अब पानी में माइक्रोप्लास्टिक और ‘फॉरएवर केमिकल’ PFAS की भी होगी जांच, यूपी में बन रही नई स्टेट लैब

The CSR Journal Magazine
उत्तर प्रदेश में अब सिर्फ पानी में सामान्य प्रदूषकों की जांच तक सीमित रहने के बजाय माइक्रोप्लास्टिक और PFAS जैसे नए तरह के प्रदूषकों की भी पहचान की तैयारी हो रही है। इसके लिए उत्तर प्रदेश जल निगम (ग्रामीण) आधुनिक सुविधाओं से लैस नई स्टेट लैबोरेटरी तैयार करा रहा है। नई प्रयोगशाला में अत्याधुनिक जांच सुविधाएं विकसित की जाएंगी, ताकि भविष्य में पेयजल की गुणवत्ता से जुड़ी नई चुनौतियों की वैज्ञानिक तरीके से जांच की जा सके।

पानी में माइक्रोप्लास्टिक और PFAS की जांच क्यों जरूरी?

माइक्रोप्लास्टिक और PFAS दो अलग-अलग तरह के प्रदूषक हैं। माइक्रोप्लास्टिक 5 मिलीमीटर से छोटे प्लास्टिक कण होते हैं, जो अलग-अलग माध्यमों से पानी में पहुंच सकते हैं। वहीं PFAS फ्लोरीन युक्त कृत्रिम रसायनों का एक बड़ा समूह है। पर्यावरण में लंबे समय तक बने रहने के कारण इन्हें आम तौर पर ‘फॉरएवर केमिकल’ कहा जाता है। दोनों प्रदूषकों की पहचान के लिए अलग-अलग तकनीक और परीक्षण प्रक्रिया की जरूरत होती है।

नई स्टेट लैब में मिलेंगी आधुनिक जांच सुविधाएं

जल निगम (ग्रामीण) की नई स्टेट लैबोरेटरी को विश्वस्तरीय परीक्षण सुविधाओं से लैस करने की तैयारी है। इसमें माइक्रोप्लास्टिक और PFAS की जांच के लिए जरूरी उन्नत उपकरण लगाने का प्रस्ताव वार्षिक कार्ययोजना में शामिल किया गया है। इस सुविधा के तैयार होने के बाद प्रदेश में पेयजल की गुणवत्ता को लेकर ज्यादा गहन और वैज्ञानिक जांच संभव हो सकेगी। खास तौर पर ऐसे प्रदूषकों की पहचान में मदद मिलेगी, जिनकी जांच सामान्य जल परीक्षण में नहीं हो पाती।

माइक्रोप्लास्टिक की जांच में सावधानी जरूरी

माइक्रोप्लास्टिक की जांच सामान्य पानी के नमूने की तरह आसान नहीं होती। सैंपल लेते समय खास सावधानी बरतनी पड़ती है, क्योंकि बाहरी वातावरण, कपड़ों, बर्तनों या प्रयोगशाला की सामग्री से भी प्लास्टिक के कण नमूने में पहुंच सकते हैं। जांच के दौरान पानी से संदिग्ध कणों को अलग कर उनका आकार, आकृति और रंग देखा जा सकता है। इसके बाद कण किस तरह के प्लास्टिक से बने हैं, इसकी पुष्टि के लिए एफटीआईआर या रमन माइक्रोस्कोपी जैसी तकनीक का इस्तेमाल किया जा सकता है।

PFAS की जांच भी अलग तरीके से होगी

PFAS माइक्रोप्लास्टिक से पूरी तरह अलग श्रेणी का प्रदूषक है। इसलिए इसकी जांच के लिए अलग नमूना प्रक्रिया और विश्लेषणात्मक तकनीक की जरूरत होती है। नई स्टेट लैब में ऐसी उन्नत परीक्षण क्षमता विकसित करने का उद्देश्य भविष्य में पानी में PFAS जैसे रसायनों की मौजूदगी का पता लगाने के साथ उनके संभावित स्रोतों की पहचान के लिए मजबूत वैज्ञानिक आधार तैयार करना है।

