अधिकारियों की रील, पोस्ट और सोशल मीडिया गतिविधियों पर केंद्र की नजर, जल्द आ सकती है ‘Social Media Code’
केंद्र सरकार अपने अधिकारियों और नौकरशाहों के सोशल मीडिया इस्तेमाल को लेकर एक अलग ‘सोशल मीडिया आचार संहिता’ (Social Media Code of Conduct) लाने की तैयारी कर सकती है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सरकारी अधिकारियों की बढ़ती सक्रियता, निजी रील-वीडियो, स्टोरी और सार्वजनिक रूप से व्यक्तिगत राय साझा करने के मामलों के बीच सरकार अब यह तय करने पर विचार कर रही है कि अधिकारियों को सोशल मीडिया पर क्या करना चाहिए और किन गतिविधियों से बचना चाहिए। यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि मौजूदा सरकारी सेवा-आचरण नियम ऐसे दौर में बनाए गए थे जब फेसबुक, इंस्टाग्राम, एक्स, यूट्यूब और शॉर्ट-वीडियो प्लेटफॉर्म जैसी डिजिटल सेवाएं सरकारी कामकाज का हिस्सा नहीं थीं। अधिकारियों के लिए सोशल मीडिया पर व्यक्तिगत और आधिकारिक भूमिका के बीच अंतर स्पष्ट करने की जरूरत लगातार बढ़ रही है।
पीएम मोदी ने वरिष्ठ अधिकारियों से की चर्चा
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल में वरिष्ठ सचिवों और शीर्ष नौकरशाहों के साथ बातचीत के दौरान अधिकारियों के सोशल मीडिया इस्तेमाल के लिए अलग आचार संहिता तैयार करने की संभावना तलाशने को कहा है। इसके बाद कैबिनेट सचिव टी.वी. सोमनाथन की ओर से इस बैठक से जुड़े एक्शन प्वाइंट्स अधिकारियों के साथ साझा किए गए हैं। इस प्रस्ताव का मुख्य उद्देश्य अधिकारियों की सोशल मीडिया गतिविधियों को पूरी तरह रोकना नहीं, बल्कि सरकारी सेवा की गरिमा, निष्पक्षता, गोपनीयता और पेशेवर आचरण को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी सुनिश्चित करना माना जा रहा है।
रील और वीडियो सबसे बड़ी चिंता क्यों?
पिछले कुछ वर्षों में पुलिस अधिकारियों, जिला प्रशासन के अधिकारियों और अन्य सरकारी कर्मचारियों के सोशल मीडिया पर सक्रिय होने का चलन तेजी से बढ़ा है। कई अधिकारी अपने काम से जुड़े वीडियो, जन-जागरूकता सामग्री और सरकारी योजनाओं की जानकारी साझा करते हैं। यह पहलू सकारात्मक भी है, क्योंकि इससे प्रशासन और आम जनता के बीच संवाद आसान होता है। लेकिन दूसरी ओर, कुछ अधिकारी निजी रील, मनोरंजन वीडियो, डांस वीडियो, व्यक्तिगत विचार और सोशल मीडिया ट्रेंड में भी दिखाई देते हैं। कुछ मामलों में ड्यूटी के दौरान बनाए गए वीडियो या सरकारी पद की पहचान के साथ की गई पोस्ट को लेकर सवाल उठते रहे हैं। यही वह क्षेत्र है जहां सरकार स्पष्ट दिशानिर्देश चाहती है।
क्या अधिकारियों को सोशल मीडिया चलाने पर रोक लगेगी?
फिलहाल ऐसा कहना सही नहीं होगा कि सरकार अधिकारियों को सोशल मीडिया इस्तेमाल करने से रोकने जा रही है। अभी प्रस्तावित आचार संहिता का अंतिम स्वरूप सार्वजनिक नहीं हुआ है। सरकार की चिंता मुख्य रूप से यह है कि किसी अधिकारी की निजी सोशल मीडिया गतिविधि को उसके सरकारी पद से जोड़कर न देखा जाए और ऐसी पोस्ट से सरकारी संस्था की निष्पक्षता, विश्वसनीयता या गरिमा प्रभावित न हो। संभावित नियमों में यह स्पष्ट किया जा सकता है कि अधिकारी:
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सरकारी पद का इस्तेमाल निजी प्रचार के लिए न करें।
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सरकारी कामकाज से जुड़ी गोपनीय या संवेदनशील जानकारी सोशल मीडिया पर साझा न करें।
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बिना अनुमति सरकारी दस्तावेज, बैठक या संवेदनशील स्थानों की तस्वीरें/वीडियो पोस्ट न करें।
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आधिकारिक मामलों पर व्यक्तिगत टिप्पणी करते समय सेवा नियमों का ध्यान रखें।
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ड्यूटी के दौरान अनावश्यक निजी रील या मनोरंजन सामग्री बनाने से बचें।
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ऐसी पोस्ट से बचें जिससे किसी व्यक्ति, समुदाय या संस्था के प्रति पक्षपात का संदेश जाए।
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अपुष्ट या भ्रामक जानकारी को आगे न बढ़ाएं।
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सरकारी संसाधनों और कार्यालय समय का निजी सोशल मीडिया गतिविधियों के लिए अनुचित इस्तेमाल न करें।
हालांकि ये संभावित बिंदु हैं, इन्हें अभी केंद्र सरकार के अंतिम नियम के रूप में नहीं माना जाना चाहिए।
सरकारी सेवा नियम पहले से मौजूद, लेकिन सोशल मीडिया के लिए स्पष्ट प्रावधान नहीं
यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि यह कहना पूरी तरह सही नहीं होगा कि सरकारी कर्मचारियों के सोशल मीडिया व्यवहार पर आज कोई नियम ही नहीं हैं। सरकारी कर्मचारी पहले से ही लागू सेवा-आचरण नियमों के दायरे में आते हैं। समस्या यह है कि इन नियमों में आधुनिक सोशल मीडिया की रील, लाइव वीडियो, वायरल पोस्ट, इन्फ्लुएंसर गतिविधियों और डिजिटल ब्रांडिंग जैसी परिस्थितियों के लिए हमेशा स्पष्ट और विस्तृत प्रावधान नहीं मिलते। इसी अंतर को देखते हुए अलग सोशल मीडिया कोड की जरूरत महसूस की जा रही है। रिपोर्ट के अनुसार, वरिष्ठ अधिकारियों और पूर्व अधिकारियों ने भी इस बात पर जोर दिया है कि मौजूदा आचरण नियम सोशल मीडिया के मौजूदा दौर से पहले बनाए गए थे और उनमें सोशल मीडिया को लेकर विशिष्ट प्रावधान नहीं हैं।
पुलिस अधिकारियों और कंटेंट क्रिएटर अफसरों पर भी असर
इस प्रस्ताव का सबसे ज्यादा असर उन सरकारी अधिकारियों पर पड़ सकता है जो सोशल मीडिया पर काफी लोकप्रिय हैं। कई पुलिस अधिकारी अपराध से बचाव, ट्रैफिक नियम, साइबर फ्रॉड, महिला सुरक्षा और जन-जागरूकता से जुड़े वीडियो बनाते हैं। ऐसे कंटेंट और व्यक्तिगत मनोरंजन सामग्री के बीच अंतर करना महत्वपूर्ण होगा।मसलन, यदि कोई अधिकारी अपने आधिकारिक दायित्व के तहत साइबर अपराध से बचने की जानकारी वाला वीडियो बनाता है, तो वह जनहित में उपयोगी हो सकता है। लेकिन यदि वही अधिकारी सरकारी पद, वर्दी या कार्यालय का इस्तेमाल किसी निजी ब्रांड, उत्पाद या व्यक्तिगत लोकप्रियता बढ़ाने के लिए करता है, तो वहां हितों के टकराव (Conflict of Interest) का सवाल उठ सकता है।
गोपनीयता और राष्ट्रीय सुरक्षा भी बड़ा मुद्दा
सरकारी अधिकारियों के पास कई बार ऐसी सूचनाओं तक पहुंच होती है जो सार्वजनिक नहीं होतीं। किसी बैठक की तस्वीर, दस्तावेज का स्क्रीनशॉट, किसी अभियान की जानकारी या किसी संवेदनशील स्थान की वीडियो रिकॉर्डिंग अनजाने में भी सोशल मीडिया पर आ सकती है। इसलिए प्रस्तावित कोड में गोपनीय सरकारी जानकारी और संवेदनशील डेटा की सुरक्षा एक महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकती है। सरकारी कर्मचारियों के सोशल मीडिया इस्तेमाल को लेकर पहले भी विभिन्न संस्थानों द्वारा दिशानिर्देश जारी किए गए हैं। उदाहरण के लिए, जम्मू-कश्मीर प्रशासन की ओर से उपलब्ध सरकारी दिशानिर्देशों में कर्मचारियों को सोशल मीडिया पर भी लागू सेवा-आचरण मानकों का पालन करने की बात कही गई है। इसके अलावा, पुलिस अनुसंधान एवं विकास ब्यूरो (BPR&D) द्वारा प्रकाशित दिशानिर्देशों में सरकारी कर्मचारियों के सोशल मीडिया इस्तेमाल से जुड़े हितों के टकराव, गोपनीयता एवं सुरक्षा, गलत सूचना, सरकारी छवि और पेशेवर आचरणजैसे पहलुओं को महत्वपूर्ण बताया गया है।
सरकार की सोशल मीडिया नीति सिर्फ अधिकारियों तक सीमित नहीं
केंद्र सरकार सोशल मीडिया के व्यापक नियमन को लेकर पहले से ही कई कदम उठा चुकी है। सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के तहत Information Technology (Intermediary Guidelines and Digital Media Ethics Code) Rules, 2021 लागू हैं, जिनमें सोशल मीडिया मध्यस्थों और डिजिटल प्लेटफॉर्म के लिए कई दायित्व निर्धारित किए गए हैं। इन नियमों में 2026 में भी संशोधन/अपडेट हुए हैं। हालांकि ये नियम मुख्य रूप से डिजिटल प्लेटफॉर्म और इंटरमीडियरी से संबंधित हैं। प्रस्तावित अधिकारियों का Social Media Code इससे अलग होगा और इसका फोकस सरकारी कर्मचारियों के व्यक्तिगत एवं आधिकारिक सोशल मीडिया आचरण पर हो सकता है।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम सरकारी सेवा की जिम्मेदारी
इस प्रस्ताव के सामने सबसे महत्वपूर्ण सवाल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का भी होगा। सरकारी अधिकारी भी नागरिक हैं और उन्हें संविधान के तहत अधिकार प्राप्त हैं। लेकिन सरकारी सेवा में आने के बाद उन पर कुछ अतिरिक्त आचरण संबंधी जिम्मेदारियां भी लागू होती हैं। खासकर वरिष्ठ प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों के सार्वजनिक बयान को सामान्य नागरिक की निजी टिप्पणी की तरह नहीं देखा जाता। इसी कारण प्रस्तावित Social Media Code के सामने चुनौती यह होगी कि वह अधिकारियों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सरकारी सेवा की निष्पक्षता के बीच संतुलन बनाए। सरकार ने स्वयं फरवरी 2026 में डिजिटल प्लेटफॉर्म पर फर्जी, गलत और भ्रामक सामग्री के बढ़ते जोखिम को लेकर चिंता जताई थी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संवैधानिक संरक्षण का भी उल्लेख किया था।
क्या पोस्ट करने से पहले अनुमति लेनी होगी?
