AI बनेगा आधार का सुरक्षा कवच, फेस ऑथेंटिकेशन और लिवनेस जांच से फर्जीवाड़े पर लगाम

The CSR Journal Magazine

आधार सुरक्षा में बड़ा तकनीकी बदलाव: AI और लिवनेस जांच से मजबूत होगा Aadhaar, फेस ऑथेंटिकेशन को भी मिला नया सिस्टम

आधार का इस्तेमाल अब केवल पहचान पत्र के रूप में नहीं, बल्कि बैंकिंग, सरकारी योजनाओं, दूरसंचार, डिजिटल सेवाओं और विभिन्न ऑनलाइन प्रक्रियाओं में पहचान सत्यापन की बुनियादी व्यवस्था के तौर पर तेजी से बढ़ रहा है। इसी बढ़ते इस्तेमाल के बीच भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (UIDAI) ने आधार प्रमाणीकरण की सुरक्षा को और मजबूत करने के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), लिवनेस डिटेक्शन, उन्नत फेस ऑथेंटिकेशन और नई तकनीकी संरचना पर जोर बढ़ाया है।

रोजाना 10 करोड़ आधार प्रमाणीकरण

UIDAI के मुताबिक, अब देश में रोजाना करीब 10 करोड़ आधार प्रमाणीकरण हो रहे हैं और आने वाले समय में इस क्षमता को बढ़ाकर 25 से 30 करोड़ प्रमाणीकरण प्रतिदिन तक ले जाने की तैयारी है। यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आधार का इस्तेमाल जितना बढ़ रहा है, उतना ही जरूरी हो गया है कि वास्तविक व्यक्ति और उसके नाम पर इस्तेमाल की जा रही नकली पहचान के बीच अंतर तेजी से और सटीक तरीके से किया जा सके। UIDAI अब प्रमाणीकरण प्रणाली को केवल फिंगरप्रिंट या OTP तक सीमित रखने के बजाय कई स्तरों वाली सुरक्षा व्यवस्था की दिशा में आगे बढ़ा रहा है।

आगे 25-30 करोड़ का लक्ष्य

UIDAI के चेयरमैन नीलकंठ मिश्रा के अनुसार, फिलहाल आधार व्यवस्था में लगभग 10 करोड़ प्रमाणीकरण प्रतिदिन हो रहे हैं। आधार का इस्तेमाल करने वाली संस्थाओं की संख्या भी बढ़कर 600 से अधिक हो चुकी है। इसलिए प्राधिकरण भविष्य में प्रतिदिन 25 से 30 करोड़ प्रमाणीकरण संभालने की क्षमता विकसित कर रहा है। इसका मतलब यह है कि आधार अब भारत के डिजिटल ढांचे में और भी व्यापक भूमिका निभाने जा रहा है। बैंक खाता खोलने, ग्राहक सत्यापन, सरकारी लाभ प्राप्त करने, दूरसंचार सेवाओं और दूसरी डिजिटल सेवाओं में पहचान की पुष्टि के लिए आधार आधारित प्रमाणीकरण का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है। इसी कारण UIDAI के सामने दोहरी चुनौती है। एक तरफ प्रमाणीकरण को इतना आसान और तेज बनाना है कि आम नागरिक को बार-बार कागजी दस्तावेज या लंबी प्रक्रिया से न गुजरना पड़े, वहीं दूसरी तरफ यह सुनिश्चित करना है कि किसी व्यक्ति की पहचान का गलत इस्तेमाल न हो।