UP में पहले से है बड़ा लैब नेटवर्क

ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल की गुणवत्ता पर नजर रखने के लिए प्रदेश में पहले से बहुस्तरीय प्रयोगशाला नेटवर्क काम कर रहा है। इसमें 1 स्टेट, 3 क्षेत्रीय, 72 जिला और 62 वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट प्रयोगशालाएं शामिल हैं। राज्य स्तरीय प्रयोगशालाओं में उन्नत परीक्षण सुविधाएं उपलब्ध हैं और इनके 50 मानक NABL प्रमाणित हैं। जल जीवन मिशन के तहत इन प्रयोगशालाओं के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में पानी के नमूनों की नियमित जांच की जाती है।

गांवों में भी होती है पानी की जांच

पेयजल की निगरानी सिर्फ प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं है। गांवों में प्रशिक्षित महिलाओं और जल गुणवत्ता निगरानी समूहों के जरिए फील्ड टेस्टिंग किट से शुरुआती जांच भी की जाती है। अगर किसी जगह पानी की गुणवत्ता को लेकर समस्या सामने आती है या निर्धारित मानकों के अनुसार विस्तृत जांच की जरूरत होती है तो पानी के नमूने प्रयोगशाला भेजे जाते हैं। इससे गांवों में पानी की गुणवत्ता पर लगातार नजर रखने में मदद मिलती है।

केंद्र के अधिकारी ने भी किया था निरीक्षण

हाल ही में उत्तर प्रदेश के दौरे पर आए केंद्रीय पेयजल एवं स्वच्छता विभाग के सचिव ने उत्तर प्रदेश जल निगम (ग्रामीण) की मौजूदा स्टेट लैब का निरीक्षण किया था। इस दौरान पानी की जांच की मौजूदा सुविधाओं, आधुनिक उपकरणों और भविष्य में विकसित की जाने वाली परीक्षण क्षमताओं पर चर्चा हुई। माइक्रोप्लास्टिक और PFAS जैसे उभरते प्रदूषकों की जांच को स्टेट लैब स्तर पर विकसित करने पर भी जोर दिया गया।

नई लैब से क्या बदलेगा?

नई स्टेट लैब के जरिए प्रदेश में पेयजल की गुणवत्ता जांच को भविष्य की जरूरतों के हिसाब से मजबूत करने की कोशिश है। माइक्रोप्लास्टिक और PFAS की जांच सुविधा विकसित होने से पानी में मौजूद इन प्रदूषकों का बेसलाइन डेटा तैयार करने में मदद मिलेगी। इसके अलावा संभावित प्रदूषण स्रोतों की पहचान, वैज्ञानिक निगरानी और भविष्य में बनने वाले राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप परीक्षण व्यवस्था विकसित करने में भी मदद मिल सकती है।

भविष्य की जल गुणवत्ता चुनौतियों पर नजर

जल निगम (ग्रामीण) के प्रबंध निदेशक योगेश कुमार ने बताया कि नई स्टेट लैबोरेटरी का निर्माण तेजी से कराया जा रहा है। इसे आधुनिक और विश्वस्तरीय परीक्षण सुविधाओं से लैस करने की दिशा में काम चल रहा है। उनके मुताबिक, माइक्रोप्लास्टिक और PFAS जैसे उभरते प्रदूषकों की जांच क्षमता विकसित करना भविष्य की जल गुणवत्ता चुनौतियों को देखते हुए महत्वपूर्ण है। इससे जरूरत पड़ने पर अन्य सरकारी विभागों और संस्थाओं को भी उच्च स्तर के जल परीक्षण में सहयोग दिया जा सकेगा।

पेयजल जांच में बड़ा बदलाव

पानी की गुणवत्ता को लेकर अब चुनौती सिर्फ यह पता लगाने की नहीं है कि पानी साफ दिखाई दे रहा है या नहीं। माइक्रोप्लास्टिक और PFAS जैसे अदृश्य प्रदूषकों की पहचान भी महत्वपूर्ण होती जा रही है। नई स्टेट लैब के जरिए उत्तर प्रदेश इसी दिशा में अपनी जांच व्यवस्था को आधुनिक बनाने की तैयारी कर रहा है। इससे भविष्य में पेयजल की गुणवत्ता पर ज्यादा गहराई से नजर रखने और संभावित जोखिमों की समय रहते पहचान करने में मदद मिल सकती है।

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