मुस्लिम परिवार की अनोखी भेंट, नालंदा के बड़ी दुर्गा मंदिर में सोने की नथिया चढ़ाने की परंपरा

The CSR Journal Magazine
नालंदा जिले के इस्लामपुर बाजार स्थित बड़ी दुर्गा माता का मनोकामना मंदिर, जिसे सिद्धपीठ बड़ी महारानी के नाम से भी जाना जाता है, सांप्रदायिक सौहार्द की एक अद्भुत कहानी बयां कर रहा है। यहां नवरात्र के दौरान मां के दरबार में पूजा एक मुस्लिम परिवार की ओर से भेंट की गई सोने की नथिया और गुप्त दान से होती है। यह परंपरा कई दशकों से चली आ रही है और इस मंदिर की आस्था दोनों समुदायों में गहरी है।

200 साल पुराना मंदिर

यह मंदिर 200 साल पुराना है और यहां श्रद्धालु दूर-दूर से आते हैं। लंदन, अमेरिका और कनाडा में बसे श्रद्धालु भी हर साल माता के चरणों में शीश नवाने अपने गांव लौटते हैं। मंदिर कमेटी के अध्यक्ष प्रो. उमेश प्रसाद और पुजारी अनिल कुमार बताते हैं कि यह परंपरा तब शुरू हुई जब एक मुस्लिम परिवार ने माता के दरबार में मन्नत मांगी थी। उस परिवार की कोई संतान नहीं थी और उनकी मन्नत पूरी होने पर उन्होंने सोने की नथिया चढ़ानी शुरू की।

परंपरा का महत्व, विशेष पूजा विधि

इस परिवार ने अपने नाम को सार्वजनिक नहीं किया है, लेकिन आज की पीढ़ी भी इस रस्म को पूरी निष्ठा के साथ निभा रही है। मंदिर के सेवादार रवि सिंह बताते हैं कि इस मंदिर की विधिवत स्थापना 1826 ई. में जोधनमल जैन और भत्तूमल जैन ने की थी। इस साल यह मंदिर स्थापना के 200 वर्ष पूरे कर रहा है। आमतौर पर नवरात्र में मंदिरों में एक या नौ कलश स्थापित किए जाते हैं, लेकिन यहां भगवान गणेश की पत्नियों ‘रिद्धि’ और ‘सिद्धि’ के प्रतीक के रूप में दो कलश स्थापित किए जाते हैं। यहां निशा पूजा का समय ‘संवैधानिक पत्रक विधान’ के तहत मिनटों के हिसाब से तय होता है।

सेवादारों की सफलता की कहानी

मंदिर कमेटी के अध्यक्ष बताते हैं कि इस सिद्धपीठ की सबसे बड़ी खासियत यहां के सेवादारों की कामयाबी है। रिकॉर्ड के अनुसार, बचपन या युवावस्था में जिन 200 से 400 युवाओं ने यहां स्वयंसेवक के रूप में काम किया, उनमें से कई आज कामयाबी के शिखर पर हैं। नालंदा के मौजूदा सांसद कौशलेंद्र कुमार भी बचपन में इस मंदिर में सेवादार का काम करते थे।

छोटी अयोध्या का दर्जा

बड़ी दुर्गा मंदिर के ठीक सामने ‘श्री राम जानकी अयोध्या ठाकुरबाड़ी’ है। यहीं 1800 ई. में महान संत स्वामी जुगलानंद शरण जी महाराज का जन्म हुआ था। स्वामी विवेकानंद ने भी इसी संत से ‘श्रीराम तत्व’ की दीक्षा ली थी। इस जुड़ाव के कारण इस्लामपुर को ‘छोटी अयोध्या’ कहा जाता है।

दक्षिणमुखी हनुमान का दरबार

सिद्धपीठ के ठीक बगल में दक्षिणमुखी हनुमान जी और प्रभु श्रीराम का प्राचीन दरबार है। सेवादार सन्नी कुमार बताते हैं कि मंगलवार और शनिवार को दक्षिणमुखी हनुमान जी को लड्डू का भोग लगाकर माता का दर्शन करने वाले भक्तों के सारे कष्ट और रोग-व्याधियां दूर हो जाती हैं। इस प्रकार, नालंदा का यह मंदिर न केवल आस्था का केंद्र है, बल्कि सांप्रदायिक एकता का भी प्रतीक है।

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