यह सवाल सबसे ज्यादा चर्चा में है, लेकिन फिलहाल इसका कोई आधिकारिक अंतिम जवाब सामने नहीं आया है। अभी उपलब्ध रिपोर्टों में ऐसी कोई अंतिम व्यवस्था सार्वजनिक नहीं हुई है कि प्रत्येक अधिकारी को अपनी हर निजी पोस्ट के लिए सरकार से अनुमति लेनी होगी। इसलिए इस तरह की बात को तथ्य के रूप में प्रकाशित करना जल्दबाजी होगी। संभावना यह है कि यदि नया कोड आता है तो वह कुछ गतिविधियों पर स्पष्ट प्रतिबंध, कुछ पर सावधानी और कुछ पर सामान्य आचरण संबंधी दिशा-निर्देश तय करे।
सरकार के लिए चुनौती: लोकप्रियता नहीं, पद की गरिमा
सोशल मीडिया ने अधिकारियों को सीधे जनता तक पहुंचने का नया माध्यम दिया है। पहले किसी जिले के प्रशासनिक अधिकारी या पुलिस अधिकारी की गतिविधियों की जानकारी मुख्यतः प्रेस विज्ञप्ति और पारंपरिक मीडिया के जरिए सामने आती थी। अब अधिकारी खुद वीडियो बनाकर जनता से संवाद कर सकते हैं। इसका फायदा भी है—सरकारी योजनाओं की जानकारी तेजी से पहुंचती है, साइबर अपराध और यातायात जैसे विषयों पर जागरूकता बढ़ती है और नागरिकों की शिकायतों पर तत्काल प्रतिक्रिया दी जा सकती है। लेकिन जब अधिकारी कंटेंट क्रिएटर और सरकारी पदाधिकारी, दोनों भूमिकाएं निभाते हैं, तब सीमाएं स्पष्ट होना जरूरी हो जाता है। इसी वजह से प्रस्तावित Social Media Code को केवल ‘सोशल मीडिया पर लगाम’ के रूप में देखने के बजाय डिजिटल युग में सरकारी सेवा के आचरण नियमों को स्पष्ट करने की कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है।
अभी क्या स्थिति है?
फिलहाल उपलब्ध जानकारी के आधार पर केंद्र सरकार ने अधिकारियों के लिए अंतिम Social Media Code of Conduct जारी नहीं किया है। अभी मामला इस दिशा में विचार और प्रक्रिया शुरू होने का है। प्रधानमंत्री द्वारा वरिष्ठ अधिकारियों को इसकी संभावना तलाशने को कहे जाने और उसके बाद शीर्ष स्तर पर एक्शन प्वाइंट्स सामने आने की खबर है। इसलिए यह कहना अधिक सटीक होगा कि केंद्र जल्द ही अधिकारियों के लिए सोशल मीडिया आचार संहिता ला सकता है, न कि यह कि नियम लागू हो चुके हैं। आने वाले समय में यदि DoPT, Cabinet Secretariat या संबंधित मंत्रालय की ओर से औपचारिक आदेश/दिशानिर्देश जारी होते हैं, तभी यह स्पष्ट होगा कि नियम किन अधिकारियों पर लागू होंगे, निजी अकाउंट के लिए क्या प्रावधान होंगे, ड्यूटी के दौरान वीडियो बनाने पर क्या व्यवस्था होगी और उल्लंघन पर क्या कार्रवाई की जाएगी।
फिलहाल सबसे बड़ा संदेश यही है—सरकारी अधिकारी सोशल मीडिया पर रहें, लेकिन सरकारी पद की गरिमा, गोपनीयता, निष्पक्षता और सेवा-आचरण की सीमाओं के भीतर।
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