AI से धोखाधड़ी पकड़ने की तैयारी

UIDAI अपनी तकनीकी व्यवस्था में AI आधारित धोखाधड़ी पहचान प्रणाली को भी मजबूत कर रहा है। इसका उद्देश्य असामान्य गतिविधियों और संभावित फर्जी प्रमाणीकरण के पैटर्न को पहचानना है। UIDAI के तकनीकी रोडमैप में आने वाले वर्षों के लिए उन्नत सुरक्षा व्यवस्था के साथ पोस्ट-क्वांटम क्रिप्टोग्राफी पर भी काम शामिल है। AI आधारित निगरानी का फायदा यह हो सकता है कि बड़ी संख्या में होने वाले प्रमाणीकरण लेनदेन में ऐसे पैटर्न पहचाने जा सकें, जो सामान्य व्यवहार से अलग हों। उदाहरण के लिए किसी प्रमाणीकरण व्यवस्था में असामान्य गतिविधि, संदिग्ध लेनदेन पैटर्न या किसी तरह की छेड़छाड़ की कोशिश सामने आती है तो तकनीकी प्रणालियां उसे पहचानने और आगे की जांच के लिए चिन्हित करने में मदद कर सकती हैं। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि हर आधार प्रमाणीकरण पर AI व्यक्ति के बारे में कोई स्वतंत्र फैसला करेगा। आधार की मूल व्यवस्था पहचान सत्यापन पर आधारित है और अलग-अलग माध्यमों से प्राप्त जानकारी का मिलान करके प्रमाणीकरण किया जाता है।

फिंगरप्रिंट में भी AI आधारित लिवनेस जांच

आधार सुरक्षा में एक महत्वपूर्ण तकनीकी बदलाव फिंगरप्रिंट प्रमाणीकरण से जुड़ा है। UIDAI के अनुसार, उसने FMR-FIR आधारित AI/ML मॉडल विकसित किया है, जिसका इस्तेमाल फिंगरप्रिंट की लिवनेस जांच के लिए किया जाता है। इसका उद्देश्य यह पता लगाना है कि प्रमाणीकरण के दौरान प्रस्तुत किया गया फिंगरप्रिंट किसी वास्तविक व्यक्ति से संबंधित है या किसी नकली माध्यम से तैयार किया गया है। सरल शब्दों में समझें तो लिवनेस जांच का उद्देश्य सिर्फ यह देखना नहीं है कि फिंगरप्रिंट का पैटर्न रिकॉर्ड से मिलता है या नहीं, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना है कि सामने प्रस्तुत बायोमेट्रिक वास्तव में जीवित व्यक्ति से आया है। UIDAI ने फिंगरप्रिंट आधारित प्रमाणीकरण के लिए पुराने L0 उपकरणों से अधिक सुरक्षित L1 पंजीकृत उपकरणों की ओर भी बदलाव किया है। प्राधिकरण के अनुसार L1 उपकरणों में बेहतर एन्क्रिप्शन, छेड़छाड़ से सुरक्षा और अधिक विश्वसनीयता जैसे सुरक्षा उपाय हैं।

अब चेहरे से भी होगी पहचान की पुष्टि

आधार सुरक्षा व्यवस्था में फेस ऑथेंटिकेशन पहले से उपलब्ध है, लेकिन अब इसे और व्यापक स्तर पर इस्तेमाल करने की दिशा में कदम बढ़ाया जा रहा है। UIDAI के अनुसार फेस ऑथेंटिकेशन में व्यक्ति के चेहरे की लाइव तस्वीर को आधार में पहले से दर्ज चेहरे की तस्वीर से 1:1 मिलान किया जाता है। इसका अर्थ यह है कि यह पूरी आबादी के डेटाबेस में किसी व्यक्ति का चेहरा खोजने वाली व्यवस्था नहीं है। प्रमाणीकरण के दौरान संबंधित आधार संख्या से जुड़े चेहरे के रिकॉर्ड के साथ मिलान किया जाता है। UIDAI के मुताबिक फेस ऑथेंटिकेशन सहमति आधारित है। किसी व्यक्ति की लाइव चेहरे की तस्वीर को आधार रिकॉर्ड में मौजूद तस्वीर से मिलाकर यह जांच की जाती है कि प्रमाणीकरण कराने वाला व्यक्ति वही है या नहीं।

