असली शिवसेना की जंग- चुनाव आयोग के धनुष-बाण फैसले को उद्धव खेमे ने सुप्रीम कोर्ट में दी खुली चुनौती

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असली शिवसेना विवाद: उद्धव गुट ने सुप्रीम कोर्ट में अयोग्यता याचिकाओं पर फैसला करने की अपील की

महाराष्ट्र के ऐतिहासिक राजनीतिक संकट और शिवसेना के नियंत्रण को लेकर चल रही कानूनी लड़ाई अब अपने निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुकी है। सुप्रीम कोर्ट में शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) गुट की ओर से दाखिल याचिकाओं पर मैराथन सुनवाई जारी है, जिसमें भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची (दलबदल विरोधी कानून) और लोकतांत्रिक संस्थाओं की शक्तियों को लेकर गहरे संवैधानिक सवाल उठाए गए हैं। उद्धव ठाकरे खेमे ने देश की सर्वोच्च अदालत से पुरजोर अपील की है कि बागी विधायकों की अयोग्यता याचिकाओं पर किसी भी अन्य विषय से पहले फैसला किया जाना चाहिए। इसके साथ ही, उद्धव गुट ने निर्वाचन आयोग (ECI) के उस फैसले को पूरी तरह गैर-कानूनी बताते हुए चुनौती दी है, जिसके तहत एकनाथ शिंदे गुट को ‘असली शिवसेना‘ माना गया था और पार्टी का पारंपरिक चुनाव चिन्ह ‘धनुष-बाण’ उन्हें सौंप दिया गया था।

कपिल सिब्बल की मुख्य दलील

सर्वोच्च न्यायालय की विशेष पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना शामिल हैं, वर्ष 2024 में दायर की गई उन याचिकाओं पर विस्तृत सुनवाई कर रही है जो महाराष्ट्र विधानसभा अध्यक्ष के निर्णय और चुनाव आयोग के आदेश के खिलाफ हैं। उद्धव गुट की ओर से पैरवी कर रहे देश के जाने-माने वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने अदालत के समक्ष दलील दी कि यदि अयोग्यता की कार्यवाही को तार्किक अंजाम तक पहुंचाए बिना विधायी बहुमत के आधार पर मूल दल का फैसला किया जाता है, तो यह देश में दलबदल को बढ़ावा देने वाला एक खतरनाक और आत्मघाती मिसाल कायम करेगा।

विधायी दल और राजनीतिक दल में अंतर: कपिल सिब्बल का मुख्य संवैधानिक तर्क

उच्चतम न्यायालय में बहस के दौरान वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने ‘सुभाष देसाई बनाम महाराष्ट्र राज्यपाल’ मामले में सुप्रीम कोर्ट की ही संविधान पीठ द्वारा दिए गए पूर्व फैसले का पुरजोर हवाला दिया। उन्होंने तर्क दिया कि देश के कानून और संविधान के तहत ‘विधायी दल’ (Legislature Party) में विभाजन का अर्थ किसी भी स्थिति में ‘राजनीतिक दल’ (Political Party) का विभाजन नहीं माना जा सकता। सिब्बल ने कहा, “निर्वाचन आयोग और महाराष्ट्र विधानसभा के अध्यक्ष दोनों ने ही कानून के मूल सिद्धांतों को समझने में गंभीर भूल की है। उन्होंने सदन के भीतर विधायकों की संख्यात्मक ताकत यानी विधायी बहुमत को ही संपूर्ण राजनीतिक पार्टी मान लिया, जबकि ये दोनों पूरी तरह से भिन्न और स्वतंत्र अवधारणाएं हैं।” उद्धव गुट का मुख्य आधार यह है कि चुनाव आयोग को यह तय करने का अधिकार अवश्य है कि असली पार्टी कौन सी है, लेकिन यह निर्णय केवल तभी वैध हो सकता है जब बागी विधायकों के खिलाफ चल रही अयोग्यता की कार्यवाही पूरी हो चुकी हो। यदि शुरुआत में बगावत करने वाले विधायकों को अंततः अयोग्य घोषित कर दिया जाता है, तो विधानसभा या संगठनात्मक ढांचे में उनकी संख्या की गिनती को पूरी तरह से अमान्य माना जाना चाहिए, क्योंकि उनका अस्तित्व ही संवैधानिक रूप से दूषित हो जाता है।

