Supreme Court ने CBSE से मांगा जवाब, CJI बोले- क्या उत्तर भारतीयों का दक्षिणी भाषाएं सीखना जरूरी नहीं?

The CSR Journal Magazine
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को सीबीएसई की तीन-भाषा नीति से जुड़े कई प्रश्न उठाए। अदालत ने किताबों और शिक्षकों की उपलब्धता, छात्रों पर बोझ और विभिन्न स्कूलों में नीति के लागू होने के तरीकों को लेकर सफाई मांगी। CJI सूर्यकांत और अन्य जजों की बेंच ने NEP 2020 के तहत कक्षा 9 के छात्रों के लिए लागू की गई नीति पर सुनवाई की। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि इस नीति में छात्रों से दो भारतीय भाषाएं पढ़ने की अपेक्षा की गई है, लेकिन कई स्कूलों में आवश्यक किताबें और शिक्षकों की कमी है।

शिक्षण संसाधनों की कमी

कोर्ट को इस बात से अवगत कराया गया कि शैक्षणिक सत्र शुरू होने के चार महीने बाद भी आवश्यक किताबें कई स्कूलों में उपलब्ध नहीं हैं। इससे लाखों छात्रों पर नकारात्मक असर पड़ रहा है। याचिकाकर्ता आनंद ग्रोवर ने कहा कि बिना आवश्यक सामग्री के छात्रों से नई भाषा सीखने की उम्मीद कैसे की जा सकती है? हालांकि, अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को आश्वासन दिया कि शिक्षकों और आवश्यक सामग्री की उपलब्धता पर अधिकारी काम कर रहे हैं।

अंतरिम व्यवस्था पर सवाल

जस्टिस वी. मोहना ने स्पष्ट किया कि कोर्स अभी शुरू नहीं हुए हैं, इसलिए अधिकारियों से उम्मीद की जा रही है कि उनके पास सही योजना होगी। एएसजी भाटी ने कहा कि योजना में केवल आंतरिक मूल्यांकन होगा, जिसके तहत कक्षा 9 के छात्रों को फेल नहीं किया जाएगा। इससे छात्रों पर दबाव कम होगा। हालांकि, सवाल यह भी उठता है कि क्या छात्रों को पहले से पढ़ाई जा रही भाषाओं को छोड़ना पड़ेगा।

क्षेत्रीय भाषाओं की महत्ता

CJI ने यह भी पूछा कि क्या विद्यार्थियों को देश की दूसरी भाषाएं सीखने के लिए प्रोत्साहित नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, “क्या यह देश के लिए फायदेमंद नहीं होगा अगर उत्तर भारत के छात्र दक्षिण भारत की भाषाएं सीखें?” इस संदर्भ में, अदालत ने सभी भाषाओं के प्रति सम्मान की आवश्यकता पर जोर दिया।

शिक्षक और फैकल्टी की उपलब्धता

कोर्ट ने शिक्षकों की उपलब्धता पर सवाल उठाया, विशेषकर संस्कृत जैसी भाषाओं के लिए। जस्टिस बागची ने पूछा कि学校 में कितने संस्कृत शिक्षक बी.एड. की योग्यता रखते हैं। एएसजी भाटी ने आंकड़े पेश करते हुए बताया कि 99.19% स्कूल पहले से दो भारतीय भाषाएं पढ़ाते हैं, लेकिन कुछ स्कूल इस मानक को पूरा नहीं कर रहे हैं।

नीति में संवैधानिक सवाल

कोर्ट ने नीति में इस्तेमाल होने वाले शब्दों पर भी सवाल उठाया। जस्टिस बागची ने ‘नैटिव’ शब्द पर आपत्ति जताते हुए कहा कि इसे ‘इंडिजिनस’ कहा जाना चाहिए। उन्होंने संकेत दिया कि अंग्रेजी को स्वदेशी या गैर-स्वदेशी भाषा के रूप में किस दृष्टिकोण से देखना होगा, इस पर अदालत को विचार करना होगा।

नीति को लागू करने की प्रक्रिया

CJI ने नीति को लागू करने के बाद आने वाली चुनौतियों पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि पहले नीति को लागू होने दिया जाए और फिर उससे संबंधित समस्याओं का समाधान निकाला जाए। उनकी बातों से स्पष्ट होता है कि शिक्षा प्रणाली में सुधार की आवश्यकता है और इसे उचित तरीके से लागू करने की आवश्यकता है। अधिकारियों को नीतियों को व्यवस्थित करने पर ध्यान देना होगा ताकि सभी छात्रों के लिए यह सहज हो सके।

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