आर्थिक तबाही की आग: कराची में बिजली संकट पर बवाल, ढाका में गारमेंट वर्कर्स की हिंसक हड़ताल

The CSR Journal Magazine

Pakistan Bangladesh Violence: कराची से ढाका तक सड़कों पर फूटा गुस्सा, भारत के पड़ोस भयंकर बवाल क्यों

दक्षिण एशिया के दो बड़े पड़ोसी देश पाकिस्तान और बांग्लादेश इस समय भीषण आर्थिक संकट की चपेट में हैं, जिसके कारण आम जनता का आक्रोश सड़कों पर हिंसक प्रदर्शनों के रूप में फूट पड़ा है। पाकिस्तान के सबसे बड़े वाणिज्यिक शहर कराची में बदतर बिजली कटौती और गैस किल्लत के खिलाफ व्यापक आंदोलन छिड़ गया है, वहीं बांग्लादेश की राजधानी ढाका और उसके आसपास के औद्योगिक क्षेत्रों में न्यूनतम वेतन बढ़ाने की मांग को लेकर लाखों कपड़ा (गारमेंट) मजदूरों ने हिंसक विद्रोह कर दिया है। दोनों देशों में सरकार विरोधी नारों, आगजनी और सुरक्षा बलों के साथ तीखी झड़पों के कारण हालात बेहद तनावपूर्ण बने हुए हैं।

कराची में हाहाकार: 16 से 21 घंटे की बिजली कटौती, ठप हुआ जनजीवन

पाकिस्तान का सबसे बड़ा आर्थिक केंद्र और तटीय शहर कराची इस समय अभूतपूर्व ऊर्जा संकट से जूझ रहा है। शहर के बड़े हिस्से में रोजाना 16 से लेकर 21 घंटे तक की अघोषित बिजली कटौती (लोडशेडिंग) की जा रही है। इसके साथ ही घरेलू और वाणिज्यिक उपयोग के लिए रसोई गैस की आपूर्ति पूरी तरह ठप हो गई है, जिससे लोगों के घरों में चूल्हे जलना मुश्किल हो गया है।

सड़कों पर उतरी जनता और राजनीतिक दल

ऊर्जा संकट और बुनियादी सुविधाओं की कमी से नाराज होकर पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) के नेतृत्व में सोमवार को हजारों नागरिकों ने कराची की सड़कों पर मार्च निकाला। लियारी गेट से शुरू होकर यह विशाल रैली कराची प्रेस क्लब के बाहर समाप्त हुई, जहाँ एक उग्र जनसभा की गई। प्रदर्शनकारियों ने शहर को बिजली आपूर्ति करने वाली एकमात्र निजी कंपनी ‘के-इलेक्ट्रिक (K-Electric)’ और गैस आपूर्तिकर्ता ‘सुई सदर्न गैस कंपनी (SSGC)’ के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे पीपीपी के वरिष्ठ नेताओं ने चेतावनी दी है कि यदि बिजली और गैस की आपूर्ति तुरंत बहाल नहीं की गई, तो जनता दोनों कंपनियों के मुख्यालयों का पूरी तरह से घेराव करेगी।

ऊर्जा संकट के पीछे का असली कारण

कराची के इस संकट के पीछे पाकिस्तान का गहराता आर्थिक दिवालियापन और वित्तीय ढांचा है। वित्तीय रिपोर्टों के अनुसार, पाकिस्तान एलएनजी लिमिटेड (PLL) ने के-इलेक्ट्रिक को बकाया 8.7 अरब रुपये का भुगतान न करने पर गैस आपूर्ति रोकने की चेतावनी दी है। वहीं, तरलता संकट (Liquidity Crisis) के कारण बैंकों ने के-इलेक्ट्रिक को नई क्रेडिट सुविधाएं देना बंद कर दिया है और पुरानी क्रेडिट लाइनें वापस ले ली हैं, जिससे कंपनी ईंधन खरीदने में असमर्थ है। ईंधन की इसी कमी के कारण कराची के कई पावर प्लांट बंद पड़े हैं और शहर अंधेरे में डूबा हुआ है।

बांग्लादेश में कपड़ा मजदूरों का महाविद्रोह: 600 से अधिक फैक्ट्रियां बंद

दूसरी तरफ, दुनिया के दूसरे सबसे बड़े परिधान निर्यातक देश बांग्लादेश में हालात और भी बदतर हो चुके हैं। राजधानी ढाका सहित देश के प्रमुख औद्योगिक केंद्रों—गाजीपुर, सावर, आशुलिया और नारायणगंज में लाखों कपड़ा मजदूरों ने काम बंद कर अनिश्चितकालीन हड़ताल और प्रदर्शन शुरू कर दिया है।