विधानसभा अध्यक्ष राहुल नार्वेकर के 10 जनवरी 2024 के फैसले पर तीखे सवाल

उद्धव ठाकरे खेमे ने महाराष्ट्र विधानसभा के तत्कालीन अध्यक्ष राहुल नार्वेकर द्वारा 10 जनवरी 2024 को दिए गए विवादित फैसले को कानूनी रूप से पूरी तरह निराधार और अधिकार क्षेत्र से बाहर बताया है। गौरतलब है कि विधानसभा अध्यक्ष ने अपने फैसले में उद्धव गुट द्वारा दायर सभी अयोग्यता याचिकाओं को खारिज कर दिया था और विधायी सदन में संख्या बल के आधार पर मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले गुट को ही वास्तविक शिवसेना के रूप में मान्यता दे दी थी। कपिल सिब्बल ने अध्यक्ष के इस निष्कर्ष की तीखी आलोचना करते हुए कहा कि अध्यक्ष ने शिवसेना के वर्ष 2018 के आधिकारिक संगठनात्मक नेतृत्व ढांचे को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया। अध्यक्ष नार्वेकर ने अपने निर्णय में दावा किया था कि 2018 का पार्टी संविधान शिवसेना के वास्तविक लोकतांत्रिक ढांचे के अनुरूप नहीं था। सिब्बल ने इस दावे को खारिज करते हुए अदालत से कहा कि संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत विधानसभा अध्यक्ष को किसी राजनीतिक दल के आंतरिक संविधान को अवैध या अलोकतांत्रिक घोषित करने का कोई कानूनी अधिकार प्राप्त नहीं है। इसके अतिरिक्त, उद्धव गुट ने अध्यक्ष के उस निष्कर्ष पर भी गंभीर आपत्ति जताई जिसमें कहा गया था कि पार्टी के सर्वोच्च नेता यानी ‘पक्षप्रमुख’ (उद्धव ठाकरे) की व्यक्तिगत इच्छा को पूरी पार्टी की सामूहिक इच्छा नहीं माना जा सकता। सिब्बल ने सवाल उठाया, “यह निर्विवाद रूप से स्वीकार किया गया है कि उद्धव ठाकरे पार्टी के निर्वाचित पक्षप्रमुख हैं। वर्तमान में शिंदे गुट में शामिल सभी विधायकों ने वर्ष 2019 का विधानसभा चुनाव उद्धव ठाकरे के नेतृत्व और उनकी तस्वीरों के आधार पर ही लड़ा और जीता था। ऐसी स्थिति में, कोई विधानसभा अध्यक्ष यह कैसे तय कर सकता है कि पार्टी के मुख्य नेता की मान्यता और उनकी इच्छा का कोई कानूनी मूल्य नहीं है?”

चुनाव आयोग के 17 फरवरी 2023 के आदेश को चुनौती: ‘बहुमत के परीक्षण’ पर प्रहार

याचिका में भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के 17 फरवरी 2023 के उस आदेश को भी विस्तार से चुनौती दी गई है, जिसने उद्धव ठाकरे परिवार के हाथों से शिवसेना का नाम और उनका ऐतिहासिक ‘धनुष-बाण’ प्रतीक छीन लिया था। चुनाव आयोग ने अपने 78 पृष्ठों के विस्तृत आदेश में मुख्य रूप से “बहुमत के परीक्षण” (Test of Majority) को आधार बनाया था। आयोग ने पाया था कि 2019 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में शिवसेना के टिकट पर जीते विधायकों में से 40 विधायक एकनाथ शिंदे के साथ थे, जिनके पास पार्टी को मिले कुल मतों का लगभग 76 प्रतिशत हिस्सा था, जबकि उद्धव ठाकरे के पास केवल 15 विधायक बचे थे। इसी तरह लोकसभा में भी 18 में से 13 सांसदों का समर्थन शिंदे गुट को हासिल था। उद्धव गुट का तर्क है कि चुनाव आयोग का यह दृष्टिकोण पूरी तरह से “पूर्वाग्रह से ग्रसित और एकतरफा” था। उन्होंने आरोप लगाया कि आयोग राजनीतिक दल के जमीनी संगठनात्मक विंग, प्राथमिक सदस्यता और पार्टी के लाखों वफादार कार्यकर्ताओं की राय को मापने में पूरी तरह विफल रहा। सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष दलील दी कि निर्वाचन आयोग ने पहले से ही एक अंत (End Result) निर्धारित कर लिया था और फिर उस निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए तर्कों और आंकड़ों में हेरफेर की, जो प्रतीक आदेश (प्रतीक आरक्षण और आवंटन आदेश, 1968) के पैराग्राफ 15 की मूल भावना के विपरीत है।

दलबदल विरोधी कानून और ‘उत्तरवर्ती घटनाक्रमों’ का कानूनी पेंच

इस मामले में एक और महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु यह उठाया गया है कि क्या कोई विद्रोही समूह किसी पार्टी से अलग होने के बाद सत्ता का उपयोग करके अपने पक्ष में किए गए बाद के घटनाक्रमों के आधार पर खुद को असली पार्टी साबित कर सकता है? उद्धव गुट ने अदालत को चेतावनी देते हुए कहा है कि यदि कोई गुट मूल पार्टी से अलग होकर किसी अन्य बड़े दल (जैसे भाजपा) के सहयोग से सरकार बना लेता है, तो सत्ता के प्रभाव में आकर संगठन के अन्य पदाधिकारी और सदस्य स्वाभाविक रूप से उसके साथ जुड़ने लगते हैं। कपिल सिब्बल ने कहा कि एकनाथ शिंदे को अवैध तरीके से मुख्यमंत्री पद पर नियुक्त किया गया और फिर उस अवैध नियुक्ति के बाद हासिल की गई सांगठनिक ताकत को पूर्वव्यापी प्रभाव (Retroactive Effect) से बगावत को वैध बनाने के लिए इस्तेमाल किया गया। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक ‘राजेंद्र सिंह राणा’ मामले का संदर्भ देते हुए कहा कि प्रतीक चिन्ह पर दावा किए जाने के बाद या बगावत के बाद के घटनाक्रमों को आधार बनाने से दलबदल विरोधी कानून का पूरा उद्देश्य ही समाप्त हो जाएगा।

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