजन से लेकर एडवांस्ड मॉलिक्यूलर डायग्नोस्टिक्स जैसी स्वदेशी किट का निर्माण बड़े पैमाने पर हो रहा है, जिससे किसी भी वायरस के प्रसार को कम्युनिटी ट्रांसमिशन बनने से पहले ही रोका जा सके।
3. भविष्य की महामारियों के लिए भारत की रणनीति की समीक्षा
भविष्य की महामारियों के लिए भारत की रणनीति की समीक्षा
भविष्य की महामारियों से निपटने के लिए भारत ने अपनी स्वास्थ्य रणनीति में संरचनात्मक बदलाव किए हैं। वर्ष 2020 में कोविड-19 महामारी के शुरुआती दौर में देश का इंफ्रास्ट्रक्चर बेहद सीमित था। उस समय क्रिटिकल केयर बेड और आईसीयू की सुविधाएं केवल बड़े मेट्रो शहरों और मेडिकल कॉलेजों तक ही सीमित थीं, जिससे जिला स्तर पर वेंटिलेटर और लाइफ-सपोर्ट सिस्टम की भारी किल्लत देखी गई थी। इस कमी को दूर करने के लिए सरकार ने PM-ABHIM योजना के तहत देशव्यापी नेटवर्क तैयार किया है, जिसके अंतर्गत 602 से अधिक जिलों में 50 से 100 बेड वाले विशेष ‘क्रिटिकल केयर ब्लॉक’ (CCBs) स्थापित किए जा रहे हैं। यह कदम ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में भी आपातकालीन स्थिति में ऑक्सीजन और आईसीयू बेड की 24×7 उपलब्धता सुनिश्चित करता है।
BSL-3 (बायोसेफ्टी लेवल-3) नेटवर्क सक्रिय
जांच एवं लैब क्षमता के मामले में भी भारत ने एक लंबा सफर तय किया है। साल 2020 में महामारी की शुरुआत के दौरान पूरे देश में केवल एक मुख्य प्रयोगशाला (NIV पुणे) ही वायरस की जांच करने में पूरी तरह सक्षम थी, जिसके कारण देश को लंबे समय तक रैपिड एंटीजन और विदेशों से आयातित टेस्ट किट पर निर्भर रहना पड़ा था। वर्तमान और भविष्य की तैयारियों को देखते हुए सरकार अब देश के 730 जिलों में एकीकृत जन स्वास्थ्य प्रयोगशालाएं (IPHL) स्थापित कर रही है। इसके साथ ही नए और खतरनाक वायरस के म्यूटेशन व जेनेटिक सीक्वेंसिंग की पहचान के लिए देशव्यापी BSL-3 (बायोसेफ्टी लेवल-3) नेटवर्क को सक्रिय किया गया है ताकि संक्रमण की पहचान जिला स्तर पर ही तुरंत की जा सके।
Digital Surveillance प्रणाली
वायरस के प्रसार को रोकने के लिए रोग निगरानी प्रणाली (Surveillance) को भी डिजिटल रूप से अपग्रेड किया गया है। कोविड-19 के शुरुआती दौर में राज्यों और केंद्र के बीच डेटा ट्रांसफर काफी हद तक मैनुअल और अलग-अलग टुकड़ों में होता था, जिसके कारण संक्रमण के हॉटस्पॉट की पहचान करने और नीतिगत निर्णय लेने में देरी होती थी। अब इस कमी को दूर करते हुए सरकार ने IT-इनेबल्ड रियल-टाइम डिजीज सर्विलांस नेटवर्क (एकीकृत स्वास्थ्य सूचना मंच) को लागू किया है। यह आधुनिक डिजिटल ट्रैकिंग सिस्टम किसी भी संदिग्ध बीमारी के फैलते ही कम्युनिटी ट्रांसमिशन की तुरंत पहचान करने और वास्तविक समय (Real-Time) में डेटा साझा करने में सक्षम है।
स्वदेशी वैक्सीन और लॉजिस्टिक्स
