दिल्ली में साइकिल चलाना खतरनाक: 97% हादसे पुलिस रिकॉर्ड से गायब

The CSR Journal Magazine

खुद की रिपोर्ट में चौंकाने वाले आंकड़े

दिल्ली में साइकिल चलाना रोज़मर्रा की बात है, लेकिन क्या यह सुरक्षित है? IIT-दिल्ली की एक ताज़ा स्टडी ने यह शानदार सचाई बताई है कि साइकिल सवारों के 97.2% हादसे पुलिस के रिकॉर्ड में दर्ज नहीं होते। इस रिसर्च में 844 साइकिल सवारों से बातचीत की गई। 742 सवारों ने अपने हादसों की जानकारी दी, जिसमें से महज़ 2.8% मामले ही पुलिस तक पहुंचे। यह आंकड़ा दर्शाता है कि रोज़ होने वाले छोटे-मोटे टकराव और गिरने की घटनाएं थाने तक पहुंचने से पहले ही दब जाती हैं।

पुलिस रिकॉर्ड बनाम असली तस्वीर

रिसर्च के अनुसार, पुलिस रिकॉर्ड में ट्रकों से जुड़े हादसे ज्यादा होते हैं जबकि साइकिल सवारों की रिपोर्टिंग में मोटरसाइकिलों से हुए टकराव का आंकड़ा 50% है। 25% मामलों में कार शामिल होती है, जबकि ई-रिक्शा का हिस्सा 11% है। इस पर शोधकर्ताओं का मानना है कि दिल्ली की सड़कों पर अधिकतर मोटरसाइकिलें साइकिल सवारों के साथ चलती हैं, जिससे टकराव का खतरा बढ़ जाता है।

घायल साइकिल सवारों की स्थिति

दिलचस्प है कि इस स्टडी में साइकिल सवारों की चोटों का भी जिक्र किया गया है। सेल्फ-रिपोर्टेड हादसों में से 78% में सवार घायल हुए, जिनमें से 67% ने मेडिकल ट्रीटमेंट लिया। सबसे ज्यादा चोटें घुटने और पिंडली में आईं, जबकि कलाई और हाथों में चोटें आने का प्रतिशत 27.8% था।

अन्य देशों की तुलना में सुरक्षा का स्तर

दिल्ली में हर 10 लाख किलोमीटर साइकिल चलाने पर 28.6 हादसे चोट के साथ होते हैं, जो डेनमार्क, जर्मनी और नीदरलैंड जैसे देशों की तुलना में 60 से 200 गुना ज्यादा हैं। इन देशों में साइकिल चलाने के लिए सुरक्षित इंफ्रास्ट्रक्चर मौजूद है। स्पष्ट है कि दिल्ली की हालत पूरी तरह अलग है, जिसके लिए नीतियों में बदलाव की आवश्यकता है।

साइकिल सवारों के लिए बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर की मांग

शोधकर्ताओं ने इस बात पर जोर दिया है कि दिल्ली जैसे शहरों में साइकिल सवारों की सुरक्षा के लिए बेहतर साइकिल ट्रैक, अलग लेन तथा सड़क डिजाइन की जरूरत है। इसे लागू करने से ही साइकिल सवारों की जान जोखिम में नहीं रहेगी। इसके साथ-साथ पुलिस रिकॉर्ड पर निर्भर रहने की बजाय स्वास्थ्य और सर्वे आधारित डेटा को नीति-निर्माण में शामिल करना जरूरी है।

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