महाराष्ट्र में सड़कों पर पटाखों पर रोक, लाउडस्पीकर और DJ पर भी कड़ी निगरानी; बॉम्बे हाईकोर्ट सख्त

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सड़क पर पटाखे फोड़े तो कार्रवाई, लाउडस्पीकर पर भी कड़ी निगरानी; बॉम्बे हाईकोर्ट का महाराष्ट्र के लिए बड़ा आदेश

महाराष्ट्र में गणेशोत्सव और अन्य त्योहारों के दौरान बढ़ते ध्वनि और वायु प्रदूषण को लेकर बॉम्बे हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। न्यायमूर्ति गिरिश एस. कुलकर्णी और न्यायमूर्ति नीला के. गोखले की खंडपीठ ने 22 सितंबर 2026 को स्वतः संज्ञान से शुरू की गई जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए त्योहारों के दौरान सार्वजनिक सड़कों और रास्तों पर पटाखे फोड़ने पर पूर्ण रोक लगाने का आदेश दिया। अदालत ने अधिकारियों को ध्वनि प्रदूषण के स्तर की मौके पर जांच और रिकॉर्डिंग करने तथा नियमों का उल्लंघन होने पर कड़ी कार्रवाई करने के निर्देश भी दिए हैं। अदालत का हस्तक्षेप ऐसे समय हुआ है जब गणेशोत्सव के दौरान मुंबई समेत महाराष्ट्र के कई शहरों में बड़ी संख्या में जुलूस, मंडल और सार्वजनिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि धार्मिक और सांस्कृतिक उत्सव जारी रह सकते हैं, लेकिन उनकी आड़ में आम नागरिकों के स्वास्थ्य, शांति और सुरक्षा को प्रभावित करने वाली गतिविधियों को खुली छूट नहीं दी जा सकती। अदालत ने कहा कि त्योहारों के कारण ध्वनि प्रदूषण के नियमों को निष्प्रभावी या पूरी तरह शिथिल नहीं माना जा सकता।

सार्वजनिक सड़कों पर पटाखों पर पूर्ण रोक

हाईकोर्ट ने सार्वजनिक सड़कों और रास्तों पर त्योहारों के दौरान पटाखे फोड़ने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया है। अदालत ने विशेष रूप से ऐसे पटाखों से होने वाले धुएं, जहरीले प्रदूषण और शोर को लेकर चिंता जताई। सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी कहा कि सार्वजनिक सड़कें पैदल यात्रियों और वाहनों के आवागमन के लिए होती हैं और वहां पटाखे फोड़ने से प्रदूषण के साथ दुर्घटना का खतरा भी पैदा होता है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि निजी स्थानों पर पटाखों के इस्तेमाल का अर्थ यह नहीं है कि वहां ध्वनि प्रदूषण के नियम लागू नहीं होंगे। यानी सार्वजनिक स्थानों पर रोक के अलावा जहां पटाखों का इस्तेमाल अन्य स्थानों पर किया जाता है, वहां भी लागू ध्वनि सीमा और पर्यावरणीय नियमों का पालन करना होगा।

लाउडस्पीकर और DJ पर भी कड़ी निगरानी

हाईकोर्ट की चिंता केवल पटाखों तक सीमित नहीं रही। अदालत ने त्योहारों और जुलूसों में इस्तेमाल होने वाले लाउडस्पीकर, एम्प्लीफायर, DJ और अन्य तेज आवाज वाले उपकरणों की निगरानी के लिए भी सख्त व्यवस्था के निर्देश दिए हैं। अदालत ने कहा कि पुलिस और संबंधित सरकारी अधिकारी मौके पर डेसिबल मीटर से ध्वनि स्तर की जांच करें। केवल शिकायत मिलने के बाद कार्रवाई करने के बजाय अधिकारियों को पहले से निगरानी और रोकथाम की व्यवस्था करनी होगी। नियमों का उल्लंघन मिलने पर संबंधित ध्वनि उपकरणों को जब्त करने और कानूनी कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं।

