शराबबंदी का नशा: Bihar में नशे के नए रास्ते और राजस्व का नुकसान, सरकार ने ड्रग्स के खिलाफ शुरू किया अभियान

The CSR Journal Magazine
पटना: बिहार में शराबबंदी को अब 10 साल से ज्यादा हो चुके हैं। यह कदम तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 2016 में महिलाओं में राजनीतिक पैठ बनाने के लिए उठाया था। हालांकि, यह फैसला नशाखोरी और हिंसा को कम करने के बजाय सरकार के लिए एक चुनौती बन गया है। शराबबंदी के कारण लोगों ने नशे के दूसरे विकल्पों की ओर रुख किया है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने हाल ही में ड्रग्स के खिलाफ एक महीने का अभियान शुरू करने की घोषणा की है, जो इस समस्या की गंभीरता को दर्शाता है।

नशे के नए विकल्प

बिहार में नशे के वैकल्पिक साधनों का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। पिछले पांच वर्षों में स्वापक औषधि एवं मनःप्रभावी पदार्थ (NDPS) अधिनियम के तहत मामले और गिरफ्तारियां बढ़ी हैं। 2022 में इस अधिनियम के तहत 1,822 मामले दर्ज हुए थे, जो तीन साल में 67% बढ़कर 2,716 तक पहुंच गए हैं। इस साल जनवरी से मई तक 1,095 मामले सामने आ चुके हैं। यह आंकड़े नशे की बढ़ती समस्या को स्पष्ट करते हैं।

नशा मुक्ति केंद्रों की भीड़

बिहार में ड्रग्स की समस्या को और बेहतर तरीके से समझा जा सकता है। नशा मुक्ति केंद्रों में लोगों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने संसद में बताया कि 2022-23 में बिहार के नशा मुक्ति केंद्रों में ड्रग्स के शिकार 1,487 लोगों की मदद की गई। यह संख्या पिछले दो वर्षों में लगभग 20 गुना बढ़कर 29,429 पहुंच गई है। यह स्थिति नशे की समस्या की गंभीरता को दर्शाती है।

सरकार की चुनौतियां

सरकार को तीन प्रमुख चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। अवैध और जहरीली शराब पर रोक लगाने में सरकार विफल रही है। माफिया से निपटने में भी नाकामी दिख रही है। हाल ही में नालंदा में शराब माफिया के खिलाफ अभियान के दौरान एक पुलिस कांस्टेबल की गोली लगने से मौत हो गई। इसके अलावा, शराबियों में ड्रग्स का चलन तेजी से बढ़ रहा है, जो सरकार के लिए एक नई चिंता का विषय है।

राजस्व में कमी

शराबबंदी से बिहार के राजस्व में भारी कमी आई है। मद्य निषेध से पहले, शराब से मिलने वाला एक्साइज राजस्व का एक बड़ा हिस्सा था। नैशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकनॉमिक रिसर्च (NCAER) ने शराबबंदी हटाने की वकालत की है, जिससे सरकार का राजस्व 14-15% बढ़ने की उम्मीद है। इससे विकास को गति मिलेगी और शिक्षा व स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों को लाभ होगा। NCAER के अनुसार, शराबबंदी से महिलाओं के खिलाफ अपराधों में कोई कमी नहीं आई है, बल्कि अवैध शराब और ड्रग्स का सेवन बढ़ा है।

आर्थिक संकट का सामना

NCAER के दस्तावेज को आर्थिक संकट से जूझ रहे बिहार के संदर्भ में देखना होगा। वित्त वर्ष 2025-26 के बजट में राजकोषीय घाटे का लक्ष्य GSDP का 3% यानी 32,718 करोड़ रुपये रखा गया था। लेकिन, राजकोषीय घाटा GSDP का 11.8% होकर 1.34 लाख करोड़ रुपये हो गया। यह स्थिति बिहार के लिए गंभीर चिंता का विषय है।

गुजरात में भी समान स्थिति

यह समस्या केवल बिहार तक सीमित नहीं है। गुजरात में भी शराबबंदी लागू है, जो 66 वर्षों से चल रही है। समय-समय पर अदालतों और निष्पक्ष विश्लेषकों ने चिंता जताई है कि शराबबंदी ने ब्लैक मार्केट को जन्म दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में जहरीली शराब के 10 बड़े हादसों में गुजरात में 600 से ज्यादा मौतों का जिक्र किया है। अदालत ने शराबबंदी के कारण अवैध शराब की कालाबाजारी की बात भी कही है।
अगर हम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देखें, तो अमेरिका, रूस, नॉर्वे, और फिनलैंड जैसे देशों में भी शराबबंदी लागू की गई थी, लेकिन कुछ समय बाद इसे हटा दिया गया। वहां भी इसे हटाने के पीछे के कारण और हालात बिहार की स्थिति से मिलते-जुलते हैं। यह दर्शाता है कि शराबबंदी का असर हमेशा सकारात्मक नहीं होता है।

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