मेघालय की पहाड़ियों में रबर फिग के पेड़ों की जड़ों से बने ‘लिविंग रूट ब्रिज’ आज भी इंसान और प्रकृति के अद्भुत संबंध को दर्शाते हैं. यह तकनीक भले ही आधुनिक निर्माण के मानकों से मेल न खाती हो, लेकिन इसमें प्रकृति के साथ सामंजस्य की एक खास समझ झलकती है, जो पर्यावरणीय संरक्षण के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है. इसी अनोखी परंपरा और स्थानीय ज्ञान को समझने के लिए उत्तर प्रदेश का मीडिया प्रतिनिधिमंडल यहां आया है.
एक अद्वितीय सांस्कृतिक विरासत
‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ मीडिया प्रतिनिधिमंडल ने पूर्वी खासी हिल्स के सीज गांव में पर्यावरणविद् हैली वार से संवाद किया. हैली वार ने बताया कि मेघालय के खासी समुदाय के लिए यह जीवित जड़ पुल केवल आवागमन का साधन नहीं, बल्कि प्रकृति को समझने और उसकी रक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण दृष्टिकोण है. स्थानीय लोग रबर फिग की जड़ों को विशेष दिशा में बढ़ाते हैं, उन्हें सहारा देते हैं और देखभाल करते हैं.
धैर्य और समर्पण का परिणाम
वर्षों के इस प्रयास के बाद जड़ें एक मजबूत पुल का रूप ले लेती हैं. लिविंग रूट ब्रिज की खासियत यह है कि इसकी जीवंत संरचना मौसम और समय के प्रभाव से नहीं बिगड़ती, बल्कि जड़ें लगातार बढ़ती रहती हैं. पुलों की देखभाल और मरम्मत की प्रक्रिया भी इसी प्राकृतिक व्यवस्था के अनुसार होती है. यही वजह है कि एक पुल को तैयार करने में कई वर्षों का समय लग सकता है, कभी-कभी यह प्रक्रिया दशकों तक चलती है.
पारंपरिक ज्ञान का संरक्षण
हैली वार ने यह भी बताया कि इस जीवित जड़ पुलों की परंपरा खासी समुदाय के पारंपरिक ज्ञान का अहम हिस्सा है. क्षेत्रीय भौगोलिक परिस्थितियों और भारी बारिश ने इस तकनीक को विकसित करने में मदद की है. यहां प्रकृति को हटाने के बजाय उसके साथ मिलकर काम किया गया है, जिससे ‘जिंगकिएंग जरी’ एक अद्वितीय वास्तुकला बन गई है.
समुदाय का योगदान
पूर्वी खासी हिल्स के सीज गांव के निवासियों का जड़ पुलों के संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों के संवर्धन में महत्वपूर्ण योगदान है. इन्हीं प्रयासों के लिए हैली वार को 2026 में पद्म श्री सम्मान से नवाजा गया. उनका काम न केवल समाज के लिए, बल्कि पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय है.
पर्यटन से अधिक महत्व
चेरापूंजी, नोंग्रियात और खासी पहाड़ियों में स्थित जीवित जड़ पुल अब देश-विदेश के पर्यटकों और शोधकर्ताओं के लिए आकर्षण का केंद्र बन गए हैं. हालांकि, इनका महत्व केवल पर्यटन तक सीमित नहीं है. ये पुल स्थानीय समुदायों के मेहनत, पारंपरिक ज्ञान और प्रकृति के साथ उनके संबंध को दर्शाते हैं.
विकास और प्रकृति का सामंजस्य
हैली वार से संवाद में यह महत्वपूर्ण संदेश सामने आया कि विकास को हमेशा प्रकृति के साथ आमने-सामने खड़ा करने की जरूरत नहीं है. मेघालय के ये जीवित जड़ पुल इसी सोच का एक जीता जागता उदाहरण हैं. ये पुल न केवल एक किनारे को दूसरे से जोड़ते हैं, बल्कि इंसान, प्रकृति, परंपरा और आधुनिकता को भी जोड़ने का कार्य करते हैं.
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