हर मंडप और जुलूस में दिखानी होगी अनुमति

हाईकोर्ट ने आयोजकों की जवाबदेही तय करने के लिए एक महत्वपूर्ण निर्देश दिया है। जिन मंडलों या जुलूसों को लाउडस्पीकर और ध्वनि व्यवस्था की अनुमति मिली है, उन्हें अनुमति सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करनी होगी। अनुमति के साथ जिम्मेदार आयोजकों के नाम, पता और मोबाइल नंबर भी प्रदर्शित करने का निर्देश दिया गया है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी नियम के उल्लंघन की स्थिति में जिम्मेदारी तय की जा सके।

आयोजकों को देना होगा सुरक्षा जमा

अदालत ने आयोजकों से सुरक्षा राशि जमा कराने की व्यवस्था पर भी जोर दिया है। आदेश के अनुसार समूहों या संगठनों के लिए कम से कम 1 लाख रुपये और व्यक्तिगत आयोजकों के लिए 50 हजार रुपये की जमा राशि की व्यवस्था का निर्देश दिया गया है। यदि ध्वनि प्रदूषण संबंधी नियमों का उल्लंघन होता है तो यह राशि जब्त की जा सकती है। इस व्यवस्था का उद्देश्य केवल उल्लंघन के बाद जुर्माना लगाना नहीं, बल्कि आयोजकों को शुरुआत से ही नियमों का पालन करने के लिए जवाबदेह बनाना है।

जुलूस शुरू होने से पहले ही होगी जांच

हाईकोर्ट ने कहा है कि पुलिस और अन्य संबंधित अधिकारी जुलूस शुरू होने के समय ही आयोजकों को उनके कानूनी दायित्वों के बारे में स्पष्ट रूप से जानकारी दें। अधिकारियों को शुरुआत से ही यह सुनिश्चित करना होगा कि जुलूस में शामिल लोग निर्धारित ध्वनि सीमा का पालन करें। अदालत ने यह भी कहा कि कार्रवाई केवल तब नहीं होनी चाहिए जब अत्यधिक शोर हो चुका हो और लोगों को परेशानी हो चुकी हो। रोकथाम को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। अदालत के अनुसार, उल्लंघन के बाद मामूली जुर्माना लगाना उस नुकसान की भरपाई नहीं कर सकता जो पहले ही हजारों लोगों को हो चुका हो।

हर जगह डेसिबल मीटर और साउंड लिमिटर

आदेश में त्योहारों के दौरान ध्वनि नियंत्रण के लिए तकनीकी निगरानी पर भी जोर दिया गया है। आयोजकों को संबंधित स्थानों और जुलूसों में डेसिबल मीटर लगाने तथा ध्वनि प्रणाली में आंतरिक साउंड लिमिटर लगाने की व्यवस्था करनी होगी। मीटर इस तरह लगाए जाने हैं कि उनकी रीडिंग सार्वजनिक रूप से देखी जा सके। संबंधित सरकारी अधिकारी ध्वनि स्तर को मापकर उसका रिकॉर्ड तैयार करेंगे। रिकॉर्ड में मौके पर दिखाई देने वाली मीटर रीडिंग को भी दर्ज किया जाएगा, ताकि बाद में यह पता लगाया जा सके कि कार्यक्रम के दौरान निर्धारित सीमा का पालन हुआ या नहीं।

एक ही इलाके में कई जुलूसों का सामूहिक असर भी देखा जाएगा

हाईकोर्ट ने केवल एक मंडल या एक जुलूस के शोर को अलग-अलग देखने के बजाय किसी इलाके में होने वाले कुल ध्वनि प्रभाव को ध्यान में रखने का निर्देश दिया है। यदि एक ही वार्ड में कई कार्यक्रमों या जुलूसों को अनुमति दी जा रही है तो अधिकारियों को उनके सामूहिक ध्वनि प्रभाव का आकलन करना होगा। इसका मतलब है कि किसी एक कार्यक्रम की ध्वनि सीमा कानूनी सीमा में होने के बावजूद यदि एक ही क्षेत्र में कई कार्यक्रमों के कारण कुल शोर अत्यधिक बढ़ रहा है, तो अनुमति देने वाली व्यवस्था को इस पहलू पर भी ध्यान देना होगा।

