16 साल की क़ानूनी लड़ाई के बाद भारत के Ex Enemy Property Custodian Dinesh Singh को बड़ी राहत, CAT ने सभी आरोप और सजा की कार्रवाई रद्द की

The CSR Journal Magazine
Ex Enemy Property Custodian Dinesh Singh: केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (Central Administrative Tribunal) की मुंबई पीठ ने भारतीय राजस्व सेवा (IRS) के अधिकारी और भारत के पूर्व कस्टोडियन ऑफ एनिमी प्रॉपर्टी (CEPI – Custodian of Enemy Property for India) दिनेश सिंह को बड़ी राहत दी है। CAT ने उनके खिलाफ चल रही विभागीय कार्रवाई में लगाए गए आरोपों को साबित नहीं माना और 23 जून 2023 को दिए गए दंड के आदेश को रद्द कर दिया। CAT ने सिंह को सभी परिणामी लाभ देने का भी निर्देश दिया है। यह फैसला 19 अगस्त 2026 को सुनाया गया।

Ex Enemy Property Custodian Dinesh Singh: 2006-07 में लिए गए फैसलों को लेकर शुरू हुई थी कार्रवाई

दिनेश सिंह को 14 नवंबर 2005 को प्रतिनियुक्ति पर भारत के कस्टोडियन ऑफ एनिमी प्रॉपर्टी के पद पर भेजा गया था। वह 25 अक्टूबर 2011 तक इस पद पर रहे। इस दौरान मुंबई की कुछ संपत्तियों से जुड़े उनके फैसलों को लेकर बाद में विभागीय कार्रवाई शुरू हुई। मामले की शुरुआत 18 सितंबर 2010 को उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सचिव अनूप पांडे की शिकायत से हुई। इसके बाद गृह मंत्रालय ने मामले की जांच की और 2014 में सिंह से जवाब मांगा।

डायना टॉकीज की संपत्ति से जुड़ा था प्रमुख आरोप

मामले में मुंबई के ताड़देव स्थित Diana Talkies से जुड़ा विवाद भी शामिल था। विभाग का आरोप था कि सिंह ने 2007 में एक पक्ष को ‘No Objection Certificate’ यानी NOC जारी किया, जिसके बाद संपत्ति से जुड़े अधिकारों के हस्तांतरण का रास्ता साफ हुआ। विभाग ने यह भी आरोप लगाया था कि NOC जारी करने से पहले केंद्र सरकार की अनुमति नहीं ली गई और खुले में नीलामी नहीं कराई गई। विभाग की ओर से यह भी कहा गया था कि अगर खुले में नीलामी होती तो संपत्ति से करीब 6.25 करोड़ रुपये मिल सकते थे, जबकि संबंधित लेन-देन से करीब 3 करोड़ रुपये मिले। इसी आधार पर सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचाने का आरोप लगाया गया था। हालांकि CAT ने बाद में इस आरोप पर सवाल उठाते हुए कहा कि खुद अनुशासनिक प्राधिकारी के सामने 6.25 करोड़ रुपये मिलने का कोई सबूत नहीं था।

CAT ने माना- संपत्ति नहीं, आय में था एक-चौथाई हिस्सा

Central Administrative Tribunal के फैसले में मामले का एक अहम पहलू सामने आया। CAT ने कहा कि धुनबाई सुपारिवाला पाकिस्तानी नागरिक थीं और उनका डायना टॉकीज की संपत्ति पर मालिकाना हिस्सा नहीं था, बल्कि वहां की आय में एक-चौथाई हिस्सेदारी थी। न्यायाधिकरण ने रिकॉर्ड में मौजूद कानूनी सलाह का भी उल्लेख किया, जिसमें ट्रस्टियों को संपत्ति बेचने का अधिकार बताया गया था और यह कहा गया था कि कस्टोडियन का अधिकार आय वाले हिस्से तक था। CAT ने सिंह द्वारा 13 अप्रैल 2007 को जारी आदेश को भी देखा। इसमें ट्रस्ट को कुछ शर्तों के साथ एक-चौथाई हिस्से की आय से संबंधित रकम कस्टोडियन के पास जमा कराने और उसका हिसाब देने की व्यवस्था थी। न्यायाधिकरण ने कहा कि इस आदेश से यह नहीं दिखता कि सिंह ने पूरी संपत्ति की बिक्री के लिए NOC दी थी।

Ex Enemy Property Custodian Dinesh Singh: जांच अधिकारी ने आरोप नहीं माने थे साबित

इस मामले में विभागीय जांच अधिकारी ने जांच के बाद सिंह के खिलाफ लगाए गए आरोपों को साबित नहीं माना था। इसके बावजूद अनुशासनिक प्राधिकारी जांच अधिकारी की रिपोर्ट से सहमत नहीं हुए। उन्होंने असहमति जताते हुए कुछ आरोपों को साबित और कुछ को आंशिक रूप से साबित माना। इसके बाद सिंह पर वेतनमान में तीन चरण की कटौती की सजा लगाई गई थी, जिसका असर उनकी भविष्य की वेतन वृद्धि पर भी पड़ना था।

CAT ने अनुशासनिक आदेश को बताया आधारहीन

CAT ने अपने फैसले में कहा कि विभागीय कार्रवाई में जिन कुछ आदेशों को आधार बनाया गया, वे अर्ध-न्यायिक प्रकृति के आदेश थे। CAT ने सुप्रीम कोर्ट के एक हालिया फैसले का हवाला देते हुए कहा कि केवल किसी अर्ध-न्यायिक आदेश के गलत होने से उसे अपने आप कदाचार नहीं माना जा सकता। इसके लिए दुर्भावना, भ्रष्ट मंशा या बदनीयती जैसे तत्वों का होना जरूरी है। CAT ने कहा कि मौजूदा मामले में ऐसा आरोप साबित नहीं हुआ। CAT ने यह भी कहा कि आरोपों की बुनियाद ही इस धारणा पर थी कि धुनबाई सुपारिवाला का संपत्ति में एक-चौथाई हिस्सा था, जबकि रिकॉर्ड के अनुसार उनका हिस्सा संपत्ति में नहीं बल्कि उसकी आय में था। CAT ने अनुशासनिक प्राधिकारी के आदेश को बिना पर्याप्त कारण वाला माना और कहा कि आरोप खुद ही साबित नहीं होते।

19 अगस्त 2026 को फैसला, सभी परिणामी लाभ देने का आदेश

अंत में CAT मुंबई पीठ ने दिनेश सिंह की याचिका स्वीकार कर ली। 23 जून 2023 के अनुशासनिक प्राधिकारी के दंड आदेश को रद्द कर दिया और सिंह को उससे जुड़े सभी परिणामी लाभ देने का निर्देश दिया। मामले में लंबित आवेदन भी बंद कर दिए गए और किसी तरह की लागत नहीं लगाई गई। यह फैसला सरकारी अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई में अर्ध-न्यायिक फैसलों की भूमिका और आरोप तय करने के दौरान रिकॉर्ड में मौजूद तथ्यों की सही व्याख्या के महत्व को भी सामने लाता है।
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