रक्षा क्षेत्र में भारत की बड़ी छलांग: पारस डिफेंस ने अमेरिकी ड्रोन जाइंट पावर्स से हासिल किया खास लाइसेंस

The CSR Journal Magazine

भारतीय कंपनी पारस डिफेंस ने अमेरिकी ड्रोन फर्म ‘पावर्स’ से हासिल किया अत्याधुनिक एंटी-ड्रोन तकनीक का लाइसेंस, देश में ही होगा ‘गार्डियन-1’ का विनिर्माण

भारत ने रक्षा क्षेत्र में ‘मेक इन इंडिया‘ और आत्मनिर्भरता की दिशा में एक और बड़ी उपलब्धि हासिल की है। रक्षा और अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी क्षेत्र की अग्रणी भारतीय कंपनी पारस डिफेंस एंड स्पेस टेक्नोलॉजीज लिमिटेड ने एक अमेरिकी ऑटोनॉमस सिस्टम कंपनी ऑटोनॉमस पावर कॉरपोरेशन (पावरस) की पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी टैंडम डिफेंस LLC के साथ एक अत्यंत महत्वपूर्ण बौद्धिक संपदा (IP) लाइसेंसिंग समझौता किया है। इस ऐतिहासिक सौदे के तहत पारस डिफेंस को अमेरिका की अत्याधुनिक ‘गार्डियन-1’ (Guardian-1) इंटरसेप्टर काउंटर-ड्रोन तकनीक का भारत में उपयोग करने का विशेष अधिकार मिल गया है। यह समझौता भारतीय सीमाओं और संवेदनशील औद्योगिक तथा सैन्य प्रतिष्ठानों को दुश्मन के हवाई हमलों और अवैध ड्रोनों से सुरक्षित रखने में गेम-चेंजर साबित होने वाला है।

क्या है यह रक्षा समझौता और इसकी शर्तें?

दोनों कंपनियों के बीच यह रक्षा तकनीकी समझौता 30 जून 2026 को हस्ताक्षरित किया गया था। समझौते की शर्तों के अनुसार, अमेरिकी कंपनी पावरस ने पारस डिफेंस को इस विशेष तकनीक का एक एक्सक्लूसिव (विशेष), नॉन-ट्रांसफरेबल (गैर-हस्तांतरणीय) और नॉन-सबलाइसेंसेबल लाइसेंस प्रदान किया है। इसका सीधा मतलब यह है कि भारत में इस विशिष्ट तकनीक का उपयोग करने, इसके आधार पर एंटी-ड्रोन सिस्टम का निर्माण करने और उनका व्यावसायीकरण (कॉमर्शियलाइजेशन) करने का अधिकार केवल और केवल पारस डिफेंस के पास ही सुरक्षित रहेगा। पारस डिफेंस भारत में इन उपकरणों के विनिर्माण और स्थानीय बाजार में आपूर्ति की पूरी जिम्मेदारी संभालेगी। शुरुआती चरण में इस समझौते की समय-सीमा 12 महीने तय की गई है, जिसे दोनों पक्षों की आपसी सहमति से आगे बढ़ाया जा सकता है। इसके बदले में भारतीय कंपनी अमेरिकी फर्म को तय लाइसेंस शुल्क और भारत में बिक्री से होने वाले शुद्ध लाभ (नेट प्रॉफिट) का एक हिस्सा देगी।

डोनाल्ड ट्रंप के बेटों से जुड़ा है अमेरिकी कंपनी का कनेक्शन

इस रक्षा सौदे ने वैश्विक स्तर पर राजनीतिक और रणनीतिक विश्लेषकों का ध्यान इसलिए भी खींचा है, क्योंकि अमेरिकी ड्रोन कंपनी ‘पावरस’ का सीधा संबंध अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के परिवार से है। कंपनी के आधिकारिक रिकॉर्ड और मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, डोनाल्ड ट्रंप के दोनों बेटों, डोनाल्ड ट्रंप जूनियर और एरिक ट्रंप का अपनी निवेश फर्म ‘अमेरिकन वेंचर पार्टनर्स’ के जरिए पावरस में बड़ा वित्तीय निवेश है। हालांकि, कंपनी के प्रवक्ताओं ने स्पष्ट किया है कि ट्रंप परिवार कंपनी में केवल एक प्रमुख निवेशक की भूमिका में है और इसके दैनिक परिचालन या व्यावसायिक फैसलों पर उनका कोई प्रशासनिक नियंत्रण नहीं है। इसके बावजूद, अमेरिकी राष्ट्रपति के परिवार से जुड़ी कंपनी का भारत के साथ इतना बड़ा तकनीकी साझाकरण दोनों देशों के मजबूत होते द्विपक्षीय और सामरिक संबंधों की गहराई को दर्शाता है।

