सरकारों पर कैसे बोझ बन रहे IAS-IPS? हिमाचल करेगा छंटनी?

The CSR Journal Magazine
हिमाचल प्रदेश सरकार ने IAS, IPS और IFS के स्वीकृत पदों को कम करने का बड़ा फैसला लिया है। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के अनुसार, राज्य को अधिकारियों की बड़ी संख्या की आवश्यकता नहीं है। उन्हें ऐसे अधिकारियों की आवश्यकता है जो योजनाओं को जमीन पर उतार सकें। सरकार का मानना है कि कई अधिकारी उपलब्ध होने के बावजूद उनके लिए काम की कमी है, जिससे सरकारी खर्च में इजाफा हो रहा है।

कैडर में बदलाव की आवश्यकता

मुख्यमंत्री ने बताया कि हिमाचल में IAS के कुल 153 पदों को घटाकर 130 किया जाएगा। उनका मानना है कि 100-110 IAS अधिकारियों से प्रदेश का काम सुचारु रूप से चल सकता है, लेकिन अधिकतर अधिकारियों के सुझाव पर 130 पद तय किए गए हैं। इसी तरह, IFS के पद 118 से घटाकर 83 और IPS के पद 96 से कम किए जाएंगे।

राज्यवार IAS-IPS-IFS की स्थिति

केंद्र सरकार के आंकड़ों के अनुसार, 1 जनवरी 2025 को IAS, IPS और IFS कैडर में कुल 6,877 IAS पदों में से 5,577 ही भरे हुए थे। इसी तरह, 5,099 IPS पदों में 4,594 और 3,193 IFS पदों में 2,164 अधिकारी तैनात थे। इसका मतलब यह है कि हर खाली पद पर सरकार को तुरंत किसी अधिकारी की नियुक्ति करनी जरूरी नहीं है।

हिमाचल की स्थिति की गंभीरता

हिमाचल प्रदेश में IAS अधिकारियों की जरूरत का आकलन मुख्यमंत्री सुक्खू ने किया था। उन्होंने कहा कि एक IAS अधिकारी पर सालाना लगभग 200 करोड़ रुपये का खर्च आता है। यही वजह है कि सरकार ने कैडर को कम करने का निर्णय लिया है। सुक्खू ने स्पष्ट कहा है कि किसी अधिकारी को केंद्र में जाने से नहीं रोका जाएगा, और उनकी फाइलों को जल्द मंजूरी दी जाएगी।

कम अधिकारी का मतलब बेहतर प्रशासन?

राज्य सरकार का मानना है कि अधिकारियों की संख्या कम करने से उनके खर्च में कमी आएगी, लेकिन इससे प्रशासन की क्षमता पर क्या असर पड़ेगा, यह एक बड़ा सवाल है। हिमाचल एक भौगोलिक रूप से चुनौतीपूर्ण राज्य है, जहां विभिन्न जिम्मेदारियों का सही ढंग से निपटारा करने के लिए पर्याप्त मानव संसाधन की आवश्यकता है।

क्या कदम उठाने की जरूरत है?

सीधे तौर पर अधिकारियों की संख्या कम करने से प्रशासन की गुणवत्ता में गिरावट आ सकती है। इसलिए, यह जरूरी है कि यह देखा जाए कि कौन से अधिकारियों की किस काम के लिए तैनाती की जानी चाहिए। राज्यवार आंकड़ों में दिखता है कि कई राज्यों में स्वीकृत और तैनात पदों के बीच महत्वपूर्ण अंतर है।

सवाल जो उठ रहे हैं

हिमाचल के निर्णय से यह स्पष्ट होता है कि क्या सिर्फ अफसरों की संख्या कम करने से प्रशासन में सुधार संभव है? यह बड़ा प्रश्न है, क्योंकि इस कदम से न केवल राज्य का खर्च घटेगा, बल्कि यह भी देखना होगा कि कितने अधिकारियों की जरूरत है और कहां उन्हें तैनात करना चाहिए।

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