न्यूनतम वेतन को दोगुना करने की मांग

प्रदर्शनकारी मजदूरों की मुख्य मांग है कि उनका न्यूनतम मासिक वेतन मौजूदा 12,500 टका (लगभग 102 डॉलर) से बढ़ाकर 30,000 टका (लगभग 242 डॉलर) किया जाए। मजदूरों का कहना है कि देश में बेकाबू मुद्रास्फीति (Inflation) के कारण खाद्यान्न, मकान का किराया, रसोई गैस और स्वास्थ्य सेवाओं के दाम आसमान छू रहे हैं, जिससे इस पुरानी मजदूरी में परिवार का पेट पालना असंभव हो गया है।

हिंसा और आगजनी की चपेट में ढाका

शनिवार से शुरू हुआ यह आंदोलन पिछले 48 घंटों में बेहद हिंसक रूप अख्तियार कर चुका है। ढाका के मीरपुर इलाके और गाजीपुर में प्रदर्शनकारियों ने प्रमुख राजमार्गों को जाम कर दिया, वाहनों में तोड़फोड़ की और पुलिस की गाड़ियों को आग के हवाले कर दिया। भीड़ को नियंत्रित करने के लिए सुरक्षा बलों ने लाठीचार्ज किया, आंसू गैस के गोले दागे, पानी की बौछारें (वाटर कैनन) छोड़ीं और साउंड ग्रेनेड का इस्तेमाल किया। इस हिंसक टकराव में 15 से अधिक पुलिसकर्मियों सहित 50 से ज्यादा लोग गंभीर रूप से घायल हुए हैं। तनाव को देखते हुए ढाका के बाहरी इलाकों में अर्धसैनिक बलों (बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश – BGB) को तैनात किया गया है और ड्रोन से निगरानी रखी जा रही है। बढ़ते बवाल के कारण ‘बांग्लादेश गारमेंट मैन्युफैक्चरर्स एंड एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन (BGMEA)’ ने ढाका और गाजीपुर की 600 से अधिक फैक्ट्रियों को अस्थाई रूप से बंद कर दिया है, जिससे लगभग 17 लाख श्रमिक सीधे प्रभावित हुए हैं।

आर्थिक बदहाली और राजनीतिक अस्थिरता: संकट की साझा जड़ें

पाकिस्तान और बांग्लादेश दोनों ही देशों में चल रहे इन जन-आंदोलनों के मूल में गहरा आर्थिक संकट और राजनीतिक अस्थिरता है।
1. आसमान छूती महंगाई: दोनों देशों में आम उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतें 8% से 15% की दर से बढ़ रही हैं, जिससे आम नागरिक और दिहाड़ी मजदूर बुनियादी जरूरतें पूरी नहीं कर पा रहे हैं।
2. विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट: ईंधन और आवश्यक वस्तुओं के आयात के लिए विदेशी मुद्रा भंडार की कमी ने दोनों अर्थव्यवस्थाओं को घुटनों पर ला दिया है। पाकिस्तान जहां आईएमएफ (IMF) के कड़े बेलआउट पैकेज की शर्तों के कारण कर और बिजली की दरें बढ़ा रहा है, वहीं बांग्लादेश का कपड़ा उद्योग वैश्विक मंदी और ऊर्जा संकट के कारण ऑर्डर की कमी से जूझ रहा है।
3. तख्तापलट के बाद का तनाव: बांग्लादेश में शेख हसीना सरकार के पतन के बाद बनी अंतरिम व नई कार्यवाहक सरकारों के लिए कानून-व्यवस्था बनाए रखना बड़ी चुनौती बन गया है। कार्यवाहक प्रशासन का आरोप है कि विपक्ष और प्रतिबंधित राजनीतिक दल कपड़ा मजदूरों के असंतोष का फायदा उठाकर देश को अस्थिर करने की साजिश रच रहे हैं।

सरकारों के प्रयास और आगे की राह

कराची में बढ़ते जनाक्रोश को देखते हुए सिंध प्रांतीय सरकार ने के-इलेक्ट्रिक को अपनी कार्यप्रणाली सुधारने के निर्देश दिए हैं, लेकिन वित्तीय संकट के चलते इसका कोई ठोस नतीजा निकलता नहीं दिख रहा है। वहीं बांग्लादेश में कार्यवाहक सरकार ने आंदोलन को शांत करने के लिए आनन-फानन में एक 6-सदस्यीय वेतन बोर्ड (Wage Board) का गठन किया है जो मजदूरों की मांगों और न्यूनतम वेतन की समीक्षा करेगा। सरकार और मजदूर यूनियनों के प्रतिनिधियों ने प्रदर्शनकारियों से काम पर लौटने की अपील की है। उद्योग जगत के जानकारों का कहना है कि यदि यह हड़ताल लंबे समय तक खिंची, तो वैश्विक ब्रांड बांग्लादेश से अपना व्यापार समेटकर भारत या वियतनाम जैसे देशों का रुख कर सकते हैं, जिससे देश का मुख्य निर्यात उद्योग पूरी तरह बर्बाद हो सकता है।

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