गार्डियन-1 काउंटर-ड्रोन तकनीक की खासियतें

आज के दौर में पारंपरिक हथियारों से ज्यादा खतरा सस्ते, छोटे और आत्मघाती (कामिकेज़) ड्रोनों से हो गया है। गार्डियन-1 इंटरसेप्टर सिस्टम को विशेष रूप से इसी चुनौती से निपटने के लिए तैयार किया गया है। यह एक अत्यधिक तेज गति वाला, बैटरी संचालित और पूरी तरह से स्वायत्त (ऑटोनॉमस) काउंटर-ड्रोन सिस्टम है। इसे रूस-यूक्रेन और मध्य-पूर्व के युद्धों में तबाही मचाने वाले ‘शाहेद 136’ (Shahed 136) और ‘गेरान 2’ (Geran 2) जैसे खतरनाक वन-वे अटैक ड्रोनों को हवा में ही मार गिराने या निष्क्रिय करने के लिए डिजाइन किया गया है। इस प्रणाली की सबसे बड़ी विशेषता इसकी उच्च गतिशीलता और कम परिचालन लागत है। जहां पारंपरिक मिसाइल डिफेंस सिस्टम के जरिए किसी छोटे ड्रोन को गिराना लाखों डॉलर का सौदा होता है, वहीं गार्डियन-1 बेहद कम लागत में दुश्मन के घातक ड्रोनों को मार गिराने में सक्षम है।

पाकिस्तान के साथ अमेरिकी कंपनी की डील और भारत का रणनीतिक फायदा

पारस डिफेंस और पावरस के बीच हुए इस समझौते का एक और दिलचस्प पहलू इसकी टाइमलाइन है। भारत के साथ यह समझौता जून 2026 में हुआ था। इसके ठीक कुछ महीने बाद, सितंबर 2026 में अमेरिकी कंपनी पावरस ने पाकिस्तानी रक्षा मंत्रालय और पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर से मुलाकात के बाद पाकिस्तान के साथ भी एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए। पाकिस्तान ने इस कंपनी को मानवरहित हवाई प्रणालियों (UAS) की सीमित खरीद का एक शुरुआती ऑर्डर भी दिया है, जिसकी कीमत और तकनीकी विवरण को पूरी तरह गोपनीय रखा गया है। हालांकि, दोनों देशों के साथ किए गए समझौतों में जमीन-आसमान का अंतर है। जहां पाकिस्तान को केवल कुछ तैयार प्रणालियों की सीमित आपूर्ति का ऑर्डर मिला है, वहीं भारत को इस तकनीक का पूर्ण विनिर्माण और बौद्धिक संपदा लाइसेंस मिला है। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के पास तकनीक का विशेष अधिकार होने के कारण भविष्य में पाकिस्तानी सेना के पास मौजूद किसी भी समान अमेरिकी ड्रोन तकनीक की ताकत को आसानी से डिकोड और निष्प्रभावी किया जा सकेगा। भारत ने यह सौदा पहले करके रणनीतिक बढ़त हासिल कर ली है।

‘मेक इन इंडिया’ और आत्मनिर्भर भारत को मिलेगी मजबूती

भारतीय सशस्त्र बलों को फिलहाल इस अमेरिकी तकनीक आधारित सिस्टम के लिए कोई आधिकारिक ऑर्डर देना बाकी है, लेकिन पारस डिफेंस द्वारा घरेलू स्तर पर उत्पादन शुरू करने से भारतीय सेना, वायुसेना और नौसेना के लिए परीक्षण और खरीद की राह बेहद आसान हो जाएगी। सीमाओं पर लगातार बढ़ते ड्रोन खतरों, विशेषकर पंजाब और जम्मू-कश्मीर के सीमावर्ती इलाकों में पाकिस्तान की ओर से होने वाली हथियारों और ड्रग्स की ड्रोन तस्करी को रोकने के लिए भारतीय सुरक्षा बल लंबे समय से एक प्रभावी समाधान की तलाश में हैं।

आत्मनिर्भर भारत नीति

यह समझौता पूरी तरह से भारत सरकार की रक्षा स्वदेशीकरण नीति के अनुकूल है। विदेशी तकनीक को लाइसेंस के जरिए देश में लाने से न केवल भारत के भीतर उच्च-तकनीकी ज्ञान (Know-How) का ट्रांसफर होगा, बल्कि स्थानीय स्तर पर विनिर्माण इकाइयों की स्थापना से कुशल रोजगार के अवसर पैदा होंगे और घरेलू रक्षा आपूर्ति श्रृंखला (सप्लाई चेन) भी सुदृढ़ होगी। पारस डिफेंस की यह पहल भारत को केवल एक आयातक देश से बदलकर रक्षा प्रौद्योगिकियों का विनिर्माता बनाने की दिशा में एक मील का पत्थर है। आने वाले महीनों में इस प्रणाली की सफलता कंपनी की विनिर्माण क्षमता, सख्त गुणवत्ता नियंत्रण और भारतीय सेना की वास्तविक परिचालन आवश्यकताओं पर खरी उतरने की क्षमता पर निर्भर करेगी।

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