बैंक और बीमा कंपनियों के लिए नया Face Authentication SDK

फेस ऑथेंटिकेशन को और उपयोगी बनाने की दिशा में UIDAI ने सितंबर 2026 में एक नया Face Authentication Software Development Kit यानी SDK और उससे जुड़ा सैंडबॉक्स सिस्टम शुरू किया है। इसका खास फायदा बैंकिंग, वित्तीय सेवाओं और बीमा क्षेत्र की संस्थाओं को हो सकता है। नए सैंडबॉक्स की मदद से संस्थाएं अपने डिजिटल प्लेटफॉर्म पर फेस ऑथेंटिकेशन को लागू करने से पहले उसका परीक्षण कर सकेंगी। यानी बैंक या अन्य वित्तीय संस्थान पहले तकनीक को परीक्षण वातावरण में जांच सकते हैं और उसके बाद वास्तविक सेवाओं में इस्तेमाल की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं। इससे डिजिटल ऑनबोर्डिंग की प्रक्रिया भी आसान होने की उम्मीद है। भविष्य में कुछ सेवाओं के लिए ग्राहक को बार-बार दस्तावेजों की प्रतियां उपलब्ध कराने के बजाय डिजिटल माध्यम से पहचान सत्यापन की सुविधा मिल सकती है।

आम लोगों के लिए इसका क्या मतलब है?

सबसे बड़ा बदलाव यह है कि आधार प्रमाणीकरण धीरे-धीरे बहुस्तरीय सुरक्षा व्यवस्था की ओर बढ़ रहा है। किसी व्यक्ति की पहचान की पुष्टि के लिए परिस्थिति और सेवा के अनुसार ओटीपी, फिंगरप्रिंट, आंखों की पुतली और चेहरे जैसी अलग-अलग तकनीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है। फेस ऑथेंटिकेशन के लिए स्मार्टफोन या टैबलेट का इस्तेमाल किया जा सकता है, बशर्ते उपकरण UIDAI की निर्धारित तकनीकी आवश्यकताओं को पूरा करता हो। UIDAI का Aadhaar Face RD ऐप भी इसी व्यवस्था का हिस्सा है। यह सामान्य ऐप की तरह उपयोगकर्ता द्वारा सीधे खोला जाने वाला ऐप नहीं है। जब कोई अधिकृत संस्था फेस आधारित आधार प्रमाणीकरण शुरू करती है, तब संबंधित प्रक्रिया के दौरान Face RD सेवा सक्रिय होती है। Google Play पर उपलब्ध UIDAI Face Authentication ऐप को अगस्त 2026 में अपडेट किया गया था।

चेहरे की पहचान में लिवनेस क्यों जरूरी?

फेस ऑथेंटिकेशन बढ़ने के साथ एक महत्वपूर्ण सवाल यह है कि केवल कैमरे के सामने किसी व्यक्ति की तस्वीर दिखाकर प्रमाणीकरण न कराया जा सके। यहीं लिवनेस जांच जैसी तकनीक महत्वपूर्ण हो जाती है। लिवनेस का मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कैमरे के सामने वास्तविक व्यक्ति मौजूद है, न कि केवल उसकी फोटो, रिकॉर्ड किया हुआ वीडियो या किसी अन्य माध्यम से तैयार की गई नकली प्रस्तुति। यह सुरक्षा इसलिए महत्वपूर्ण हो गई है क्योंकि डिजिटल पहचान प्रणालियों के सामने अब पारंपरिक धोखाधड़ी के साथ-साथ अत्याधुनिक नकली तस्वीरों और वीडियो जैसी चुनौतियां भी हैं। इसलिए पहचान सत्यापन में केवल चेहरे का मिलान पर्याप्त नहीं माना जाता; यह भी जरूरी है कि सामने मौजूद व्यक्ति वास्तविक हो।

क्या फिंगरप्रिंट फेल होने पर चेहरा काम आ सकता है?

आधार प्रमाणीकरण में अलग-अलग माध्यम उपलब्ध होने का एक बड़ा फायदा यह है कि किसी एक बायोमेट्रिक माध्यम में परेशानी होने पर अन्य विकल्प उपयोगी हो सकते हैं, जहां संबंधित सेवा और अधिकृत संस्था इसकी अनुमति देती हो। UIDAI की व्यवस्था में फिंगरप्रिंट, आइरिस और फेस ऑथेंटिकेशन अलग-अलग बायोमेट्रिक माध्यम हैं। UIDAI के ताजा डैशबोर्ड पर उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार अब तक अरबों बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण दर्ज किए जा चुके हैं और इनमें फेस ऑथेंटिकेशन का इस्तेमाल भी तेजी से बढ़ा है। विशेष रूप से ऐसे लोगों के लिए वैकल्पिक प्रमाणीकरण माध्यम महत्वपूर्ण हो सकते हैं जिनके फिंगरप्रिंट किसी कारण से ठीक से स्कैन नहीं होते। उम्र, काम की प्रकृति या उंगलियों की स्थिति जैसी वजहों से फिंगरप्रिंट आधारित प्रमाणीकरण में परेशानी आने की स्थिति में वैकल्पिक तकनीक उपयोगी हो सकती है।