चिकित्सीय सुरक्षा के सबसे बड़े स्तंभ यानी वैक्सीन और लॉजिस्टिक्स के मोर्चे पर भारत अब पूरी तरह आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ चुका है। 2020 में देश वैक्सीन रिसर्च, पीपीई किट और दवाओं के लिए काफी हद तक विदेशी कच्चे माल और टीकों के शुरुआती आयात पर निर्भर था, साथ ही दूरदराज के इलाकों तक कोल्ड-चेन स्टोरेज की पहुंच भी एक चुनौती थी। आज भारत के पास Covaxin और Covishield जैसी स्वदेशी वैक्सीनों के निर्माण का एक मजबूत डोमेस्टिक हब तैयार है, जिसे ‘मिशन सुरक्षा’ और 100-दिन के आपातकालीन रिस्पॉन्स फ्रेमवर्क से मजबूती दी गई है। इसके साथ ही आपातकालीन दवाओं और ऑक्सीजन आपूर्ति की घरेलू सप्लाई चेन को भी अचूक बनाया गया है।
पर्याप्त वर्कफोर्स
अंततः, किसी भी स्वास्थ्य प्रणाली की रीढ़ उसके मानव संसाधन (Workforce) होते हैं। कोविड-19 संकट के दौरान देश में क्रिटिकल केयर डॉक्टरों, पल्मोनोलॉजिस्ट और विशेष तौर पर ट्रेंड पैरामेडिकल स्टाफ की भारी कमी महसूस की गई थी, और लैब तकनीशियनों के पास नई महामारियों से निपटने की विशेष ट्रेनिंग नहीं थी। भविष्य की इस चुनौती से पार पाने के लिए PM-ABHIM के तहत डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ को विशेष क्रिटिकल केयर और लाइफ-सपोर्ट ट्रेनिंग दी जा रही है। साथ ही, ब्लॉक और जिला स्तर पर इन आधुनिक चिकित्सा ब्लॉकों और लैब्स को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए विशेषज्ञों की नियमित तैनाती हेतु एक नया और मजबूत भर्ती फ्रेमवर्क तैयार किया गया है।
चुनौतियां और जमीन पर क्रियान्वयन (Ground Reality)
कागजों पर मजबूत दिखने वाली इस स्वास्थ्य प्रणाली को जमीन पर उतारने में भारत को कुछ व्यावहारिक चुनौतियों का सामना भी करना पड़ रहा है:
• जमीन आवंटन और लॉजिस्टिक्स में देरी: राज्यों द्वारा क्रिटिकल केयर ब्लॉक्स के लिए समय पर जमीन न मिल पाना और प्रशासनिक बाधाएं एक प्रमुख चुनौती रही हैं, जिसे दूर करने के लिए स्वास्थ्य मंत्रालय लगातार समीक्षा बैठकें कर रहा है।
• मानव संसाधन (डॉक्टर और पैरामेडिकल स्टाफ) की कमी: केवल बुनियादी ढांचा खड़ा कर देना काफी नहीं है; इन 602 ब्लॉक्स और लैब्स को चलाने के लिए क्रिटिकल केयर विशेषज्ञों, पल्मोनोलॉजिस्ट और लैब तकनीशियनों की भारी आवश्यकता है। वर्तमान में PM-ABHIM के तहत अनुबंध के आधार पर स्टाफ को वित्तीय सहायता दी जा रही है, लेकिन इसे दीर्घकालिक रूप से स्थायी बनाना एक बड़ी चुनौती है।
क्या भारत अगली महामारी के लिए तैयार है?
वैज्ञानिकों और वैश्विक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि कोरोना कोई आखिरी महामारी नहीं थी। ‘वन हेल्थ’ अप्रोच (जिसके तहत इंसानों और पशुओं के बीच फैलने वाले संक्रामक रोगों की संयुक्त निगरानी की जाती है) को अपनाकर भारत अब पहले से कहीं अधिक सतर्क है। निष्कर्षतः, 602 क्रिटिकल केयर ब्लॉक्स और मजबूत जिला प्रयोगशालाओं के जरिए भारत ने अपने स्वास्थ्य ढांचे का विकेंद्रीकरण कर दिया है। इसका मतलब यह है कि अगर भविष्य में कोई महामारी आती है, तो गांवों और छोटे कस्बों के मरीजों को बड़े मेट्रो शहरों की तरफ नहीं भागना पड़ेगा। भारत का नया चिकित्सा तंत्र अब ‘डिटेक्ट, आइसोलेट एंड ट्रीट’ (पहचानो, अलग करो और इलाज करो) के सिद्धांत पर किसी भी अदृश्य दुश्मन से लोहा लेने के लिए तैयार खड़ा है।
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