G2 का जिन्न, डगमगाता QUAD और नई दिल्ली की स्वायत्तता के सामने 2026 की सबसे बड़ी वैश्विक चुनौती
वैश्विक राजनीति की बिसात पर मोहरे तेजी से बदल रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों से एक-दूसरे के धुर विरोधी रहे अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती नजदीकी ने नई दिल्ली के नीतिगत गलियारों में खतरे की घंटी बजा दी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच हालिया मुलाकातों और समझौतों ने वैश्विक स्तर पर ‘G2’ (ग्रुप ऑफ टू) की अवधारणा को दोबारा जिंदा कर दिया है। G2 का सीधा मतलब है- दुनिया की दो सबसे बड़ी महाशक्तियां आपस में हाथ मिलाकर वैश्विक व्यवस्था, व्यापार और सुरक्षा का खाका तय करें। यह बदलाव भारत के लिए एक बड़ा भू-राजनीतिक झटका माना जा रहा है। अब तक भारत की विदेश नीति काफी हद तक इस बात पर केंद्रित थी कि अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ मिलकर हिंद-प्रशांत (Indo-Pacific) क्षेत्र में चीन के आक्रामक विस्तार को रोका जाए। लेकिन अगर वॉशिंगटन और बीजिंग आपस में सौदेबाजी कर लेते हैं, तो भारत के रणनीतिक कवच पर इसका क्या असर होगा? क्या क्वाड (QUAD) जैसी मजबूत चौकड़ी अब बेअसर हो जाएगी?
G2 का पुनरुत्थान: महाशक्तियों की सौदेबाजी और भारत की चिंता
डोनाल्ड ट्रंप की कूटनीतिक शैली हमेशा से संस्थागत गठबंधनों की जगह व्यक्तिगत सौदों (Transactional Diplomacy) पर टिकी रही है। वर्ष 2025 में दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद ट्रंप ने शुरुआत में चीन पर भारी शुल्क (टैरिफ) लगाए थे, लेकिन चीन के जवाबी कदमों (जैसे फाइटर जेट्स के पुर्जों की सप्लाई रोकना) और वैश्विक सप्लाई चेन के दबाव के कारण दोनों महाशक्तियों ने समझौतों का रास्ता चुना। इस नई सांठगांठ से उभरी चिंताओं को विशेषज्ञ इस प्रकार देखते हैं:
• वैश्विक प्रभाव का बंटवारा: G2 के तहत अमेरिका और चीन दुनिया को अपने प्रभाव क्षेत्रों में बांट सकते हैं। ऐसी स्थिति में हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की दादागिरी को रोकने वाला कोई नहीं बचेगा।
• रणनीतिक स्वायत्तता पर दबाव: भारत हमेशा से बहुध्रुवीय (Multipolar) विश्व का समर्थक रहा है। यदि दुनिया दोबारा द्विध्रुवीय (Bipolar) व्यवस्था की तरफ बढ़ती है, तो भारत के लिए अपनी स्वतंत्र विदेश नीति बनाए रखना बेहद जटिल हो जाएगा।
• दबाव की राजनीति: हाल ही में देखा गया है कि जहां अमेरिका चीन के प्रति नरम रुख अपना रहा है, वहीं वह अपने करीबी साझेदार भारत पर आर्थिक या कूटनीतिक दबाव बना रहा है।
QUAD पर मंडराता संकट: क्या कमजोर होगी भारत की समुद्री सुरक्षा?
