MP: बालाघाट में 32+ बच्चों की मौत से हड़कंप, केंद्र की रिपोर्ट में खुली स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल, न डॉक्टर न लैब

The CSR Journal Magazine
मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले में बैगा आदिवासी बच्चों की मौत का मामला अब गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। 32 से अधिक बच्चों की मौत के बीच राष्ट्रीय संयुक्त प्रकोप प्रतिक्रिया दल (NJORT) की अंतिम जांच रिपोर्ट ने जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था में मौजूद बड़ी खामियों को उजागर किया है। रिपोर्ट के मुताबिक, बीमारी की निगरानी से लेकर बच्चों के इलाज और पोषण संबंधी योजनाओं तक कई स्तरों पर लापरवाही सामने आई है।

न महामारी विशेषज्ञ, न माइक्रोबायोलॉजिस्ट

केंद्रीय टीम की रिपोर्ट के अनुसार, बालाघाट में रोग निगरानी व्यवस्था बेहद कमजोर थी। जिला स्तर पर महामारी विशेषज्ञ और माइक्रोबायोलॉजिस्ट के पद खाली थे। जिला जनस्वास्थ्य प्रयोगशाला की भी कमी सामने आई। एकीकृत रोग निगरानी कार्यक्रम (IDSP) की यूनिट महज एक डेटा मैनेजर के सहारे काम कर रही थी। वहीं, सबसे अधिक प्रभावित गांव में एक साल से ज्यादा समय तक आशा कार्यकर्ता की नियुक्ति नहीं हुई थी। इससे बीमार बच्चों की समय पर पहचान और उनके स्वास्थ्य की निगरानी प्रभावित हुई।

रिकॉर्ड में 65 मरीज, जांच में मिले 196 बीमार बच्चे

रिपोर्ट में सरकारी आंकड़ों और जमीनी हकीकत के बीच बड़ा अंतर सामने आया। विभागीय रिकॉर्ड में 65 मरीज दर्ज थे, जबकि जांच के दौरान 196 बीमार बच्चे मिले। इनमें लगभग 80 प्रतिशत बच्चे 10 साल या उससे कम उम्र के थे। जांच में 25 बच्चे खसरा और 27 बच्चे मलेरिया से संक्रमित पाए गए, जबकि 12 बच्चे दोनों बीमारियों से पीड़ित थे। डेंगू और चिकनगुनिया के मामले भी सामने आए।
कुपोषण की स्थिति भी चिंताजनक रही। रिपोर्ट के मुताबिक, बोंदरी गांव की तीन वर्षीय बच्ची का वजन महज 4.9 किलोग्राम था। अस्पताल में भर्ती होने के बाद दो दिन में उसकी मौत हो गई। कई क्षेत्रों में 20 से 25 प्रतिशत बच्चे गंभीर रूप से दुबले पाए गए।

रिपोर्ट मिलने के बाद भी कार्रवाई पर सवाल

केंद्रीय टीम ने 13 से 18 अगस्त के बीच जांच की थी। 16 सितंबर को राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, मध्य प्रदेश ने रिपोर्ट बालाघाट कलेक्टर को सौंपकर कार्रवाई मांगी थी। इसके बावजूद समय रहते ठोस कदम उठाए जाने को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

राहुल गांधी के दौरे पर सियासी घमासान

एक अक्टूबर को कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने जगला गांव पहुंचकर प्रभावित परिवारों से मुलाकात की और इसे शासन की बड़ी विफलता बताया। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने उनके दौरे पर निशाना साधा, जबकि उपमुख्यमंत्री एवं स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ल ने इसे ‘पॉलिटिकल टूरिज्म’ करार दिया। सरकार ने प्रभावित क्षेत्रों में नए स्वास्थ्य केंद्र स्थापित करने की प्रक्रिया शुरू होने की बात भी कही। अब सवाल है कि इन गंभीर खामियों को दूर कर आदिवासी बच्चों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं कब मिलेंगी।

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