शी जिनपिंग के भारत आते ही बदल जाएंगे रिश्तों के नियम? गलवान के बाद नई कहानी, चीन पर मोदी सरकार का बदला रुख

The CSR Journal Magazine
जब दो पड़ोसी एक ही दीवार साझा करते हैं, तो उनके रिश्ते में कई परिवर्तन आते हैं। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग, ब्रिक्स सम्मेलन में भाग लेने नई दिल्ली आ रहे हैं। यह दौरा महत्वपूर्ण है, क्योंकि गलवान घाटी के संघर्ष के सात साल बाद वे पहली बार भारतीय भूमि पर कदम रख रहे हैं। पिछले साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चीन का दौरा किया था, जब वे तियानजिन में एससीओ शिखर सम्मेलन में शामिल हुए थे। वर्तमान में, भारत-चीन संबंधों के पुराने नियम पूरी तरह बदल चुके हैं। यह रिश्ता अब केवल कूटनीति की मीठी बातों पर नहीं बल्कि कठिन वास्तविकताओं पर आधारित है। इसे एक आम मोहल्ले की भाषा में समझें तो यह एक नए ‘रियलिज्म’ की कहानी है।

भारत और चीन का बदलता मिजाज

भारत पहले उस सीधे और शांतिप्रिय पड़ोसी की तरह था, जो मानता था कि बात करने से हर समस्या का समाधान हो सकता है। लेकिन अब समय बदल गया है। भारत अब शांति की बात तो करता है, लेकिन सीमा पर अपनी तैयारी में कोई कमी नहीं रखता। वहीं, चीन की रणनीति में कोई बदलाव नहीं आया है। चीन हमेशा अपनी भूगोल को बढ़ाने की कोशिश में रहता है। विदेशी नीति के विशेषज्ञ कहते हैं कि चीन की नीति में ‘सलामी स्लाइसिंग’ और ‘रणनीतिक झांसा’ शामिल है, लेकिन अब भारत हर स्थिति का सामना करने के लिए तैयार है।

भरोसा और मजबूरी के बीच का संतुलन

भारत-चीन के रिश्ते की सबसे बड़ी समस्या यह है कि भरोसा खत्म हो चुका है, लेकिन आर्थिक जरूरतें अब भी मौजूद हैं। गलवान घाटी जैसी घटनाओं के बावजूद, दोनों देशों के बीच व्यापार बढ़ता जा रहा है। यह इस बात की मिसाल है कि दोनों पड़ोसी एक कठिन स्थिति में भी एक साथ काम कर रहे हैं। भारत के स्मार्टफोन, दवाइयों के कच्चे माल और इलेक्ट्रॉनिक्स के उद्योग के लिए चीनी सामान जरूरी है। इसके विपरीत, चीन के लिए भारत का विशाल बाजार एक महत्त्वपूर्ण संसाधन है।

सशर्त जुड़ाव की नई नीति

भारत-चीन रिश्तों का नया नियम अब ‘सशर्त जुड़ाव’ है। भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि सीमा पर शांति के बिना अन्य रिश्तों को सामान्य नहीं माना जाएगा। सहयोग और प्रतिस्पर्धा का नया संतुलन मिलने वाला है। हाल ही में भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने चीन में वार्ता की और सीमा विवाद के समाधान की दिशा में आगे बढ़े हैं। यह सीमाई विवाद एक तरह का अनोखा मामला है, जहां झड़पें होती हैं, लेकिन गोलियाँ नहीं चलतीं।

धोखे की परंपरा: चीन और पाकिस्तान का ट्रैक रिकॉर्ड

भारत के साथ धोखा देने में चीन और पाकिस्तान का रिकॉर्ड खराब रहा है। जब भी भारत ने दोस्ती का हाथ बढ़ाया, चीन ने उसकी कमजोरी का फायदा उठाया। लेकिन पाकिस्तान के मुकाबले, चीन के साथ बातचीत की गुंजाइश अधिक रहती है। पाकिस्तान की स्थिति में, वह खराब पड़ोसी है। जबकि चीन अपनी सेना के साथ सीधे संवाद करता है। यह सीधी और सख्त बातचीत का एक रास्ता खुला रखता है।

भौगोलिक राजनीतिक बदलाव और नए समीकरण

जैसे-जैसे अंतरराष्ट्रीय संबंधों में बदलाव होते हैं, दो पड़ोसी देशों के बीच नए नियम बनते हैं। अमेरिका में ‘ट्रंप फिनोमेनन’ ने वैश्विक राजनीति में एक बड़ा मोड़ लाया है। यही कारण है कि जब अमेरिका चीन पर व्यापारिक दबाव डालता है, तो भारत को भी अपने हितों की चिंता करनी होती है। इस परिस्थिति ने भारत और चीन को फिर से बातचीत की मेज पर ला खड़ा किया है।

भव्य आवभगत, लेकिन कड़वी सच्चाई

जब शी जिनपिंग भारत आएंगे, तो भारत ‘अतिथि देवो भव’ की परंपरा का पूरा सम्मान करेगा। उनके स्वागत में कोई कसर नहीं छोड़ी जाएगी। लेकिन इस भव्य आवभगत के बीच रिश्तों की कड़वी सच्चाई अछूती नहीं रह सकती। शी जिनपिंग की यात्रा के दौरान, गलवान घाटी के संघर्ष का दर्द और अरुणाचल प्रदेश में चीन की हरकतें हमेशा की तरह मौजूद रहेंगी।

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