फांसी, इंजेक्शन या गोली? मौत की सजा का सबसे खतरनाक तरीका कौन सा?

The CSR Journal Magazine
हाल ही में भारत के सुप्रीम कोर्ट ने फांसी के विकल्प के रूप में जहरीले इंजेक्शन की मांग खारिज कर दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इंजेक्शन को फांसी से कम दर्दनाक साबित करने के लिए कोई ठोस वैज्ञानिक साक्ष्य नहीं हैं। यह मामला ऋषि मल्होत्रा बनाम भारत संघ के संदर्भ में सामने आया था, जहां याचिकाकर्ता ने मौत की सजा के लिए फांसी की जगह जहरीले इंजेक्शन की मांग की थी।

इंजेक्शन के इस्तेमाल में चुनौतियां

याचिकाकर्ता का तर्क था कि इंजेक्शन के माध्यम से दी गई मौत प्रक्रिया अधिक वैज्ञानिक और कम दर्दनाक हो सकती है। लेकिन कोर्ट ने कहा कि इस दावे को समर्थन देने वाले पर्याप्त साक्ष्य पेश नहीं किए गए। अदालत का कहना था कि जहरीले इंजेक्शन के इस्तेमाल में कई समस्याएं सामने आई हैं।

क्या फांसी अधिक ख़तरनाक?

जबकि याचिकाकर्ता ने दलील दी कि फांसी शारीरिक और मानसिक रूप से दर्दनाक हो सकती है, सुप्रीम कोर्ट ने इस पर भी सावधानी बरती। अदालत ने कहा कि इस दावे को साबित करने के लिए भी सही साक्ष्य नहीं पेश किए गए। इसलिए, फांसी को हर हालत में कम दर्दनाक मानने का आधार नहीं बना।

अमेरिका के उदाहरण

कोर्ट ने अमेरिका में जहरीले इंजेक्शन से जुड़े कई असफलता के मामलों का हवाला दिया। वहां 1980 से 2010 के बीच लगभग 9,000 फांसी में से 276 मामलों को ‘बॉट्च्ड एग्जीक्यूशन’ के रूप में दर्ज किया गया। ये उदाहरण दिखाते हैं कि किसी भी तरीके को हर मामले में सुरक्षित नहीं माना जा सकता।

ट्राय के तहत जहरीला इंजेक्शन

जहरीले इंजेक्शन की प्रक्रिया में व्यक्ति को बेहोश करने, मांसपेशियों की गतिविधि को रोकने और दिल की धड़कन रोकने के लिए दवा का प्रयोग किया जाता है। लेकिन यदि पहली दवा प्रभावी नहीं हो, तो व्यक्ति दर्द महसूस कर सकता है। ऐसे मामलों की संख्या अमेरिका में काफी रही है।

सुप्रीम कोर्ट का पुराना बयान

इससे पहले 1983 में भी सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सजा विधि पर एक निर्णय दिया था, जिसमें फांसी, बिजली, जहरीली गैस, गोली और जहरीले इंजेक्शन जैसे तरीकों की तुलना की गई थी। तब भी कोई स्पष्ट सिद्ध लाभ नहीं दिखा, जिसके आधार पर विधि को बदला जा सके।
सुप्रीम कोर्ट ने मौजूदा याचिका पर विचार करते हुए कहा है कि फांसी एक बेहतर विकल्प साबित होता है। याचिकाकर्ता ने जिन असुविधाओं का जिक्र किया, उनके पीछे कोई ठोस तथ्य नहीं थे। इस मामले में कोर्ट ने पिछले फैसले की गहराई से समीक्षा भी की।

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