संभल हिंसा केस में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, यूपी सरकार पर ₹10 लाख जुर्माना

The CSR Journal Magazine

धार्मिक हिंसा के आरोपी की गिरफ्तारी पर बड़ा फैसला

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने संभल हिंसा मामले में मुल्ला अफरोज की एहतियाती हिरासत को रद्द करते हुए यूपी सरकार पर 10 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है। 29 सितंबर 2026 को दिए गए इस फैसले ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस आदेश को पलट दिया, जिसमें अफरोज की प्रिवेंटिव डिटेंशन को सही ठहराया गया था। इस निर्णय में जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू ने सवाल उठाया कि क्या पुलिस कस्टडी में दिए गए कबूलनामे के आधार पर हिरासत घोषित की जा सकती है।

कबूलनामे का आधार और कानूनी प्रावधान

जस्टिस दत्ता और जस्टिस नागू की बेंच ने यह स्पष्ट किया कि उत्तर प्रदेश सरकार अफरोज द्वारा पुलिस कस्टडी में दिए गए कथित कबूलनामे के आधार पर हिरासत का आदेश नहीं दे सकती थी। यह फैसला विशेष रूप से अहम है क्योंकि इससे पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठता है। इसे लीक लॉ की रिपोर्टिंग के माध्यम से समर्पित किया गया।

विवादास्पद गिरफ्तारी की पृष्ठभूमि

संभल हिंसा का यह मामला तब शुरू हुआ जब शाही जामा मस्जिद के कोर्ट के आदेश पर सर्वे किया गया, जिसके कारण चार लोगों की जान चली गई। मुल्ला अफरोज को इस घटना के लगभग 54 दिन बाद अरेस्ट किया गया। उनकी गिरफ्तारी का आधार पुलिस कस्टडी में दिया गया उनका बयान था, जिसे उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।

पुलिस की भूमिका और न्यायालय की चिंता

अफरोज ने सुप्रीम कोर्ट में तर्क दिया कि हिंसा के दौरान पुलिस ने खुद गोली चलाई थी, लेकिन इस पहलू की निष्पक्ष जांच नहीं की गई थी। इससे यह पुष्टि होती है कि पुलिस की कार्रवाई में कई खामियां थीं। याचिकाकर्ता ने प्रोटेस्ट पिटीशन दायर करने की अनुमति भी मांगी।

हिरासत के लिए क्या जरूरी है?

अफरोज ने आगे कहा कि उनकी गिरफ्तारी पुलिस हिरासत में दिए गए इकबालिया बयान पर आधारित थी, जो कानूनन मान्य नहीं है। उन्होंने ये भी कहा कि कई आपराधिक मामलों के होने से हिरासत को सही नहीं ठहराया जा सकता। इसके लिए ईमानदारी से और पूरी जानकारी के साथ लिए गए फैसले की जरूरत है।

जज ने समर्पित किया फैसला

जस्टिस दत्ता ने इस निर्णय को अपने दिवंगत क्लर्क की याद में समर्पित किया। क्लर्क का निधन उनके 27वें जन्मदिन से पहले हुआ था। जज के इस समर्पण ने अदालती कार्यवाही में एक मानवीय पहलू जोड़ा।

न्याय के प्रति प्रतिबद्धता

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला न केवल मुल्ला अफरोज के लिए राहत है, बल्कि यह न्यायपालिका की प्रतिबद्धता को भी दर्शाता है कि कानून के दायरे में सभी को अपनी आवाज उठाने का अधिकार है। इस मामले ने पुलिस के कामकाज पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं, जो कि भविष्य में सुधार की आवश्यकता को इंगित करते हैं।

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