ट्रंप की हार से भारत-अमेरिका रिश्तों पर क्या होगा असर?

The CSR Journal Magazine

भारत के लिए ट्रंप का कार्यकाल रहा निराशाजनक

नई दिल्ली: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का दूसरा कार्यकाल भारत के लिए पहले की तुलना में काफी निराशाजनक रहा है। कूटनीति से लेकर व्यापारिक मोर्चे तक, उन्होंने भारत को झटका देने का कोई मौका नहीं छोड़ा है। विशेषकर पहलगाम हमले और ऑपरेशन सिंदूर के बाद से, अमेरिका का रवैया भारत के प्रति काफी बदल गया है। ऐसे में अमेरिकी मध्यावधि चुनाव में ट्रंप की हार ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

क्या ट्रंप का रवैया बदलेगा?

रणनीतिक मामलों के एक्सपर्ट प्रोफेसर ब्रह्मा चेलानी का मानना है कि अमेरिकी चुनावों के परिणामों के बाद ट्रंप की घरेलू चुनौतियाँ बढ़ सकती हैं। लेकिन, उनकी विदेश नीति और व्यापार पर इसका खास असर नहीं पड़ेगा। चेलानी ने एक एक्स पोस्ट में कहा है कि ट्रंप का बेलगाम कार्यकाल लंबा खिंच सकता है।

डेमोक्रेट्स की सुनामी: ट्रंप की नीतियों पर सवाल

चेलानी के अनुसार, अमेरिकी मतदाताओं ने ट्रंप और उनकी नीतियों को नकार दिया है, जिससे डेमोक्रेटिक पार्टी की सुनामी आई है। इस स्थिति में सवाल उठता है कि क्या ट्रंप अपने कार्यशैली में बदलाव करेंगे या फिर अव्यवस्था को ही बनाए रखेंगे।

विदेश नीति पर असर नहीं

चेलानी का मानना है कि कांग्रेस पर डेमोक्रेट्स का कंट्रोल होने से सरकारी खर्चों को नियंत्रित करने की शक्ति मिलेगी। इसके साथ ही, कांग्रेस की समितियों में दबदबा हासिल होने के कारण ट्रंप और उनके परिवार से जुड़े घोटालों के खुलासे का मौका भी मिलेगा। ये समितियां समन जारी कर सकती हैं और आक्रामक सुनवाई के जरिए अपना प्रभाव दिखा सकती हैं।

संविधान का प्रावधान: राष्ट्रपति की शक्तियाँ

अमेरिकी संविधान में ‘सेपरेशन ऑफ पावर’ की व्यवस्था है, जिसके तहत संसद, सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रपति की शक्तियाँ अलग-अलग हैं। राष्ट्रपति संसद के प्रति उत्तरदायी नहीं है। यही वजह है कि सीनेट और हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव में हार के बावजूद ट्रंप की कार्यकारी शक्तियों पर कोई असर नहीं पड़ेगा। लेकिन, जिन कानूनों को उन्हें संसद से पारित कराना है, उनमें अड़ंगा लग सकता है।

भारत के साथ ट्रंप का बदलता रवैया

भारत और ट्रंप के संबंध पहले कार्यकाल में काफी मजबूत रहे। लेकिन, दूसरे कार्यकाल की शुरुआत से ही उनका रवैया भारत के प्रति बदलने लगा। ट्रंप ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत और पाकिस्तान के द्विपक्षीय मामलों में हस्तक्षेप करने की कोशिश की। इसके अलावा, उन्होंने पाकिस्तानी सेना प्रमुख असीम मुनीर को व्हाइट हाउस में बुलाकर भारत को चिढ़ाने का प्रयास किया।

टैरिफ का बोझ और रूस से तेल खरीद

ट्रंप ने भारत पर टैरिफ का बोझ डालकर दबाव बनाने की कोशिश की, जबकि उन्होंने रूस से तेल खरीदने का बहाना बनाया। इससे अमेरिका खुद अपनी जरूरत की चीजें मंगाता रहा है। चेलानी का कहना है कि अमेरिकी मध्यावधि चुनाव के परिणाम और ट्रंप के परिवार के व्यापारिक हित पाकिस्तान से जुड़े होने के कारण भारत के साथ मौजूदा रिश्तों में कोई खास बदलाव नहीं आएगा।

भारत की रणनीतिक स्थिति

भारत के लिए यह महत्वपूर्ण है कि वह अमेरिका के साथ अपने संबंधों को मजबूत बनाए रखे, चाहे ट्रंप का रवैया कैसा भी हो। भारत को अपनी कूटनीतिक रणनीतियों में बदलाव लाने की आवश्यकता है ताकि वह वैश्विक मंच पर अपनी स्थिति को और मजबूत कर सके।

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