SIR इफेक्ट: UP में सबसे ज्यादा कटे नाम, 13.24 प्रतिशत कम हुए मतदाता

The CSR Journal Magazine
उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा, पंजाब और मणिपुर में वोटर लिस्ट के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के बाद मतदाताओं की संख्या में 13.24 प्रतिशत की कमी आई है। ये सभी राज्य अगले साल विधानसभा चुनावों के लिए तैयार हैं। निर्वाचन आयोग के अनुसार, उत्तर प्रदेश में मतदाताओं की संख्या में सबसे अधिक गिरावट आई है, जो कुल गिरावट का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा है।

यूपी में मतदाताओं की संख्या का आंकड़ा

उत्तर प्रदेश में SIR से पहले मतदाताओं की संख्या 15.44 करोड़ थी। ड्राफ्ट लिस्ट में यह संख्या घटकर 12.56 करोड़ रह गई, जबकि फाइनल लिस्ट में यह बढ़कर 13.40 करोड़ हो गई। इस प्रकार, यूपी में मतदाताओं की संख्या में कुल 2.04 करोड़ यानी 13.24 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। यह आंकड़ा इन पांच राज्यों में सबसे अधिक है, जो चुनावी रणनीतियों को प्रभावित कर सकता है।

पंजाब और अन्य राज्यों की स्थिति

पंजाब में भी मतदाताओं की संख्या में कमी आई है। यहां की संख्या 2.15 करोड़ से घटकर ड्राफ्ट लिस्ट में 1.94 करोड़ रह गई। फाइनल लिस्ट में यह संख्या फिर से बढ़कर 2.01 करोड़ हो गई। इस प्रकार, पंजाब में मतदाताओं की संख्या में 0.14 करोड़ यानी 6.34 प्रतिशत की कमी आई। पंजाब में हटाए गए नामों की सबसे अधिक वापसी भी दर्ज की गई है।

उत्तराखंड, मणिपुर और गोवा की स्थिति

उत्तराखंड में वोटरों की संख्या 0.80 करोड़ से घटकर 0.71 करोड़ रह गई है। नाम जोड़ने के बाद यह संख्या 0.72 करोड़ हो गई। मणिपुर में फाइनल लिस्ट में मतदाताओं की संख्या 0.196 करोड़ और गोवा में 0.1058 करोड़ हो गई। इन आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि SIR के प्रभाव से सभी राज्यों में मतदाता संख्या में कमी आई है।

विपक्ष की प्रतिक्रिया और चुनावी रणनीतियाँ

2027 में जिन पांच राज्यों में चुनाव होने हैं, उनमें SIR के बाद वोटरों की संख्या में आई कमी को लेकर विपक्षी दलों की प्रतिक्रिया तेज हो सकती है। CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्षी दल इस मुद्दे को लेकर मोर्चा खोल सकते हैं। विपक्ष फिर से इन आंकड़ों के बहाने कथित वोट चोरी का आरोप लगाएगा, जबकि सत्ता पक्ष इसे विपक्ष की चुनावी हार का बहाना बताएगा।

चुनाव आयोग की चुनौतियाँ

SIR पर इस ‘दंगल’ के बीच चुनाव आयोग को यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी भी तरह की गड़बड़ी न हो। पीलीभीत जैसे मामलों की पुनरावृत्ति को रोकने के लिए आयोग को सख्त कदम उठाने होंगे। चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है कि वह निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करे, ताकि मतदाता विश्वास के साथ अपने मत का प्रयोग कर सकें।
इन आंकड़ों के प्रकाश में, यह देखना दिलचस्प होगा कि आगामी चुनावों में राजनीतिक दल किस प्रकार की रणनीतियाँ अपनाते हैं। मतदाता संख्या में कमी के चलते चुनावी नतीजों पर क्या प्रभाव पड़ेगा, यह भी एक महत्वपूर्ण सवाल है। सभी राजनीतिक दलों को इस स्थिति का सामना करना होगा और अपने-अपने मतदाता आधार को फिर से मजबूत करने की दिशा में काम करना होगा।

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