लेजर और तेज रोशनी पर भी रोक

अदालत ने त्योहारों के दौरान लेजर लाइट, अत्यधिक तीव्र प्रकाश और तेज बीम के इस्तेमाल पर भी रोक लगाने का निर्देश दिया है। इसका संबंध केवल दृश्य प्रभाव से नहीं, बल्कि जुलूसों में इन उपकरणों के इस्तेमाल से उत्पन्न होने वाली संभावित असुविधा और सार्वजनिक सुरक्षा से भी है। इसके अलावा जुलूसों में शोर पैदा करने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले धातु के सिलेंडर जैसे उपकरणों पर भी रोक की बात कही गई है। सुनवाई के दौरान ऐसे उपकरणों के जरिए अत्यधिक शोर किए जाने की शिकायतें अदालत के सामने रखी गई थीं।

100 डेसिबल से अधिक शोर की शिकायतें

सुनवाई के दौरान अदालत के सामने यह भी बताया गया कि पिछले कुछ दिनों में कुछ स्थानों पर ध्वनि का स्तर 100 डेसिबल से अधिक दर्ज किया गया। पुणे, ठाणे और नासिक से जुड़े याचिकाकर्ताओं की ओर से भी त्योहारों के दौरान अत्यधिक शोर की समस्या उठाई गई। अदालत ने इस स्थिति को गंभीरता से लेते हुए कहा कि त्योहार मनाने का अधिकार दूसरे नागरिकों के स्वास्थ्य और शांतिपूर्ण जीवन के अधिकार की कीमत पर नहीं हो सकता।

मुंबई में पहले से लागू हैं कुछ प्रतिबंध

राज्य सरकार की ओर से सुनवाई में बताया गया कि मुंबई में पुलिस आयुक्त के आदेश के तहत धार्मिक जुलूस, लाउडस्पीकर और अन्य ध्वनि उपकरणों के इस्तेमाल को लेकर पहले से प्रतिबंधात्मक प्रावधान लागू हैं। अधिकारियों के अनुसार, लाउडस्पीकर का इस्तेमाल निर्धारित ध्वनि सीमा के भीतर और आवश्यक अनुमति के साथ ही किया जा सकता है। सरकार ने यह भी कहा कि ध्वनि सीमा से अधिक शोर पैदा करने वाले किसी भी वाद्य यंत्र या उपकरण पर नियम लागू होते हैं। हालांकि हाईकोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि कागज पर मौजूद नियम तभी प्रभावी होंगे जब उनका मैदानी स्तर पर सक्रिय और समान रूप से पालन कराया जाए।

नागपुर और अन्य शहरों का भी उल्लेख

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने नागपुर और सोलापुर समेत कुछ स्थानों पर अधिकारियों द्वारा पहले से उठाए गए कदमों का उल्लेख किया। अदालत ने सवाल उठाया कि जब कुछ शहरों में DJ, लेजर और अन्य तेज आवाज वाली व्यवस्थाओं पर प्रतिबंधात्मक कदम उठाए जा सकते हैं तो महाराष्ट्र के अन्य बड़े शहरों में भी एक समान और प्रभावी व्यवस्था क्यों नहीं हो सकती। अदालत ने महाराष्ट्र में त्योहारों के दौरान ध्वनि और वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए एक समान और प्रभावी अमल व्यवस्था की आवश्यकता पर जोर दिया है।