आधार उपयोगकर्ताओं को क्या सावधानी रखनी चाहिए?

तकनीक मजबूत होने के बावजूद नागरिकों की सतर्कता उतनी ही जरूरी है। आधार से जुड़े किसी भी प्रमाणीकरण के दौरान यह ध्यान रखना चाहिए कि सेवा किस संस्था के लिए ली जा रही है और किस उद्देश्य से प्रमाणीकरण किया जा रहा है। किसी अनजान व्यक्ति के साथ आधार की जानकारी, OTP या अन्य संवेदनशील विवरण साझा नहीं करना चाहिए। यदि किसी व्यक्ति को अपने आधार से जुड़े प्रमाणीकरण पर संदेह हो तो वह आधार की Authentication History जैसी सुविधाओं के माध्यम से अपने प्रमाणीकरण रिकॉर्ड की जांच कर सकता है। UIDAI प्रमाणीकरण असफल होने पर अलग-अलग कारणों के लिए विशिष्ट त्रुटि कोड भी उपलब्ध कराता है। यह भी समझना जरूरी है कि आधार नंबर जान लेना अपने आप में किसी व्यक्ति के बायोमेट्रिक डेटा तक पहुंच नहीं देता। आधार प्रमाणीकरण की सुरक्षा व्यवस्था का उद्देश्य यही है कि पहचान की पुष्टि अधिकृत प्रक्रिया के माध्यम से हो।

डिजिटल पहचान की अगली दिशा

UIDAI का मौजूदा तकनीकी विस्तार केवल फेस ऑथेंटिकेशन तक सीमित नहीं है। बढ़ते प्रमाणीकरण भार को देखते हुए प्राधिकरण अपने बुनियादी ढांचे को बड़े स्तर पर तैयार कर रहा है। आने वाले समय में 25 से 30 करोड़ दैनिक प्रमाणीकरण संभालने की तैयारी इसी दिशा का हिस्सा है। साथ ही पोस्ट-क्वांटम क्रिप्टोग्राफी और AI आधारित धोखाधड़ी पहचान जैसी तकनीकों पर काम किया जा रहा है। इसका व्यापक असर भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। बैंकिंग, बीमा, सरकारी सेवाओं और अन्य डिजिटल प्रक्रियाओं में पहचान सत्यापन जितना आसान होगा, उतना ही कम कागजी काम और प्रत्यक्ष उपस्थिति की जरूरत पड़ सकती है। लेकिन इसके साथ गोपनीयता, सहमति और डेटा सुरक्षा भी उतने ही महत्वपूर्ण विषय बने रहेंगे।

आधार की डिजिटल चाल

कुल मिलाकर, UIDAI अब आधार को केवल एक पहचान संख्या के रूप में नहीं, बल्कि तेज, डिजिटल और बहुस्तरीय पहचान सत्यापन ढांचे के रूप में विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। AI आधारित धोखाधड़ी पहचान, फिंगरप्रिंट में लिवनेस जांच, फेस ऑथेंटिकेशन और नए SDK जैसे कदम इसी बदलाव का हिस्सा हैं। आम नागरिक के लिए इसका सीधा मतलब है कि आने वाले समय में आधार से जुड़ी कई सेवाओं में पहचान सत्यापन अधिक डिजिटल, तेज और तकनीकी रूप से सुरक्षित हो सकता है—हालांकि किसी भी डिजिटल पहचान प्रणाली की तरह इसमें नागरिक की सतर्कता और सहमति की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण रहेगी।

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