दवाओं के साइड इफेक्ट पर अब ट्रांसप्लांट में भी नजर, सरकार ने शुरू किया नया कार्यक्रम

The CSR Journal Magazine

 मरीजों की सुरक्षा के लिए केंद्र सरकार का बड़ा कदम, अंग प्रत्यारोपण में इस्तेमाल होने वाली दवाओं और जैविक उत्पादों के दुष्प्रभावों पर रखी जाएगी पैनी नजर

देश में अंग और टिश्यू (ऊतक) ट्रांसप्लांट कराने वाले मरीजों और अंगदान करने वाले डोनर्स की सुरक्षा को लेकर केंद्र सरकार ने एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला लिया है। दवाओं के साइड इफेक्ट्स (दुष्प्रभावों) से मरीजों को बचाने के लिए अब सरकार ने अपनी निगरानी का दायरा बढ़ा दिया है। इसके तहत अंग प्रत्यारोपण के क्षेत्र में एक नया और विशेष कार्यक्रम शुरू किया गया है, जिसे ‘बायोविजिलेंस प्रोग्राम ऑफ इंडिया’ (BvPI) का नाम दिया गया है। सोमवार को नई दिल्ली के डॉ. अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित छठे ‘नेशनल फार्माकोविजिलेंस वीक’ (राष्ट्रीय दवा सुरक्षा सप्ताह) के दौरान केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री अनुप्रिया पटेल ने इस नए और महत्वाकांक्षी कार्यक्रम को मंजूरी देने की आधिकारिक घोषणा की।

अब हर साइड इफेक्ट का रखा जाएगा पूरा रिकॉर्ड

इस नए कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य अंग और टिश्यू प्रत्यारोपण के दौरान या उसके बाद इस्तेमाल होने वाली विभिन्न दवाओं और जैविक उत्पादों (बायोलॉजिकल प्रोडक्ट्स) से होने वाले गंभीर व सामान्य दुष्प्रभावों की पहचान करना, उनकी रिपोर्ट तैयार करना, उनका मूल्यांकन करना और भविष्य में उन्हें रोकना है। यह कार्यक्रम अनूठा इसलिए है क्योंकि यह सिर्फ अंग प्राप्त करने वाले (रेसिपिएंट) पर ही नहीं, बल्कि अंग या टिश्यू दान करने वाले (डोनर) को दी जाने वाली दवाओं और जैविक सामग्रियों के असर पर भी पूरी नजर रखेगा। अंग प्रत्यारोपण चिकित्सा का एक बेहद संवेदनशील हिस्सा है, जहां शरीर द्वारा नए अंग को स्वीकार करने के लिए मरीजों को जीवनभर कई तरह की ‘इम्यूनोसप्रेसिव’ (प्रतिरक्षा प्रणाली को दबाने वाली) दवाएं और जैविक उत्पाद देने पड़ते हैं। इन उत्पादों के इस्तेमाल से कई बार मरीजों में संक्रमण, अंगों को नुकसान या अन्य जटिल साइड इफेक्ट्स देखने को मिलते हैं। अब तक देश में सामान्य दवाओं और मेडिकल उपकरणों के साइड इफेक्ट पर नजर रखने के लिए व्यवस्थाएं थीं, लेकिन ट्रांसप्लांट से जुड़े विशिष्ट जैविक उत्पादों के लिए ऐसी केंद्रीकृत व्यवस्था नहीं थी। यह नया कार्यक्रम इस कमी को पूरा करेगा।

भारतीय फार्माकोपिया आयोग (IPC) संभालेगा कमान

सरकार के इस नए अभियान का नेतृत्व केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के तहत आने वाला स्वायत्त संस्थान ‘भारतीय फार्माकोपिया आयोग’ (IPC) करेगा। IPC देश भर के अस्पतालों, डॉक्टरों और स्वास्थ्य केंद्रों से ट्रांसप्लांट से जुड़े प्रतिकूल प्रभावों और दवाओं के साइड इफेक्ट का डेटा एकत्र करेगा। इस डेटा का बारीकी से वैज्ञानिक अध्ययन किया जाएगा ताकि यह समझा जा सके कि कौन सी दवा या जैविक उत्पाद किस तरह का जोखिम पैदा कर रहा है। समय रहते जोखिम का पता चलने पर सरकार दवाओं की खुराक या उनके उपयोग से जुड़ी गाइडलाइंस में बदलाव कर सकेगी, जिससे मरीजों की जान को सुरक्षित रखा जा सके।

हर हिस्सेदार की होगी जिम्मेदारी, प्राथमिक स्तर तक बढ़ेगा नेटवर्क

केंद्रीय राज्य मंत्री अनुप्रिया पटेल ने कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए इस बात पर विशेष जोर दिया कि दवाओं की सुरक्षा और मरीजों की जान की हिफाजत करना केवल सरकार का काम नहीं है। उन्होंने स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र से जुड़े सभी हितधारकों, जैसे दवा कंपनियों, डॉक्टरों, अस्पतालों और स्वयं मरीजों से अपील की कि यदि दवा, किसी मेडिकल डिवाइस या अंग प्रत्यारोपण से जुड़ा कोई भी साइड इफेक्ट सामने आता है, तो उसकी तुरंत रिपोर्ट करें। सरकार ने इसके लिए मोबाइल एप्लिकेशन, हेल्पलाइन नंबर और ऑनलाइन पोर्टल जैसी कई रिपोर्टिंग सुविधाएं तैयार की हैं। जितना अधिक इन मामलों की रिपोर्टिंग होगी, नागरिकों के स्वास्थ्य की रक्षा करना उतना ही आसान होगा। वर्तमान में देश के विभिन्न सरकारी व निजी अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों में दवाओं के दुष्प्रभावों की रिपोर्ट करने वाले लगभग 1,150 ‘एडवर्स ड्रग रिएक्शन’ (ADR) केंद्र काम कर रहे हैं। सरकार की योजना इस पूरे निगरानी तंत्र को और मजबूत करते हुए इसे ग्रामीण और जमीनी स्तर पर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHCs) तक विस्तारित करने की है।

दवाओं की नई निर्देशिका भी हुई जारी

इस खास मौके पर केंद्रीय मंत्री ने देश में इस्तेमाल होने वाली दवाओं की मानक सूचना देने वाली ‘नेशनल फॉर्मुलरी ऑफ इंडिया’ (NFI) के 7वें संस्करण और उसके डिजिटल रूप को भी देश को समर्पित किया। यह निर्देशिका डॉक्टरों और स्वास्थ्य पेशेवरों को मरीजों के लिए सही और साक्ष्य-आधारित दवाएं चुनने में बड़ी मदद करेगी। भारत का यह कदम देश के स्वास्थ्य ढांचे को आत्मनिर्भर और वैश्विक मानकों के अनुरूप बनाने की दिशा में एक मील का पत्थर माना जा रहा है।

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