अस्पताल और स्कूल जैसे संवेदनशील क्षेत्रों पर विशेष ध्यान

हाईकोर्ट ने अस्पतालों और स्कूलों के आसपास अत्यधिक शोर को लेकर भी चिंता जताई। अस्पतालों को ऐसे स्थान माना जाता है जहां मरीजों को आराम और शांत वातावरण की जरूरत होती है। अदालत ने सवाल उठाया कि यदि कोई जुलूस अस्पताल के पास से गुजरता है तो वहां तेज संगीत और लाउडस्पीकर क्यों जारी रहने चाहिए। इसलिए जुलूसों और सार्वजनिक कार्यक्रमों के आयोजकों से अपेक्षा की गई है कि वे अस्पताल, स्कूल और अन्य संवेदनशील क्षेत्रों से गुजरते समय विशेष सावधानी बरतें और निर्धारित ध्वनि सीमा का पालन करें।

उल्लंघन पर केवल जुर्माना नहीं, जब्ती और कानूनी कार्रवाई

अदालत ने संकेत दिया है कि नियम तोड़ने के बाद केवल मामूली जुर्माना भर देना पर्याप्त नहीं माना जाएगा। उल्लंघन करने वाले ध्वनि उपकरणों को जब्त किया जा सकता है और संबंधित लोगों के खिलाफ लागू कानूनों के तहत कार्रवाई की जा सकती है। आदेश में Noise Pollution Rules, Environment (Protection) Act, Explosives Act और Bharatiya Nyaya Sanhita समेत संबंधित कानूनों के तहत कार्रवाई की बात कही गई है। हाईकोर्ट का जोर इस बात पर है कि कार्रवाई ऐसी हो जिससे नियमों का उल्लंघन होने से पहले ही आयोजक सावधान रहें।

त्योहारों पर रोक नहीं, प्रदूषण और शोर पर नियंत्रण

हाईकोर्ट के आदेश का मूल उद्देश्य त्योहारों या धार्मिक आयोजनों को रोकना नहीं है। अदालत ने स्पष्ट रूप से इस बात पर जोर दिया कि उत्सव और धार्मिक आयोजन जारी रह सकते हैं, लेकिन उन्हें कानून और निर्धारित पर्यावरणीय एवं ध्वनि मानकों के दायरे में आयोजित करना होगा। अदालत ने नागरिकों से भी सामाजिक जिम्मेदारी निभाने की अपील की है। उसका संदेश यह है कि किसी व्यक्ति या समूह का उत्सव दूसरे नागरिकों के स्वास्थ्य, नींद, उपचार, पढ़ाई या सामान्य जीवन में गंभीर बाधा नहीं बनना चाहिए। इस आदेश से आने वाले त्योहारों में महाराष्ट्र के शहरों में जुलूसों, मंडलों, लाउडस्पीकर, DJ, पटाखों और तेज रोशनी के इस्तेमाल की निगरानी पहले की तुलना में अधिक सख्त होने की संभावना है। खास तौर पर सार्वजनिक सड़कों पर पटाखों पर रोक, डेसिबल मीटर से निगरानी, अनुमति का सार्वजनिक प्रदर्शन, साउंड लिमिटर, सुरक्षा जमा और उल्लंघन पर उपकरण जब्त करने जैसे प्रावधान आयोजकों की जिम्मेदारी बढ़ाते हैं।

ताकी खराब न हो त्योहारों की मस्ती

बॉम्बे हाईकोर्ट का यह आदेश महाराष्ट्र में त्योहारों के दौरान ध्वनि और वायु प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए एक व्यापक प्रशासनिक ढांचा तैयार करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। अब चुनौती इस व्यवस्था को कागजी आदेश तक सीमित न रखकर मुंबई, ठाणे, पुणे, नासिक, नागपुर और राज्य के अन्य शहरों में समान रूप से लागू करने की होगी। अदालत ने साफ संकेत दिया है कि उत्सव की अनुमति का अर्थ नियमों से छूट नहीं है और नागरिकों के स्वास्थ्य तथा शांतिपूर्ण जीवन के अधिकार की रक्षा प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी होगी।

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