पत्नी को ‘बेवकूफ’ कहने पर पति को नहीं ठहराया जा सकता जिम्मेदार: सुप्रीम कोर्ट

The CSR Journal Magazine
सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि पत्नी को ‘बेवकूफ’ और ‘निकम्मी’ कहना अपने आप में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A के तहत प्रताड़ना का अपराध नहीं है। इस फैसले में अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल इस तरह की टिप्पणियों के आधार पर पति को पत्नी की आत्महत्या के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।

पति के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही रद्द

जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने कहा कि पति का स्वभाव या गुस्सैल व्यवहार अपने आप में आपराधिक धमकी या गंभीर चोट पहुंचाने के अपराध के बराबर नहीं हो सकता। अदालत ने यह भी कहा कि यदि आरोपों के समर्थन में कोई ठोस सामग्री मौजूद नहीं है, तो ऐसा मामला चलाना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।

पत्नी की आत्महत्या का मामला

मामले की जानकारी के अनुसार, पति और पत्नी की शादी 2021 में हुई थी। इसके बाद दोनों 2022 में कनाडा के टोरंटो चले गए। 11 जून 2023 को पत्नी ने अपने अपार्टमेंट की 22वीं मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर ली। घटनास्थल से एक हाथ से लिखा नोट मिला था, जिसमें उसने नौकरी न मिलने और जीवन में असफलता से परेशान होने की बात कही थी।

मृतका के पिता का आरोप

मृतका के पिता ने महाराष्ट्र के सतारा थाने में एफआईआर दर्ज कराते हुए आरोप लगाया कि शादी से पहले 15 तोला सोना, शादी के बाद पहली दिवाली पर सोने की अंगूठी और ब्रेसलेट तथा बाद में तीन तोला सोने की मांग की गई थी। उन्होंने पति पर बेटी को मानसिक रूप से प्रताड़ित करने और उसे बेवकूफ व निकम्मी कहने का भी आरोप लगाया।

दहेज मांगने का कोई ठोस सबूत नहीं: SC

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि कनाडा के कोरोनर की जांच और टोरंटो पुलिस की 2024 की क्लोजर रिपोर्ट में किसी संघर्ष या साजिश के संकेत नहीं मिले थे। आत्महत्या नोट की लिखावट भी मृतका की पाई गई। सीसीटीवी फुटेज से पता चला कि घटना के समय पति घर पर नहीं था। अदालत ने कहा कि कथित दहेज मांगों का जिक्र 2021 और 2022 की घटनाओं के रूप में किया गया, लेकिन पत्नी की मौत तक इस संबंध में कोई शिकायत सामने नहीं आई।

एफआईआर का समय पर दायर न होना

एफआईआर भी मौत के बाद दर्ज कराई गई, जिससे आरोपों पर संदेह पैदा होता है। कोर्ट ने 15 तोला सोने को दहेज मानने से भी इनकार किया। पीठ के मुताबिक, पिता ने खुद स्वीकार किया था कि सोना बेटी और दामाद दोनों को शादी के उपहार के रूप में दिया गया था। पहली दिवाली पर उपहारों का आदान-प्रदान भारतीय परिवारों में सामान्य परंपरा है।

क्रूरता के लिए विशिष्ट घटनाएं जरूरी

पीठ ने कहा कि क्रूरता साबित करने के लिए उत्पीड़न की विशिष्ट घटनाएं बताना जरूरी है। सामान्य और अस्पष्ट आरोपों के आधार पर आपराधिक मुकदमा जारी नहीं रखा जा सकता। कोर्ट ने कहा कि क्रूरता का आरोप किसी विशिष्ट कृत्य या चूक के बिना साबित नहीं किया जा सकता।

वैवाहिक विवादों में सावधानी बरतने की जरूरत

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बेटी को खोने वाले पिता का दर्द समझा जा सकता है, लेकिन पति और ससुराल वालों को बिना किसी प्रमाण के इस त्रासदी के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा राज्य बनाम भजन लाल मामले में तय कानूनी सिद्धांतों का हवाला देते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट का आदेश रद्द कर दिया।

पति के खिलाफ दर्ज एफआईआर निरस्त

सुप्रीम कोर्ट ने पति के खिलाफ दर्ज एफआईआर और उससे जुड़ी पूरी आपराधिक कार्यवाही को निरस्त कर दिया। इस फैसले ने वैवाहिक विवादों में कानूनी प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है।

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