चतुर्भुज सुरक्षा संवाद यानी QUAD (भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया) का गठन मुख्य रूप से हिंद-प्रशांत क्षेत्र में कानून आधारित व्यवस्था बनाए रखने और चीन के बढ़ते सैन्य दबदबे को संतुलित करने के लिए किया गया था। अमेरिका-चीन दोस्ती से क्वाड के अस्तित्व पर सीधे सवाल खड़े हो गए हैं:
• बुनियाद पर चोट: यदि अमेरिका खुद बीजिंग के साथ रणनीतिक समझ बना लेता है, तो चीन के खिलाफ सुरक्षा गठबंधन के रूप में क्वाड का पूरा आधार ही कमजोर पड़ जाएगा।
• सैन्य से इतर मुद्दों पर असर: क्वाड केवल एक सुरक्षा मंच नहीं है, बल्कि यह क्रिटिकल टेक्नोलॉजी, साइबर सुरक्षा, और सप्लाई चेन रेजिलिएंस का भी एक अहम ढांचा है। अमेरिका के कदम पीछे खींचने से इन सभी मोर्चों पर भारत अकेला पड़ सकता है।
• हिंद महासागर में चीन का आक्रामक रुख: क्वाड के शिथिल पड़ने से चीन को हिंद महासागर और वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर अपनी विस्तारवादी नीतियों को और तेज करने का मौका मिल जाएगा।
‘चाइना प्लस वन’ को झटका: आर्थिक मोर्चे पर बड़ी चुनौतियां
पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका और चीन के बीच जारी ट्रेड वॉर का सीधा फायदा भारत को मिल रहा था। दुनिया भर की बहुराष्ट्रीय कंपनियां चीन पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए ‘चाइना प्लस वन’ रणनीति के तहत भारत का रुख कर रही थीं। मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग, सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स और डिफेंस जैसे क्षेत्रों में भारत तेजी से निवेश आकर्षित कर रहा था। लेकिन अब समीकरण बदल रहे हैं:
• निवेश में आ सकती है कमी: जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के चेयर प्रोफेसर श्रीकांत कोंडापल्ली के अनुसार, अगर वॉशिंगटन और बीजिंग के बीच रिश्ते सुधरते हैं, तो अमेरिकी कंपनियों का चीन से भारत की तरफ पलायन धीमा या बंद हो सकता है।
• टैरिफ की दोहरी मार: एक तरफ जहां अमेरिका ने चीन के साथ समझौता कर नए टैरिफ टाल दिए हैं, वहीं भारत के निर्यात पर भारी शुल्क (टैरिफ) लगा दिए हैं। यह स्थिति भारतीय टेक्सटाइल, फार्मा और आईटी जैसे प्रमुख निर्यात क्षेत्रों के लिए नुकसानदेह साबित हो रही है।
क्या है भारत का रक्षा कवच? रणनीतिक विकल्प और भावी राह
भले ही अमेरिका-चीन की नजदीकी भारत के लिए बड़ी चुनौतियां लेकर आई है, लेकिन भारतीय नीति निर्धारकों और अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का मानना है कि घबराने के बजाय भारत को नए कूटनीतिक रास्ते तलाशने होंगे। इस चक्रव्यूह से निकलने के लिए भारत को निम्नलिखित रणनीतियों पर काम करना होगा:
• गठबंधनों का विविधीकरण (Diversification): प्रोफेसर कोंडापल्ली का सुझाव है कि भारत को केवल अमेरिका पर निर्भर रहने के बजाय यूरोपीय संघ (EU), रूस, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसी अन्य वैश्विक ताकतों के साथ अपने द्विपक्षीय संबंधों को अत्यधिक मजबूत करना चाहिए।
• रूस-चीन-अमेरिका त्रिकोण (G3 की संभावना): कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि डोनाल्ड ट्रंप भविष्य में रूस को भी इस व्यवस्था में शामिल कर ‘G3’ का ढांचा तैयार कर सकते हैं। भारत के लिए सबसे समझदारी भरी नीति यह होगी कि वह इन महाशक्तियों की आपसी चालों में फंसने के बजाय अपने हितों को सर्वोपरि रखे।
• आंतरिक क्षमता का विकास: वैश्विक अस्थिरता के इस दौर में भारत को अपनी विनिर्माण क्षमता (Manufacturing), सेमीकंडक्टर्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और क्रिटिकल मिनरल्स के घरेलू बुनियादी ढांचे को युद्धस्तर पर मजबूत करना होगा। आत्मनिर्भरता ही चीन के आर्थिक और सैन्य प्रभुत्व का असली मुकाबला है।
अमेरिका चीन की दोस्ती के नए आयाम
अमेरिका और चीन की दोस्ती ने यह साबित कर दिया है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में न तो कोई स्थायी दोस्त होता है और न ही स्थायी दुश्मन; यहाँ केवल स्थायी हित होते हैं। भारत के लिए यह समय एक मूक दर्शक बने रहने का नहीं, बल्कि अपनी रणनीतिक स्वायत्तता की रक्षा करते हुए खुद को एक अपरिहार्य वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित करने का है।
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