मेक इन इंडिया का जलवा: आर्मेनिया में होने जा रही भारतीय हथियारों की स्थानीय उत्पादन की शुरुआत

The CSR Journal Magazine
भारत और आर्मेनिया के बीच रक्षा सहयोग ने एक नई दिशा ली है। आर्मेनिया अब भारत की मदद से अपने देश में गाइडेड पिनाका रॉकेट और 155 मिमी आर्टिलरी गोलों का स्थानीय उत्पादन करने की योजना बना रहा है। यह दोहराता है कि ‘मेक इन इंडिया’ का प्रभाव अब वैश्विक स्तर पर बढ़ रहा है। हाल ही में, दोनों देशों के बीच इस महत्त्वपूर्ण परियोजना पर बातचीत का सिलसिला आरंभ हुआ है। इस साझेदारी से आर्मेनिया को अपने रक्षा तंत्र को मजबूत करने का एक सुनहरा अवसर मिलेगा।

आर्मेनिया का नया कदम: क्यों है यह महत्वपूर्ण?

आर्मेनिया, जो पड़ोसी देश अजरबैजान के साथ तनावपूर्ण स्थिति में है, अपनी रक्षा तैयारियों को और मज़बूत करना चाहता है। आर्मेनिया की यह योजना दो मुख्य उद्देश्यों पर आधारित है। एक, युद्ध या संकट के समय में गोला-बारूद की सप्लाई में किसी भी प्रकार की रुकावट न आए। दूसरा, वह अपने पुराने सहयोगियों जैसे रूस पर निर्भरता को कम करके भारत जैसे विश्वसनीय साझेदारों के साथ संबंधों को और मजबूती प्रदान करना चाहता है।

समझौते की तैयारी: बातचीत का दौर

इस महत्वाकांक्षी परियोजना के लिए भारतीय रक्षा कंपनियों और आर्मेनियाई अधिकारियों के बीच चर्चा के दौर चल रहे हैं। इसमें मैन्युफैक्चरिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, निवेश मॉडल और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर गंभीर बातें हो रही हैं। यदि बातचीत सफल रही, तो इस वर्ष के अंत तक दोनों देशों के बीच पहले प्रारंभिक एमओयू पर हस्ताक्षर हो सकते हैं।

अगले कदम: उत्पादन इकाई की योजना

इसके आगे, साल 2027 में उत्पादन इकाई के लिए भूमि चयन, मशीनरी की स्थापना और ट्रायल असेंबली का कार्य शुरू होने की उम्मीद है। यदि सब कुछ योजना के अनुसार चलता रहा, तो अगले 2 से 3 वर्षों में गाइडेड पिनाका रॉकेट और 155 मिमी गोलों का पूर्ण स्तर पर व्यावसायिक उत्पादन आर्मेनिया में शुरू हो जाएगा।

परियोजना की सफलता की शर्तें

हालांकि, यह महत्वाकांक्षी परियोजना कुछ शर्तों पर निर्भर करेगी। पहली शर्त यह है कि भारत इस घातक गाइडेड मिसाइल तकनीक को कितना ट्रांसफर करने के लिए तैयार है। दूसरी, आर्मेनिया सरकार का इस बुनियादी ढांचे के लिए निवेश राशि तय करना। तीसरी, काकेशस क्षेत्र की भू-राजनीतिक स्थिति का विकास कैसे होता है। यदि बातचीत एक स्थायी समझौते का रूप लेती है, तो यह भारतीय रक्षा निर्यात के इतिहास में एक बड़ा मील का पत्थर साबित होगा।

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